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    Home»झारखंड»26 साल बाद मिला इंसाफ, बर्खास्त सिपाही की नौकरी बहाल करने का आदेश
    झारखंड

    26 साल बाद मिला इंसाफ, बर्खास्त सिपाही की नौकरी बहाल करने का आदेश

    Muskan ChoudharyBy Muskan ChoudharyMarch 28, 2026No Comments3 Mins Read8
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    हाईकोर्ट
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     Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में पुलिस कांस्टेबल गोपाल राम को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी को रद्द करते हुए दोबारा सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है। अदालत ने साफ कहा कि सेवा से बर्खास्त करना सबसे कठोर सजा है, इसलिए बिना पुख्ता सबूत के ऐसा फैसला सही नहीं ठहराया जा सकता।

    शराब पीने का आरोप, लेकिन नहीं मिला कोई प्रमाण

    मामले में मुख्य आरोप यह था कि कांस्टेबल गोपाल राम ने शराब के नशे में अपने वरिष्ठ अधिकारी से दुर्व्यवहार किया था। लेकिन कोर्ट ने पाया कि इस आरोप को साबित करने के लिए कोई मेडिकल जांच नहीं कराई गई थी और न ही कोई ठोस सबूत पेश किया गया। ऐसे में सिर्फ आरोप के आधार पर इतनी बड़ी सजा देना उचित नहीं माना गया।

    क्या था पूरा मामला

    गोपाल राम की नियुक्ति 15 जून 1988 को आर्म्ड गार्ड के रूप में गोविंदपुर थाना में हुई थी। आरोप है कि 1 मार्च 1997 को उन्होंने शराब के नशे में हंगामा किया। इसके बाद विभागीय कार्रवाई हुई और 1 मार्च 2000 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
    इसके खिलाफ उन्होंने अपील की, लेकिन 2001 में वह भी खारिज हो गई। फिर 2002 में पुनरीक्षण याचिका भी खारिज कर दी गई थी।

    निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलने की दलील

    याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का मौका नहीं दिया गया। गवाहों से जिरह करने का अवसर भी नहीं मिला और आरोप साबित करने के लिए जरूरी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। कोर्ट ने इन बिंदुओं को गंभीरता से लिया।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

    हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ‘Munna Lal vs Union of India’ मामले का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस सबूत के किसी कर्मचारी को इतनी कठोर सजा देना न्यायसंगत नहीं है।

    बर्खास्तगी समेत सभी आदेश रद्द

    कोर्ट ने गोपाल राम की बर्खास्तगी, अपील और पुनरीक्षण से जुड़े सभी आदेशों को रद्द कर दिया है। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि उन्हें फिर से सेवा में बहाल किया जाए।

    वेतन पर फैसला बाद में

    कोर्ट ने यह भी कहा कि बैक वेज यानी पिछले वेतन को लेकर फैसला बाद में लिया जाएगा। अगर जरूरी हुआ तो सरकार सजा पर दोबारा विचार कर नया आदेश जारी कर सकती है।

    फैसले से मिला बड़ा संदेश

    इस फैसले को कर्मचारियों के अधिकारों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि बिना पुख्ता सबूत और सही प्रक्रिया के किसी को कठोर सजा देना कानूनन गलत है।

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