Ranchi : अपराधी अक्सर यह सोच लेते हैं कि अगर किसी वारदात के बाद वे लंबे समय तक बच निकले, तो मामला अपने आप ठंडा पड़ जाएगा। खासकर महिलाओं के खिलाफ अपराध में यह सोच ज्यादा देखने को मिलती है। लेकिन अब कानून और अदालतों का रुख साफ है कि समय बीत जाने से अपराध खत्म नहीं होता। अगर पीड़िता हिम्मत जुटाकर सामने आती है और साक्ष्य मजबूत हैं, तो सालों बाद भी आरोपी को सजा मिल सकती है।
देरी से शिकायत अब कमजोरी नहीं
पहले अक्सर यह कहा जाता था कि अगर घटना के तुरंत बाद एफआईआर दर्ज नहीं हुई, तो मामला कमजोर हो जाता है। लेकिन अब अदालतें इस सोच से आगे बढ़ चुकी हैं। न्यायपालिका मानती है कि हमारे समाज में पीड़िता के लिए तुरंत शिकायत करना आसान नहीं होता। परिवार का दबाव, समाज का डर और आरोपी की धमकी जैसे कई कारण सामने आते हैं। ऐसे में अगर पीड़िता देर से भी शिकायत करती है, तो सिर्फ देरी के आधार पर केस को खारिज नहीं किया जा सकता। अगर बयान भरोसेमंद है और आसपास के हालात उससे मेल खाते हैं, तो अदालत उसे पर्याप्त मानती है।
कानून हुआ और सख्त
नए आपराधिक कानूनों के लागू होने के बाद महिलाओं से जुड़े मामलों में सजा को लेकर और स्पष्टता आई है।
- बीएनएस की धारा 74 के तहत अगर कोई महिला की लज्जा भंग करने की कोशिश करता है, तो उसे 1 से 5 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।
- बीएनएस की धारा 62 के तहत दुष्कर्म के प्रयास के मामलों में भी कड़ी सजा का प्रावधान है, जिसमें मुख्य अपराध की सजा का आधा हिस्सा तक दिया जा सकता है।
इन प्रावधानों से साफ है कि कानून अब ऐसे मामलों में किसी तरह की नरमी नहीं बरतता।
तकनीक ने जांच को मजबूत किया
आज के दौर में जांच पहले से ज्यादा मजबूत हो गई है। डिजिटल रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा, सीसीटीवी और फॉरेंसिक तकनीक की मदद से पुराने मामलों में भी साक्ष्य जुटाना आसान हुआ है। यही वजह है कि कई पुराने केस भी अब खुल रहे हैं और आरोपियों तक पहुंच बन रही है।
अपराधियों के लिए साफ संदेश
कानून का सीधा संदेश है कि समय बीत जाने से अपराध मिटता नहीं है। अगर किसी ने महिला की गरिमा से खिलवाड़ किया है, तो उसे कभी भी जवाब देना पड़ सकता है। रांची समेत देशभर में पुलिस और न्यायपालिका अब ऐसे मामलों को गंभीरता से ले रही है।
पीड़िता के लिए हिम्मत जरूरी
सबसे अहम बात यह है कि अगर पीड़िता आज भी न्याय के लिए सामने आती है, तो कानून उसके साथ खड़ा है। उसे वही सुरक्षा और अधिकार मिलेंगे, जो घटना के वक्त मिलने चाहिए थे। इस बदले हुए माहौल में यह साफ है कि अब चुप्पी नहीं, बल्कि आवाज उठाने से न्याय की राह खुलती है।
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