हरियाणा के बलाली गांव की उस लड़की ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उसका नाम दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच पर लिया जाएगा. बचपन में पिता का साया सिर से उठ गया, लेकिन मां और परिवार ने उसे कमजोर नहीं पड़ने दिया. अखाड़े में समाज की बंदिशों से लड़ते हुए विनेश ने कुश्ती को अपना रास्ता बनाया. रियो में चोट ने उनका सपना तोड़ा, लेकिन उन्होंने वापसी की. पेरिस में पदक हाथ से निकल गया, लेकिन उनकी कहानी वहीं खत्म नहीं हुई.
आज विनेश फोगाट की पहचान सिर्फ एक पहलवान की नहीं है. वह एक ऐसी महिला की कहानी बन चुकी हैं, जिसने मैट पर विरोधियों से मुकाबला किया, खेल व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई, सड़क पर आंदोलन किया और फिर राजनीति के मैदान में उतरकर अपनी नई पारी शुरू की. हाल ही में बृजभूषण शरण सिंह के मामले में दिल्ली की अदालत के फैसले के बाद उनकी तीखी प्रतिक्रिया ने एक बार फिर दिखाया कि उनकी लड़ाई अब भी जारी है. 3 अगस्त 2026 को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व WFI अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह और पूर्व WFI सहायक सचिव विनोद तोमर को महिला पहलवानों से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में बरी कर दिया. इसके बाद विनेश ने कहा कि महिला पहलवान इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देंगी.
बलाली गांव से शुरू हुआ सफर
विनेश फोगाट का जन्म 25 अगस्त 1994 को हरियाणा के बलाली गांव में हुआ. वह ऐसे परिवार में पली-बढ़ीं, जहां कुश्ती सिर्फ खेल नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा थी. उनके चाचा महावीर सिंह फोगाट ने उन्हें कुश्ती की शुरुआती बारीकियां सिखाईं. लेकिन गांव की लड़की के लिए अखाड़े तक पहुंचना इतना आसान नहीं था. लड़कियों के कुश्ती लड़ने, छोटे खेल परिधान पहनने और पुरुषों के साथ मुकाबला करने को लेकर सामाजिक सवाल उठते थे. परिवार ने इन सवालों के सामने झुकने के बजाय विनेश का साथ दिया.
जब विनेश बहुत छोटी थीं, तभी उनके पिता राजपाल की हत्या हो गई. पिता के बिना बचपन गुजारना उनके लिए आसान नहीं था. लेकिन मां प्रेमलता और परिवार ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया. यही वह दौर था जब कुश्ती उनके लिए खेल से बढ़कर जिंदगी का रास्ता बनती गई.
अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहली पहचान
विनेश ने 2013 में नई दिल्ली में आयोजित एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी शुरू की. उसी साल राष्ट्रमंडल कुश्ती चैंपियनशिप में उन्होंने रजत पदक हासिल किया. 2014 उनके करियर का बड़ा मोड़ साबित हुआ. ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता. इसी साल इंचियोन एशियाई खेलों में कांस्य पदक हासिल किया. इसके बाद 2015 की एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में रजत पदक ने यह संकेत दे दिया कि विनेश आने वाले वर्षों में भारतीय कुश्ती का बड़ा नाम बनने वाली हैं.
रियो में चोट ने तोड़ा सपना, लेकिन हिम्मत नहीं
2016 का रियो ओलंपिक विनेश के करियर का सबसे दर्दनाक अध्याय रहा. वह पदक की मजबूत दावेदार थीं, लेकिन क्वार्टर फाइनल मुकाबले में घुटने में गंभीर चोट लग गई. उन्हें स्ट्रेचर पर मैट से बाहर ले जाना पड़ा. ओलंपिक पदक का सपना अचानक टूट गया. सर्जरी हुई और लंबे समय तक वह कुश्ती से दूर रहीं. लेकिन विनेश ने इस चोट को अपने करियर का अंत नहीं बनने दिया. करीब पांच महीने बाद उन्होंने मैट पर वापसी की. यह वापसी उनके करियर की सबसे बड़ी मिसालों में शामिल हो गई. रियो में स्ट्रेचर पर बाहर गई खिलाड़ी ने अगले कुछ वर्षों में खुद को फिर से दुनिया की शीर्ष महिला पहलवानों में स्थापित कर लिया.
2017 में एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में विनेश ने रजत पदक जीता. 2018 में उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में 50 किलोग्राम वर्ग का स्वर्ण पदक हासिल किया. इसी साल जकार्ता एशियाई खेलों में उन्होंने इतिहास रचा. विनेश एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं.
दो साल पहले जो खिलाड़ी गंभीर चोट के कारण स्ट्रेचर पर बाहर हुई थी, वही अब एशिया की चैंपियन बन चुकी थी. यह सिर्फ एक पदक नहीं था, बल्कि उनकी वापसी की कहानी का सबसे मजबूत जवाब था. 2018 में उन्होंने पहलवान सोमवीर राठी से शादी की.
विश्व चैंपियनशिप में भी छोड़ी छाप
2019 में विनेश ने एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता. उसी साल कजाकिस्तान में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में भी उन्होंने कांस्य पदक हासिल किया. इस पदक के साथ उन्होंने टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया. 2020 में रोम की रैंकिंग प्रतियोगिता में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता. हालांकि टोक्यो ओलंपिक में वह पदक नहीं जीत सकीं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कुश्ती में उनकी जगह मजबूत बनी रही. 2022 में बेलग्रेड विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने विश्व स्तर पर अपनी निरंतरता भी साबित की.
राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण की हैट्रिक
राष्ट्रमंडल खेल विनेश के लिए खास रहे. 2014 में 48 किलोग्राम वर्ग, 2018 में 50 किलोग्राम वर्ग और 2022 में 53 किलोग्राम वर्ग में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता. तीन अलग-अलग संस्करणों में स्वर्ण पदक जीतना उनकी निरंतरता का प्रमाण था. भारतीय महिला कुश्ती में उनका नाम अब एक स्थापित पहचान बन चुका था.

विनेश की उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 2016 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया. 2019 में वह लॉरियस वर्ल्ड स्पोर्ट्स अवार्ड्स के लिए नामांकित होने वाली पहली भारतीय बनीं. लेकिन विनेश की पहचान सिर्फ पुरस्कार जीतने वाली खिलाड़ी की नहीं रही. वह खेल व्यवस्था और खिलाड़ियों के अधिकारों को लेकर भी सवाल उठाने लगीं. यही मुखरता आगे चलकर उनके जीवन का एक नया अध्याय लिखने वाली थी.
अखाड़े से जंतर-मंतर तक पहुंची लड़ाई
2023 में भारतीय कुश्ती का सबसे बड़ा विवाद सामने आया. विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया समेत कई शीर्ष पहलवानों ने तत्कालीन WFI अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू किया. महिला पहलवानों ने बृजभूषण पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए. आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय मुद्दा बन गया. खेल की दुनिया से बाहर निकलकर यह मामला राजनीति, महिला सुरक्षा और खेल प्रशासन से जुड़ी बहस का हिस्सा बन गया. विनेश इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनीं. जिस खिलाड़ी ने अब तक मैट पर मुकाबले लड़े थे, वह पहली बार सार्वजनिक और राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में दिखाई दी.
बृजभूषण मामले में अदालत का फैसला और विनेश की नई लड़ाई
इस संघर्ष का कानूनी अध्याय अगस्त 2026 में एक अहम मोड़ पर पहुंचा. 3 अगस्त को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को महिला पहलवानों से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में बरी कर दिया. अदालत ने अभियोजन के साक्ष्यों और गवाहियों में विरोधाभासों को महत्वपूर्ण माना.
फैसले के बाद बृजभूषण ने इसे अपने लिए बड़ी राहत बताया और कहा कि वह शुरुआत से खुद को निर्दोष बताते रहे हैं. दूसरी ओर विनेश फोगाट ने फैसले पर निराशा जताई और कहा कि महिला पहलवानों ने अपने वकीलों को उच्च अदालत में अपील करने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शुरुआत से पूरा सिस्टम बृजभूषण को बचाने में लगा रहा. यानी अदालत का फैसला आने के बाद भी यह कहानी खत्म नहीं हुई है. अब इसकी अगली लड़ाई कानूनी मंच पर लड़ी जानी है.
पेरिस ओलंपिक में सपना फिर अधूरा रह गया
2024 का पेरिस ओलंपिक विनेश के करियर का शायद सबसे भावुक अध्याय रहा. उन्होंने महिलाओं के 50 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन करते हुए सेमीफाइनल तक का सफर तय किया और ओलंपिक कुश्ती के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं. देश की उम्मीदें अब स्वर्ण पदक पर टिक गई थीं. लेकिन फाइनल से पहले वजन जांच में उनका वजन निर्धारित सीमा से थोड़ा अधिक पाया गया. उन्हें प्रतियोगिता से अयोग्य घोषित कर दिया गया. एक बार फिर विनेश पदक के बेहद करीब पहुंचकर खाली हाथ रह गईं. उन्होंने खेल पंचाट में अपील भी की, लेकिन उनकी अपील सफल नहीं हुई. पेरिस की घटना ने पूरे देश को भावुक कर दिया. लेकिन विनेश ने इसे अपनी पहचान का आखिरी अध्याय नहीं बनने दिया.
पेरिस ओलंपिक के बाद विनेश ने राजनीति में कदम रखा. उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर हरियाणा की जुलाना विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. यह बदलाव सिर्फ पेशे का बदलाव नहीं था. एक खिलाड़ी जिसने वर्षों तक खेल व्यवस्था के भीतर और बाहर संघर्ष किया था, अब लोकतांत्रिक राजनीति के मंच पर पहुंच चुकी थी. अखाड़े में विरोधी पहलवान होते थे. राजनीति में मुद्दे और नीतियां सामने थीं. लेकिन विनेश की सार्वजनिक छवि में संघर्ष की वह कहानी बनी रही, जिसने उन्हें खेल जगत से बाहर भी पहचान दिलाई.
विनेश फोगाट की कहानी किसी एक जीत या हार पर खत्म नहीं होती. यह उस सफर की कहानी है, जिसमें हर मोड़ पर उन्हें खुद को फिर से साबित करना पड़ा. कभी समाज की सोच के खिलाफ, कभी चोट के खिलाफ, कभी खेल व्यवस्था के सवालों के बीच और कभी उस सपने के लिए, जो पेरिस में आखिरी पल में उनसे दूर हो गया.


