रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने दिव्यांग अभ्यर्थियों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि शारीरिक दक्षता परीक्षा में महज तीन सेकेंड की देरी के आधार पर किसी दिव्यांग अभ्यर्थी को सरकारी नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता.
जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने दुमका जिले में चौकीदार नियुक्ति से जुड़े मामले में अभ्यर्थी को नियुक्ति का हकदार माना है. अदालत ने राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर अभ्यर्थी को नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया है.
क्या है पूरा मामला
यह मामला दुमका जिले में चौकीदार के 328 पदों पर नियुक्ति के लिए जारी विज्ञापन संख्या 01/2025 से जुड़ा है. इस भर्ती प्रक्रिया में शामिल एक दिव्यांग महिला अभ्यर्थी ने लिखित परीक्षा सफलतापूर्वक पास कर ली थी. इसके बाद उसे शारीरिक दक्षता परीक्षा के लिए बुलाया गया. भर्ती प्रक्रिया के तहत आयोजित दौड़ में अभ्यर्थी को सामान्य अभ्यर्थियों के साथ शामिल किया गया.
याचिकाकर्ता ने दौड़ पूरी करने के लिए निर्धारित 10 मिनट के बजाय 10 मिनट 3 सेकेंड का समय लिया. यानी वह निर्धारित समय से केवल तीन सेकेंड पीछे रह गई. इसी तीन सेकेंड की देरी को आधार बनाकर चयन प्रक्रिया में उसे अयोग्य घोषित कर दिया गया. अभ्यर्थी का सवाल था कि जब वह दिव्यांग श्रेणी से आती है, तो उसकी दिव्यांगता को ध्यान में रखते हुए शारीरिक परीक्षा में उचित सुविधा क्यों नहीं दी गई?
दरअसल, विवाद केवल निर्धारित समय से तीन सेकेंड अधिक लेने का नहीं था. याचिकाकर्ता का कहना था कि शारीरिक परीक्षा के दौरान उसकी दिव्यांगता के अनुरूप न तो अतिरिक्त समय दिया गया और न ही कोई दूसरी विशेष व्यवस्था की गई. सामान्य अभ्यर्थियों के लिए निर्धारित मानक पर उसे परखकर बाहर कर दिया गया. इसके बाद उसने अपने अधिकारों के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की.
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत उचित सुविधा की मांग
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता शुभम मिश्रा ने पक्ष रखा. उन्होंने अदालत को बताया कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 2(वाई) और धारा 20 के तहत दिव्यांग व्यक्तियों को उचित सुविधा उपलब्ध कराना सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी है.
धारा 2(वाई) में उचित सुविधा की परिभाषा दी गई है. इसके तहत दिव्यांग व्यक्ति की जरूरत के मुताबिक जरूरी और उपयुक्त बदलाव या व्यवस्था उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि वह दूसरे लोगों के समान अधिकारों का इस्तेमाल कर सके. वहीं, धारा 20 सरकारी रोजगार में दिव्यांग व्यक्तियों के साथ भेदभाव रोकने और उचित सुविधा उपलब्ध कराने से संबंधित है.
अधिवक्ता ने अपनी दलील के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘विकास कुमार बनाम यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन’ का भी हवाला दिया. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने उचित सुविधा को दिव्यांग व्यक्तियों के समानता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा माना था.
सरकार ने कहा- नियमों में अतिरिक्त समय देने का प्रावधान नहीं
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि चौकीदार नियुक्ति के निर्धारित नियमों में शारीरिक परीक्षा के दौरान दिव्यांग अभ्यर्थियों को अतिरिक्त समय देने का कोई प्रावधान नहीं है. इसलिए निर्धारित समय से अधिक समय लेने पर अभ्यर्थी को अयोग्य घोषित किया गया.
हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने स्पष्ट किया कि भर्ती के नियम या सरकारी अधिसूचना संसद द्वारा बनाए गए कानून के प्रावधानों के विपरीत नहीं हो सकते. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत उचित सुविधा उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है. किसी दिव्यांग अभ्यर्थी को उसकी जरूरत के अनुरूप सुविधा दिए बिना सामान्य मानकों के आधार पर अयोग्य घोषित करना कानून के अनुरूप नहीं है.
सुनवाई के दौरान अदालत ने दुमका जिले में दिव्यांग श्रेणी के लिए आरक्षित पदों की स्थिति पर भी गौर किया. अदालत के सामने यह तथ्य आया कि दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित कुल 13 पदों में से 11 पद अब भी रिक्त हैं.
अदालत ने मामले के तथ्यों, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों और उचित सुविधा के अधिकार को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता को चौकीदार पद पर नियुक्ति का हकदार माना. साथ ही राज्य सरकार को आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करने का निर्देश दिया.


