विजय उरांव
भविष्य में होने वाली बिजली खपत को देखते हुए भारत कोयले के बजाए, न्यूक्लियर एनर्जी की ओर अग्रसर है. बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है. जिसको लेकर सरकार ने 2047 तक भारत की न्यूक्लियर पावर क्षमता को 100 GW यानी 1 लाख MW तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. फिलहाल देश में परमाणु ऊर्जा की क्षमता सिर्फ 8.78 GW है.
यानी अगले दो दशकों में भारत परमाणु बिजली की अपनी क्षमता को 11 गुना से ज्यादा बढ़ाने की तैयारी में है. बढ़ती बिजली मांग और क्लीन एनर्जी की जरूरत के बीच सरकार न्यूक्लियर पावर को भविष्य के बड़े ऊर्जा स्रोत के तौर पर आगे बढ़ा रही है.
अभी देश में कितनी परमाणु बिजली?
केंद्र सरकार ने 12 अगस्त को लोकसभा में बताया कि देश में इस समय 24 परमाणु बिजली संयंत्रों की कुल स्थापित क्षमता 8,780 MW है. वर्ष 2025-26 में देश के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी 3.1 फीसदी रही.
यानी अभी देश की कुल बिजली में न्यूक्लियर पावर का हिस्सा छोटा है, लेकिन सरकार आने वाले वर्षों में इसे काफी बढ़ाना चाहती है.
संसद के मुताबिक निर्माण और कमीशनिंग के अलग-अलग चरणों में चल रही परियोजनाओं के पूरा होने के बाद परमाणु बिजली क्षमता 2031-32 तक करीब 22 GW पहुंच सकती है.
इसके बाद 2047 तक इसे 100 GW करने का लक्ष्य है. आसान भाषा में कहें तो आज की 8.78 GW क्षमता के मुकाबले परमाणु बिजली में करीब 11 गुना से ज्यादा बढ़ोतरी की तैयारी है.

कर्नाटक और तमिलनाडु में भी बढ़ेगा उत्पादन
इस विस्तार में दक्षिण भारत की बड़ी भूमिका है. कर्नाटक के कैगा में चार यूनिट पहले से चल रही हैं. अब कैगा-5 और 6 की दो नई यूनिट निर्माणाधीन हैं. दोनों की क्षमता 700-700 MW है. तमिलनाडु के कुडनकुलम में चार नई यूनिट निर्माणाधीन हैं, जिनकी कुल क्षमता 4,000 MW है. इसके अलावा कलपक्कम में 500 MW का PFBR भी इस विस्तार का हिस्सा है. राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश समेत दूसरे राज्यों में भी कई परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं निर्माण या शुरुआती चरण में हैं.
न्यूक्लियर पर इतना जोर क्यों?
परमाणु ऊर्जा को सरकार कम-कार्बन और लगातार बिजली देने वाले स्रोत के तौर पर देख रही है. सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर हैं, जबकि परमाणु संयंत्र लगातार बिजली पैदा कर सकते हैं. इसी वजह से क्लीन एनर्जी की तरफ बढ़ते हुए सरकार परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही है.
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत कोयले का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करने जा रहा है. लक्ष्य ऊर्जा के अलग-अलग स्रोतों के बीच संतुलन बनाते हुए कम-कार्बन बिजली की हिस्सेदारी बढ़ाना है.
साल 2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार बड़े परमाणु रिएक्टरों के साथ SMR (Small Modular Reactors) पर भी जोर दे रही है. सरकार के मुताबिक SHANTI Act, 2025 के बाद लाइसेंस प्राप्त निजी भारतीय कंपनियों और ज्वाइंट वेंचर के लिए भी परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भागीदारी का रास्ता खुला है.
सुरक्षा पर भी सरकार का जोर
परमाणु ऊर्जा के विस्तार के साथ सुरक्षा सबसे अहम मुद्दा है. सरकार ने कहा है कि परमाणु संयंत्रों की डिजाइन से लेकर निर्माण, संचालन और निगरानी तक हर स्तर पर सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है. परमाणु बिजली संयंत्रों की सुरक्षा की लगातार समीक्षा और निगरानी Atomic Energy Regulatory Board यानी AERB समेत संबंधित नियामक व्यवस्था के जरिए की जाती है.

यानी भारत की ऊर्जा कहानी में अब परमाणु शक्ति का हिस्सा तेजी से बढ़ाने की तैयारी है. 8.78 GW से शुरू होकर 2031-32 तक करीब 22 GW और फिर 2047 तक 100 GW का लक्ष्य, आने वाले वर्षों में देश के पावर सेक्टर की तस्वीर बदल सकता है.


