एक हत्याकांड पर 44 साल की कानूनी लड़ाई और इस दौरान पांच आरोपी के मौत के बाद सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट में पेंडिंग आपराधिक अपीलों को लेकर सख्त टिप्पणी की है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने न्याय के लिए 44 साल के समय को ‘चौंकाने वाली’ स्थिति करार देते हुए पूरी न्यायिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए. पहले चरण में सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार और झारखंड हाईकोर्ट से विस्तृत रिपोर्ट मांगी कि आखिर ट्रायल और अपील में इतनी लंबी देरी क्यों हुई. अदालत ने Simon Soren की मेडिकल स्थिति पर भी रिपोर्ट मांगी, क्योंकि वह करीब 70 वर्ष के हैं और जेल अस्पताल में इलाज करा रहे थे.
बाद की सुनवाई में हाईकोर्ट की ओर से दाखिल रिपोर्ट देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट में क्रिमिनल अपीलों की लंबित संख्या को भी बेहद चिंताजनक माना. इसी मुद्दे को देखते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता को मामले में केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाने की अनुमति दी.
समझे पूरा मामला कहां से शुरू हुई ?
मामला 1981 के डबल मर्डर से जुड़ा है. इस मामले में कुल छह लोगों को आरोपी बनाया गया था. बाद में दो आरोपियों की मौत आरोप तय होने से पहले ही हो गई. बाकी चार के खिलाफ मुकदमा चला. साल 1991 में आरोप तय हुए. यहीं से सुप्रीम कोर्ट का सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है. आरोप तय होने के बाद भी ट्रायल कोर्ट को फैसला सुनाने में करीब 12 साल और लग गए और आखिरकार 2002 में दोषसिद्धि हुई.
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर पूछा कि अगर आरोप 1991 में तय हो चुके थे तो उसके बाद मुकदमा पूरा होने में इतना समय क्यों लगा. हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान केस को पांच बार एक ट्रायल कोर्ट से दूसरे ट्रायल कोर्ट में स्थानांतरित किया गया. राज्य की ओर से छह साल की देरी का कारण आरोपियों का फरार रहना बताया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि बाकी करीब 12 साल की देरी का क्या कारण था.
फिर हाईकोर्ट में क्या हुआ?
2002 में दोषसिद्धि के बाद आरोपियों ने झारखंड हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की.
लेकिन यहां भी मामला खत्म नहीं हुआ. अपील करीब 22 साल तक लंबित रही और हाईकोर्ट ने आखिरकार 2024 में फैसला सुनाया. यानी—
1981 — हत्या की घटना
1991 — आरोप तय
2002 — ट्रायल कोर्ट का फैसला
2024 — हाईकोर्ट में अपील का फैसला

इस तरह ट्रायल और अपील, दोनों चरणों को मिलाकर करीब 44 साल न्यायिक प्रक्रिया में निकल गए.
इस दौरान आरोपियों के साथ क्या हुआ?
छह आरोपियों में से दो की मौत आरोप तय होने से पहले हो गई.
बाकी चार को ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया. इनमें से तीन की मौत हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान हो गई.
अब करीब 70 साल के Simon Soren ही जीवित बचे आरोपी हैं. यानी जिस अपराध का मुकदमा 1981 में शुरू हुआ था, उसका अंतिम कानूनी परिणाम आने तक आरोपी की उम्र करीब 70 साल हो चुकी है.
मामला सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंचा?
झारखंड हाईकोर्ट के 2024 के फैसले के खिलाफ Simon Soren ने सुप्रीम कोर्ट में Special Leave Petition दाखिल की. सुप्रीम कोर्ट की पीठ जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने मामले की सुनवाई करते हुए इस असाधारण देरी पर गंभीर चिंता जताई. अदालत ने कहा कि एक तरफ अपराध गंभीर है, लेकिन दूसरी तरफ आरोपी को दशकों तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ा.
अपराध न करने की शर्त पर मिली ज़मानत
अपराध की गंभीरता के बावजूद कोर्ट ने बुजुर्ग दोषी को राहत दी है. सोरेन अब तक 2 साल 4 महीने 12 दिन हिरासत में बिता चुके हैं. उनकी उम्र, बीमारी और राज्य सरकार के इस बयान को देखते हुए कि वे हिरासत में रहते हुए अस्पताल में भर्ती हैं, कोर्ट ने उनकी सजा स्थगित कर तुरंत रिहाई का आदेश दे दिया- शर्त सिर्फ इतनी कि जमानत पर रहते हुए कोई अपराध न करें.
साथ ही कोर्ट ने मूल केस रिकॉर्ड फिजिकल और डिजिटल दोनों फॉर्मेट में चार हफ्ते के भीतर मंगाने का आदेश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर 2026 को होगी.


