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    Home»झारखंड»कोडरमा के जंगलों में माइका माफियाओं का कब्जा, हाथी भटककर पहुंच रहे आबादी में
    झारखंड

    कोडरमा के जंगलों में माइका माफियाओं का कब्जा, हाथी भटककर पहुंच रहे आबादी में

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyApril 5, 2026Updated:April 5, 2026No Comments3 Mins Read3
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    माइका
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    Koderma : झारखंड के कोडरमा वाइल्ड लाइफ के छतरबर क्षेत्र में अवैध माइका खनन ने जंगल और वन्यजीवों के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। वन्यप्राणी आश्रयणी घोषित इस इलाके में खनन माफियाओं ने खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाते हुए दर्जनों अवैध खदान बना दिए हैं, जिससे प्राकृतिक संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है।

    8 किलोमीटर इलाके में फैला अवैध खनन का जाल

    आरआईटी संस्थान से करीब दो किलोमीटर अंदर शुरू होकर लगभग आठ किलोमीटर तक फैले जंगल में 50 से अधिक छोटे-बड़े अवैध खदान संचालित हो रहे हैं। छतरबर से लेकर बिहार सीमा दिबौर और झरकी विशनपुर तक जयंती, बुढ़िया, लकरमंदवा, खैरा, तुमरईया, बंडा और ललकी माइंस जैसे बड़े इलाकों में खनन धड़ल्ले से जारी है।

    विस्फोटों से दहल रहा जंगल, वन्यजीवों पर संकट

    दिन-रात हो रहे विस्फोट और पेड़ों की कटाई ने जंगल का माहौल पूरी तरह बदल दिया है। यह इलाका कभी जंगली हाथियों का स्थायी ठिकाना था, लेकिन अब लगातार शोर और खनन गतिविधियों के कारण हाथी अपना आवास छोड़ने को मजबूर हो गए हैं।

    भटककर आबादी में पहुंच रहे हाथी

    आवास उजड़ने के कारण हाथियों के झुंड अब कोडरमा और रजौली अनुमंडल क्षेत्र की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। 26 फरवरी को जयंती माइंस के पास विस्फोट की चपेट में आने से हाथियों का झुंड बिखर गया था, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई।

    हाईकोर्ट के निर्देश भी नहीं रोक पाए खनन

    वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने कोडरमा-रजौली एनएच-20 के एलाइनमेंट तक बदलने का निर्देश दिया था।
    इसके बावजूद जमीनी स्तर पर अवैध खनन पर कोई ठोस रोक नहीं लग पाई है, जिससे प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं।

    अवैध माइका की सप्लाई का पूरा नेटवर्क सक्रिय

    खनन से निकला माइका छतरबर, पुतो, बेकोबार, डुमरीडीहा रोड और मोरियावां के गोदामों तक पहुंचाया जा रहा है। इन इलाकों में अवैध रूप से माइका जमा कर बड़े पैमाने पर सप्लाई की जा रही है।

    गूगल मैप पर भी दिख रहा खनन का असर

    अवैध खनन की स्थिति का अंदाजा गूगल मैप से भी लगाया जा सकता है। जंगल के अंदर भले स्पष्ट तस्वीर न दिखे, लेकिन कई रास्तों पर लगातार वाहनों की आवाजाही इस पूरे नेटवर्क की पोल खोल रही है।

    प्रकृति और कानून दोनों पर खतरा

    वन्यजीव आश्रयणी जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस तरह का खनन न सिर्फ पर्यावरण के लिए खतरनाक है, बल्कि कानून व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो हाथियों समेत कई वन्यजीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

    Also Read : रांची रिम्स में चौंकाने वाला मामला: HIV संक्रमित महिला ने छिपाई सच्चाई, डॉक्टरों में बढ़ा संक्रमण का खतरा

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