मुस्कान चौधरी
“सपने वो नहीं होते जो आप सोते समय देखते हैं, सपने वो होते हैं जो आपको सोने नहीं देते.”
यह सिर्फ एक प्रेरणादायक वाक्य नहीं था. यह डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की पूरी जिंदगी का दर्शन था. उन्होंने जो कहा, उसे खुद जीकर भी दिखाया. शायद यही वजह थी कि 25 जुलाई 2002 को जब उन्होंने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, तब देश ने सिर्फ एक नए राष्ट्रपति का स्वागत नहीं किया. देश ने पहली बार राष्ट्रपति भवन में एक ऐसे शख्स को प्रवेश करते देखा, जिसकी पहचान राजनीति नहीं, बल्कि विज्ञान, सादगी, ईमानदारी और शिक्षा थी. उस दिन करोड़ों भारतीयों को यह भरोसा मिला कि सपनों की उड़ान किसी भी साधारण इंसान को देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचा सकती है.
राष्ट्रपति भवन की भव्य सीढ़ियों पर खड़ा वह शख्स किसी पारंपरिक राजनेता की तरह नहीं दिखता था. उसके लंबे सफेद बाल थे, चेहरे पर मुस्कान थी और आंखों में भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना. यही वजह थी कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी लोग उन्हें सिर्फ महामहिम नहीं, बल्कि “पीपुल्स प्रेसिडेंट” कहकर पुकारते रहे.
रामेश्वरम का वह बच्चा, जिसने कभी सपने देखना नहीं छोड़ा
तमिलनाडु के छोटे से द्वीप शहर रामेश्वरम में जन्मे अबुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम का बचपन किसी भी आम भारतीय बच्चे की तरह संघर्षों से भरा था. उनके पिता जैनुलाब्दीन नाव चलाते थे और परिवार की आमदनी बहुत सीमित थी. घर में पैसे कम थे, लेकिन संस्कार, अनुशासन और मेहनत की सीख भरपूर थी.
बचपन में कलाम सुबह-सुबह अखबार बांटते थे. पढ़ाई के साथ परिवार की जिम्मेदारियां भी निभाते थे. आर्थिक तंगी ने उन्हें कभी कमजोर नहीं बनाया. बल्कि हर मुश्किल ने उन्हें और मजबूत किया. वे जानते थे कि हालात चाहे जैसे हों, अगर इरादे मजबूत हों तो मंजिल जरूर मिलती है. यही सोच उन्हें रामेश्वरम की गलियों से राष्ट्रपति भवन तक ले गई.
पढ़ाई को बनाया अपनी सबसे बड़ी ताकत
डॉ. कलाम का मानना था कि शिक्षा इंसान की किस्मत बदल सकती है. उन्होंने 1954 में सेंट जोसेफ कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से फिजिक्स में स्नातक किया. इसके बाद मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. यही पढ़ाई आगे चलकर उनके वैज्ञानिक जीवन की सबसे मजबूत नींव बनी.
वे अक्सर कहते थे कि ज्ञान ही इंसान की सबसे बड़ी ताकत है. शायद यही वजह थी कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी उन्होंने छात्रों से मिलना कभी नहीं छोड़ा. उनके लिए क्लासरूम किसी भी बड़े मंच से ज्यादा महत्वपूर्ण था.
विज्ञान के रास्ते भारत को बनाया आत्मनिर्भर
डॉ. कलाम का वैज्ञानिक सफर भारत के इतिहास का सुनहरा अध्याय है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO में उन्होंने देश के पहले स्वदेशी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल SLV-III के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसी मिशन के जरिए रोहिणी उपग्रह को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित किया गया और भारत अंतरिक्ष तकनीक वाले चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया.
इसके बाद उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का नेतृत्व किया. अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलों के सफल विकास ने भारत की रक्षा क्षमता को नई मजबूती दी. इसी योगदान के कारण पूरा देश उन्हें “मिसाइल मैन ऑफ इंडिया” के नाम से जानने लगा.
पोखरण-II परमाणु परीक्षण में भी उनकी भूमिका बेहद अहम रही. विज्ञान उनके लिए सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित विषय नहीं था. वे विज्ञान को देश की सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और विकास का सबसे मजबूत आधार मानते थे.
जब राष्ट्रपति भवन में पहुंचा एक शिक्षक
25 जुलाई 2002 को उन्होंने राष्ट्रपति पद की शपथ ली. यह भारतीय लोकतंत्र का एक अनोखा पल था. पहली बार देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद एक ऐसे व्यक्ति के पास था, जिसने अपनी पूरी जिंदगी राजनीति से दूर रहकर विज्ञान और शिक्षा को समर्पित की थी.
राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनका व्यवहार नहीं बदला. वे बच्चों से उसी आत्मीयता से मिलते थे, जैसे कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों से मिलता है. स्कूलों और कॉलेजों में जाना, छात्रों के सवाल सुनना और उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया. वे हमेशा कहते थे कि भारत का भविष्य संसद की इमारत में नहीं, बल्कि देश के स्कूलों और कॉलेजों में बैठा हर छात्र तय करेगा. यही वजह थी कि युवा उन्हें अपना सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत मानते थे.
राष्ट्रपति भवन की चमक-दमक कभी उनके व्यक्तित्व पर हावी नहीं हुई. वे बेहद सादगी से रहते थे. उन्हें दिखावा पसंद नहीं था. किताबें पढ़ना, छात्रों से बातचीत करना और नए विचारों पर चर्चा करना उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था.
वे भारत के पहले अविवाहित राष्ट्रपति भी बने. लेकिन उन्होंने कभी अकेलापन महसूस नहीं किया, क्योंकि पूरा देश उनका परिवार बन चुका था. राष्ट्रपति भवन के कर्मचारी भी बताते थे कि डॉ. कलाम हर व्यक्ति से सम्मान और अपनापन के साथ पेश आते थे. यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी.
पुरस्कारों से कहीं बड़ा था लोगों का प्यार
देश ने उनके योगदान को कई बड़े सम्मानों से सम्मानित किया. उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण और भारत रत्न जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिले. लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कोई पुरस्कार नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों का विश्वास और प्यार था. उन्होंने अपनी किताबों के जरिए भी युवाओं को नई सोच दी. India 2020, Wings of Fire, Ignited Minds और My Journey जैसी किताबें आज भी लाखों युवाओं को सपने देखने और उन्हें पूरा करने की प्रेरणा देती हैं.
27 जुलाई 2015 को डॉ. कलाम भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिलॉन्ग में छात्रों को संबोधित कर रहे थे. वे हमेशा की तरह भारत के भविष्य, युवाओं की भूमिका और विकास की बात कर रहे थे. भाषण के दौरान अचानक वे मंच पर गिर पड़े. अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके.
शायद दुनिया में बहुत कम ऐसे लोग होंगे, जिन्होंने अपने जीवन का आखिरी पल भी वही काम करते हुए बिताया हो, जिसे वे सबसे ज्यादा प्यार करते थे. डॉ. कलाम ने आखिरी सांस भी छात्रों के बीच ली. यही उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान बन गई.
25 जुलाई सिर्फ एक तारीख नहीं, एक प्रेरणा है
भारतीय लोकतंत्र में कई राष्ट्रपति आए और गए. सभी ने अपने-अपने तरीके से इस पद की गरिमा बढ़ाई. लेकिन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की पहचान सबसे अलग रही. उन्होंने राष्ट्रपति पद को जनता से जोड़ दिया. उन्होंने दिखाया कि देश का सर्वोच्च पद पाने के लिए राजनीतिक विरासत नहीं, बल्कि ईमानदारी, मेहनत, ज्ञान और राष्ट्र के प्रति समर्पण भी काफी है.
आज भी जब कोई छात्र बड़ा सपना देखने की हिम्मत करता है, जब कोई युवा कठिन हालात के बावजूद हार नहीं मानता या जब कोई शिक्षक अपने विद्यार्थियों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है, तब कहीं न कहीं डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की सोच जीवित दिखाई देती है. यही वजह है कि 25 जुलाई 2002 सिर्फ शपथ ग्रहण की तारीख नहीं है. यह उस दिन की याद है, जब राष्ट्रपति भवन में सत्ता का नहीं, बल्कि सादगी, विज्ञान, शिक्षा और सपनों का प्रवेश हुआ. और शायद यही डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की सबसे बड़ी विरासत भी है.

