Joharlive Desk : साल 2021 शायद ही कभी कोई भूल पाएगा। दुनियाभर के इतर पूरा भारत या तो घरों में दुबका था, या फिर अस्पताल में। हर कोई यही दुआ कर रहा था कि बस वो उनके परिजन किसी तरह जिंदा बच जाएं। दुआ मांगते, इंतजार करते, तड़पते हुए करोड़ों लोगों ने जान गंवा दी। कारण था अचानक से आया एक वायरस “कोविड वायरस”। संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक कोविड महामारी से दुनियाभर में लगभग 1 करोड़ 49 लाख लोगों की मौत हो गई थी। छह साल बाद पता चला कि करोड़ों लोगों की जान लेना वाला कौन था, आखिर कहां बना था ये वारस, कैसे फैला, समझते हैं विस्तार से
वुहान लैब को मिली थी अमेरिकी फंडिंग
तुलसी गबार्ड के अनुसार, डॉ. फौसी ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीज (NIAID) के प्रमुख रहते हुए अमेरिकी टैक्सदाताओं के करोड़ों डॉलर चीन के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (WIV) तक पहुंचाने में भूमिका निभाई थी। आरोप है कि इस फंडिंग का इस्तेमाल चमगादड़ों में पाए जाने वाले कोरोना वायरस पर “गैन-ऑफ-फंक्शन” रिसर्च के लिए किया गया। इस तरह की रिसर्च में वायरस की क्षमता और प्रभाव को बढ़ाकर उसका अध्ययन किया जाता है। आलोचकों का कहना है कि ऐसी रिसर्च बेहद जोखिम भरी हो सकती है।
क्या लैब से लीक हुआ था कोरोना वायरस ?
कोरोना महामारी की शुरुआत से ही यह सवाल उठता रहा है कि वायरस प्राकृतिक रूप से फैला था या फिर किसी लैब से बाहर निकला था। कई वैज्ञानिक अभी भी प्राकृतिक उत्पत्ति के पक्ष में हैं, जबकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि वुहान लैब से वायरस के लीक होने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। गबार्ड का आरोप है कि लैब-लीक थ्योरी को व्यवस्थित तरीके से दबाने की कोशिश की गई, ताकि फंडिंग और रिसर्च से जुड़े लोगों पर सवाल न उठें।
खुफिया एजेंसियों को गुमराह करने का आरोप
जारी दस्तावेजों के आधार पर तुलसी गबार्ड ने दावा किया है कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के आकलन को प्रभावित किया गया। उनका कहना है कि कुछ चुनिंदा वैज्ञानिकों को सलाहकार के रूप में आगे किया गया, जिन्होंने यह निष्कर्ष पेश किया कि वायरस प्राकृतिक रूप से फैला था। बाद में इसी निष्कर्ष को व्यापक वैज्ञानिक सहमति के रूप में प्रचारित किया गया। गबार्ड का आरोप है कि इससे लैब-लीक की संभावना पर गंभीर चर्चा को कमजोर करने की कोशिश हुई।
सच छिपाने की हुई कोशिश ?
गबार्ड का कहना है कि जिन विशेषज्ञों ने आधिकारिक निष्कर्षों पर सवाल उठाए, उनकी बातों को महत्व नहीं दिया गया। उनके मुताबिक, महामारी की उत्पत्ति को लेकर मौजूद वैकल्पिक विचारों को सार्वजनिक बहस से दूर रखने की कोशिश की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति के संबंध में उपलब्ध सभी तथ्यों को जनता के सामने नहीं आने दिया गया। इसी वजह से कई वर्षों तक दुनिया असली तस्वीर से अनजान रही।
संसद में झूठ बोलने का भी आरोप
मामला यहीं नहीं रुकता। तुलसी गबार्ड ने डॉ. फौसी पर अमेरिकी संसद के सामने झूठ बोलने का भी आरोप लगाया है। उनके अनुसार, वर्ष 2024 में हुई एक सुनवाई के दौरान जब फौसी से पूछा गया कि क्या उन्होंने कोरोना वायरस की उत्पत्ति से जुड़े मामलों में FBI, CIA या अन्य खुफिया एजेंसियों के साथ बातचीत की थी, तो उन्होंने ऐसी किसी जानकारी से इनकार कर दिया था। हालांकि, गबार्ड का दावा है कि नए दस्तावेज इस बयान पर सवाल खड़े करते हैं और मामले की नई जांच की जरूरत महसूस कराते हैं।
व्हिसलब्लोअर्स को धमकाने का दावा
गबार्ड के कार्यालय ने यह भी कहा है कि कई व्हिसलब्लोअर्स ने गवाही दी है कि जिन अधिकारियों या विश्लेषकों ने आधिकारिक कहानी पर सवाल उठाए, उन्हें दबाव का सामना करना पड़ा। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें नौकरी से हटाने, पद से किनारे करने या करियर खराब करने जैसी धमकियां दी गईं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है।
‘डीप स्टेट’ की साजिश जैसा मामला: गबार्ड
बता दें कि पिछले महीने ही डोनाल्ड ट्रंप की खुफिया प्रमुख के पद से (अपने बीमार पति की देखभाल के लिए) इस्तीफा देने वाली तुलसी गबार्ड ने कहा कि सच को छिपाने के लिए जो तरीके अपनाए गए, वे सीधे तौर पर ‘डीप स्टेट’ (परदे के पीछे से सरकार चलाने वाले तंत्र) की साजिश जैसे हैं। गबार्ड ने पूरे मामले को लेकर कहा कि कोरोना महामारी ने करोड़ों अमेरिकियों और दुनिया भर के लोगों को असहनीय दर्द दिया है।
क्या फौसी ने संसद में झूठ बोला था?
गबार्ड ने आगे कहा कि सालों के झूठ, सेंसरशिप और सच को दबाने के बाद, अब अमेरिकी जनता पारदर्शिता और जवाबदेही की हकदार है। डॉ. फौसी जैसे नेताओं ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया, संसद से झूठ बोला और देश के राष्ट्रपति तक को जरूरी तथ्यों से दूर रखा।
गौरतलब है कि फिलहाल इन बेहद गंभीर और तीखे आरोपों पर डॉ. एंथनी फौसी या उनके प्रतिनिधियों की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या सफाई सामने नहीं आई है। हालांकि पूरे अमेरिकी राजनीति में इस खुलासे के बाद हड़कंप मचा हुआ है और लोगों के मन में एक साथ कईल सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
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