रांची. रामगढ़ में औद्योगिक प्रदूषण को लेकर दायर जनहित याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई है. कोर्ट ने फिलहाल बिहार फाउंड्री एंड कास्टिंग लिमिटेड और दयाल स्टील लिमिटेड के खिलाफ किसी जारी वैधानिक उल्लंघन की पुष्टि नहीं की है, लेकिन पर्यावरणीय निगरानी को लगातार और प्रभावी बनाए रखने पर जोर दिया है. कोर्ट ने दोनों औद्योगिक इकाइयों की हर साल कम से कम दो बार जांच का निर्देश दिया है. इनमें एक निरीक्षण बिना पूर्व सूचना के करना होगा.
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने 14 सितंबर 2026 को यह आदेश दिया.
स्कूल-रिहायशी इलाकों के पास उद्योग
जनहित याचिका राम किशोर ने दायर की थी. इसमें आरोप लगाया गया था कि रामगढ़ की औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले धुएं, धूल और गैस से आसपास का इलाका प्रभावित हो रहा है. कोर्ट ने कहा कि रामगढ़ में रिहायशी इलाकों, स्कूलों, सार्वजनिक संस्थानों और जेल के आसपास भारी उद्योग मौजूद हैं. हालांकि, केवल आबादी या स्कूल के पास उद्योग होने से कानून का उल्लंघन साबित नहीं होता. उद्योगों को Air Act, Water Act और Environment Protection Act समेत अपनी स्वीकृत शर्तों का पालन करना होगा.
कोर्ट ने दामोदर नदी का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रदूषण प्रशासनिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहता. नदी रामगढ़, बोकारो और धनबाद से होते हुए पश्चिम बंगाल तक जाती है, इसलिए एक जगह का प्रदूषण दूसरे इलाकों को भी प्रभावित कर सकता है.
एयर क्वालिटी पर फिलहाल संतुष्ट, पानी की गुणवत्ता पर आगे जांच
रिकॉर्ड के मुताबिक दोनों उद्योगों के पास वैध Consent to Operate है. 22 से 31 जुलाई 2025 के CAAQMS आंकड़ों में पार्टिकुलेट मैटर निर्धारित सीमा के भीतर पाया गया. हालांकि VIVA इंटरनेशनल स्कूल के आसपास 10 किलोमीटर के दायरे में लिए गए पानी के नमूनों में फ्लोराइड, TDS और नाइट्रेट की मात्रा थोड़ी अधिक मिली.
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ इस रिपोर्ट से यह तय नहीं किया जा सकता कि पानी की गुणवत्ता में यह बदलाव औद्योगिक डिस्चार्ज की वजह से है या भू-वैज्ञानिक अथवा नगर निकाय से जुड़े कारणों से. बोर्ड को तीन महीने के भीतर दोबारा पानी के नमूने लेने होंगे. दामोदर नदी के संभावित प्रभावित हिस्सों में upstream और downstream दोनों जगह जांच होगी.
48 घंटे प्रदूषण बढ़ा तो 7 दिन में शो-कॉज, साल में दो निरीक्षण
कोर्ट ने दोनों उद्योगों की हर कैलेंडर वर्ष में कम से कम दो बार जांच का निर्देश दिया है. इनमें एक निरीक्षण बिना पूर्व सूचना के होगा. चिमनी उत्सर्जन, औद्योगिक अपशिष्ट, effluent और प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों की कार्यप्रणाली की जांच की जाएगी.
दोनों उद्योगों का Continuous Emission Monitoring Data बोर्ड के सर्वर से जुड़ा रहना चाहिए. अगर प्रदूषण का स्तर 48 घंटे से ज्यादा समय तक निर्धारित सीमा से ऊपर रहता है तो बोर्ड को सात दिनों के भीतर शो-कॉज नोटिस जारी करना होगा. उद्योग को जवाब के लिए 15 दिन मिलेंगे. जवाब संतोषजनक नहीं होने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
चार महीने में हाईकोर्ट को रिपोर्ट, शिकायत पर तीन दिन में कार्रवाई
बोर्ड को दोनों उद्योगों की अलग-अलग समेकित फाइल तैयार करनी होगी, जिसमें Environmental Clearance, Consent to Establish, Consent to Operate और पिछली चार निरीक्षण रिपोर्ट शामिल होंगी. दस्तावेजों की वैधता और नवीनीकरण की स्थिति भी दर्ज करनी होगी.
स्थानीय निवासी, स्कूल या जेल प्रशासन से औद्योगिक प्रदूषण की शिकायत मिलने पर रामगढ़ उपायुक्त कार्यालय को इसे तीन कार्यदिवस के भीतर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी तक भेजना होगा. बोर्ड के सदस्य सचिव को चार महीने के भीतर हाईकोर्ट में अनुपालन हलफनामा दाखिल करना होगा.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौजूदा रिकॉर्ड में दोनों उद्योगों की ओर से लगातार वैधानिक उल्लंघन साबित नहीं हुआ है. हालांकि, पर्यावरणीय मॉनिटरिंग और एनफोर्समेंट को और प्रभावी बनाने की जरूरत है. कोर्ट के निर्देशों का उद्देश्य मौजूदा निगरानी व्यवस्था को नियमित और प्रभावी बनाना है.
Also Read : सरकारी भाषा को आसान बनाना होगा, लोगों को कठिन हिन्दी से दिक्कत हो रही है : प्रवीण टोप्पो
