Ranchi : झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को आखिरकार समयसीमा तय करने के लिए मजबूर कर दिया है। लोकायुक्त, राज्य मानवाधिकार आयोग और सूचना आयोग जैसे संवैधानिक संस्थाओं में कई महत्वपूर्ण पद वर्षों से खाली पड़े थे, जिन पर नियुक्ति नहीं हुई थी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि ये पद खाली रहने से न सिर्फ संविधानिक संस्थाओं की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, बल्कि जनता के अधिकार भी सीमित हो जाते हैं।
सरकार ने कोर्ट को दिया आश्वासन
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि 6 हफ्तों के भीतर सभी नियुक्तियां पूरी कर दी जाएंगी। अदालत ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर ले लिया और अगली सुनवाई 17 मार्च 2026 के लिए तय कर दी। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अगर तय समयसीमा में नियुक्तियां नहीं हुईं, तो वह सख्त रुख अपना सकती है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ गया है।
यह मामला जनहित याचिकाओं से जुड़ा
हाई कोर्ट की कार्रवाई कई जनहित याचिकाओं के आधार पर हुई थी। याचिकाओं में कहा गया था कि राज्य में भ्रष्टाचार रोकने वाली संस्था लोकायुक्त और अन्य संवैधानिक पद लंबे समय से रिक्त हैं। इन याचिकाओं के चलते कोर्ट ने सरकार को जवाबदेह बनाना जरूरी समझा और समयसीमा तय कर दी, ताकि संवैधानिक संस्थाएं सुचारू रूप से काम कर सकें।
वकील महेश तिवारी की माफी का मामला
आज हाई कोर्ट में वकील महेश तिवारी और जस्टिस राजेश कुमार के बीच हुई तीखी बहस का मामला भी सुना गया। याद दिला दें, इस बहस में महेश तिवारी ने कहा था, “जज अपनी सीमा में रहें”, जिसके बाद हाई कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने स्वतः संज्ञान लिया और आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और माफी
मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया, जहां CJI की पीठ ने कड़ी टिप्पणी की और महेश तिवारी को हाई कोर्ट में बिना शर्त माफी मांगने की सलाह दी। आज सुनवाई के दौरान महेश तिवारी ने कोर्ट में बिना शर्त माफी मांग ली और अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया।

