बिहार की राजनीति में बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम जितना बड़ा कर के दिखाया जा रहा है उतना भी बड़ा नहीं है लेकिन इस जीत को कम कर के भी नहीं आंका जाना चाहिए.
प्रशांत किशोर ने वह सीट जीत ली है जिस पर 1995 के बाद से भाजपा कभी नहीं हारी थी. जन सुराज पार्टी के गठन के बाद यह उनकी पहली चुनावी जीत है.
उन्होंने भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा को 19,324 वोटों से हराया. उन्हें 64,151 वोट मिले, जबकि भाजपा को 44,827 वोट मिले. राजद तीसरे स्थान पर सिमट गई. लेकिन सवाल यह है कि क्या बांकीपुर का यह नतीजा पूरे बिहार का मूड बताता है? ऐसा कहना जल्दबाजी होगी.
एक सीट का चुनाव, पूरे बिहार का जनादेश नहीं
भारतीय राजनीति में अक्सर उपचुनावों को विधानसभा या लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल बता कर पेश किया जाता है. लेकिन हर बार यह आकलन सही साबित नहीं होता. यह चुनाव उस सीट पर हुआ जो भाजपा के अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सांसद बनने के बाद खाली हुई थी.
मतदान भी महज 34.30% रहा, जो पिछले विधानसभा चुनाव से करीब सात प्रतिशत कम था. कम मतदान वाले उपचुनावों में स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार की छवि और संगठनात्मक सक्रियता कई बार राज्यव्यापी मुद्दों से ज्यादा प्रभावी हो जाते हैं.
यही वजह है कि इस जीत को सीधे-सीधे पूरे बिहार के राजनीतिक रुझान का प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि प्रशांत किशोर इस जीत को भुनाएंगे राजनीति में धारणा (Perception) कई बार वास्तविकता से ज्यादा ताकतवर होती है. प्रशांत किशोर इस जीत को सिर्फ एक विधानसभा सीट की जीत बनाकर नहीं छोड़ेंगे. वह इसे एक नैरेटिव में बदलने की कोशिश करेंगे. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले यह जीत उनकी राजनीति के लिए ऑक्सीजन का काम करेगा.
अब तक जन सुराज पर सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या पार्टी वोट को सीट में बदल सकती है? बांकीपुर ने कम से कम इस सवाल का आंशिक जवाब दे दिया है.
प्रशांत किशोर ने दो बड़े नैरेटिव गढ़े
इस चुनाव में प्रशांत किशोर ने केवल जाति या स्थानीय मुद्दों पर चुनाव नहीं लड़ा. नैरेटिव गढ़ने में माहिर तत्कालीन मीडिया मैनेजर ने अपने अभियान में दो मुद्दों को प्रमुखता से रखा.
पहला— अगर भाजपा हार जाती है तो उनका केंद्रीय नेतृत्व सम्राट को मुख्यमंत्री पद से हटा देगा
यह सिर्फ एक बयान नहीं था इसका सीधा राजनीतिक संदेश भाजपा के भीतर और खासकर उन नेताओं और समर्थकों को था जो सम्राट से अंदरखाने खुश नहीं थे कि केंद्रीय नेतृत्व ने एक पिछड़ा को ही मुख्यमंत्री बना दिया है. भूमिहार वोटरों पर इसका असर हुआ ही होगा। इसका असर यह हुआ कि भाजपा के परंपरागत सवर्ण वोटों में कुछ हद तक असमंजस पैदा हुआ.
दूसरा— “भाजपा यहां कुत्ते-बिल्ली को भी टिकट दे दे तो जीत जाती है”
उनका ये नैरेटिव सेट करना भाजपा ने बांकीपुर को अपनी जेब की सीट मान लिया है, उम्मीदवार कौन है, इससे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि पार्टी मानकर चलती है कि सीट तो जीतनी ही है. उन्होंने इस नैरेटिव का भाजपा के गढ़ में सेंधमारी करने का सबसे बड़े औजार के रूप में इस्तेमाल किया
क्या भाजपा ने चुनाव को हल्के में लिया?
अब अगला सवाल ये पैदा होता है कि क्या सच में इस चुनाव को भाजपा ने गंभीरता से नहीं लिया? बांकीपुर भाजपा का सबसे सुरक्षित किला माना जाता था। संभव है कि इसी विश्वास ने चुनाव को सामान्य बना दिया, जबकि दूसरी तरफ प्रशांत किशोर इसे अपनी राजनीतिक साख की लड़ाई बना चुके थे. जब एक पक्ष के लिए चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल बन जाए और दूसरा पक्ष उसे सामान्य चुनाव की तरह लड़े, तो कभी कभी परिणाम चौंका भी सकते हैं.
राजद के लिए बड़ा झटका
इस चुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक हार भाजपा की नहीं, बल्कि राजद की भी मानी जा सकती है। राजद तीसरे स्थान पर चली गई. यानी भाजपा विरोधी राजनीति का बड़ा हिस्सा इस बार जन सुराज की ओर शिफ्ट होता दिखाई दिया. और इसका असर पूरे बिहार पर पड़ेगा क्योंकि भाजपा भी चाहेगी कि उनका विरोध पीके हो ना कि तेजस्वी.
क्या विधानसभा चुनाव में भी यही होगा?
एक विधानसभा सीट और पूरे राज्य के 243 विधानसभा क्षेत्रों का चुनाव बिल्कुल अलग चीजें हैं. उपचुनाव में स्थानीय मुद्दे, कम मतदान, सीमित संसाधनों का केंद्रित इस्तेमाल और उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि निर्णायक हो सकती है.लेकिन अगले विधानसभा को आंकना थोड़ी जल्दबाजी होगी. यानी बांकीपुर की जीत यह साबित करती है कि जन सुराज जीत सकती है, लेकिन यह अभी साबित नहीं करती कि जन सुराज पूरे बिहार में बीजेपी और राजद को दूसरे और तीसरे स्थान पर धकेल देगी.
इस जीत का असली मतलब
बांकीपुर का संदेश दो स्तरों पर देखा जाना चाहिए.
पहला, भाजपा के लिए यह चेतावनी है कि उसकी सबसे सुरक्षित सीट भी उनसे खिसक सकती है
दूसरा, प्रशांत किशोर के लिए यह राजनीतिक वैधता की जीत है. अब उनके विरोधियों के लिए यह कहना मुश्किल होगा कि जन सुराज केवल सोशल मीडिया की पार्टी है.
इससे उपचुनाव का कुल जमा यही निकलता है कि ये जनसुराज की बड़ी जीत के रूप में देखा तो जा सकता है लेकिन बीजेपी की बड़ी हार के रूप में कतई नहीं देखा जाना चाहिए.
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