कनिका राणा
देश AI और कोडिंग की बात कर रहा है. प्रधानमंत्री मोदी बीते 1 जुलाई 2015 से ‘डिजिटल इंडिया’ का सपना दिखा रहे हैं. लेकिन रफ्तार ऐसी कि कछुए चाल वाली कहावत भी शर्म के मारे पानी मांगे. फलाफल? महज कोरी गप्पबाजी से गिनती भर के कदम आगे.
नीट परीक्षा में हुई तथाकथित गड़बड़ियों के बाद जंतर मंतर पर हुए आंदोलन ने देशभर का ध्यान शिक्षा और उसके स्तर पर खींचा है. इस आंदोलन का नेतृत्व करनेवालों में से एक कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने अगले अभियान के तहत स्कूल ठीक करो अभियान की शुरूआत की है. इसी बीच बीते 7 जुलाई 2026 को आई यू-डायस की एक रिपोर्ट ने अचानक सबका ध्यान खींचा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे भारत के 10,05,245 सरकारी स्कूलों में से सिर्फ 2,56,165 स्कूलों में यानी 25.5% में ही फंक्शनल डेस्कटॉप मौजूद हैं. मतलब हर 4 में से 3 सरकारी स्कूल इस बुनियादी सुविधा से महरूम हैं. इस ढुलमुल रवैये का परिणाम ये है कि शैक्षणिक सत्र 2023-24 से लेकर 2025-26 के बीच सरकारी स्कूलों में लगभग 86 लाख छात्रों की संख्या में कमी को दर्ज किया गया है.
सरकारी स्कूलों में छात्रों का पंजीकरण शैक्षणिक सत्र 2023-24 में कुल 12.75 करोड़ था. लेकिन 2025-26 में यह घटकर सिर्फ में 11.89 करोड़ ही रह गया है. अंदाजा लगाया जा रहा है कि ये छात्र सरकारी स्कूलों के बजाय निजी स्कूलों में दाखिला ले चुके हैं.
बता दें, यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन UDISE रिपोर्ट शित्रा मंत्रालय की ओर से जारी की जाती है. इस रिपोर्ट में हर साल स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या, छात्रों की दाखिले की संख्या जैसी कई अहम जानकारी रिपोर्ट के जरिये पेश की जाती है.
झारखंड के हालात और भी बदतर
यू-डायस+ 2025-26 की रिपोर्ट ने झारखंड की डिजिटल शिक्षा की भी पोल खोल कर रख दी है. रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में कुल 35,819 सरकारी स्कूल हैं. एक तरफ जहां देश के मात्र 25.5% सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर है, वहीं झारखंड सिर्फ 13.3% पर अटका हुआ है.
रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ 4,764 स्कूलों में ही फंक्शनल डेस्कटॉप या पीसी चालू हालत में मिला, यानी महज़ 13.3%. बाकी बचे 31,055 स्कूल, यानी राज्य के पूरे 86.7% सरकारी स्कूल आज भी बिना कंप्यूटर के चल रहे हैं. राज्य के हज़ारों गांव-देहात के बच्चे उस डिजिटल दुनिया से कोसों दूर हैं, जिसका ज़िक्र केंद्र सरकार बार-बार करती है.
अब बात करें दूसरे राज्यों से तुलना की, तो झारखंड की स्थिति उत्तर प्रदेश के 6.4%, मध्य प्रदेश के 7.6% और बिहार के 9.5% से थोड़ी बेहतर ज़रूर है, लेकिन असम के 13.1% और छत्तीसगढ़ के 13.2% के लगभग बराबर ही है. वहीं ओडिशा 17.1%, आंध्र प्रदेश 17.6% और पश्चिम बंगाल 18.4% के साथ झारखंड से काफी आगे निकल चुके हैं.
यानी साफ है, झारखंड देश के सबसे पिछड़े राज्यों की कतार में खड़ा है. पंजाब में 95.2% और तमिलनाडु में 85.8% सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा है, यानी लगभग हर स्कूल तक पहुंच चुकी है. यही तुलना झारखंड की हालत को और शर्मनाक बना देती है.

63.2 प्रतिशत प्राइवेट स्कूलों में है कंप्यूटर
रिपोर्ट में एक और आंकड़ा है जो चौंकाता है, सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बीच की डिजिटल खाई. प्राइवेट स्कूलों में 63.2% स्कूलों में कंप्यूटर मौजूद है, जबकि सरकारी स्कूल इससे 37.7 प्रतिशत अंक पीछे हैं. यानी जो बच्चे प्राइवेट स्कूल अफोर्ड नहीं कर सकते, वो डिजिटल शिक्षा से भी उतने ही दूर रह जाते हैं.
पिछले चार साल के आंकड़े देखें तो देशभर के सरकारी स्कूलों में फंक्शनल पीसी की उपलब्धता सिर्फ 5.3 प्रतिशत अंक बढ़ी है, 2022-23 के 20.2% से 2025-26 में 25.5% तक. सुधार की रफ्तार इतनी धीमी है कि झारखंड जैसे राज्यों तक डिजिटल इंडिया का सपना पहुंचने में अभी बरसों लग सकते हैं.
देश में सिर्फ 11.7% सरकारी स्कूलों में फंक्शनल लैपटॉप या नोटबुक है, यानी डेस्कटॉप के अलावा दूसरे डिजिटल संसाधन तो और भी कम हैं. ऐसे में झारखंड के बच्चों के लिए कंप्यूटर साक्षरता आज भी एक सपना ही बनकर रह गई है, जबकि नीतियां कागज़ों पर हर बच्चे को कोडिंग और AI सिखाने का वादा करती हैं.


