जोहार लाइव ब्यूरो
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह एक नाबालिग मुस्लिम छात्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब यानी सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति मांगी थी. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री पेश नहीं कर सकी कि सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लाम धर्म की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है.
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने यह भी कहा कि अगर स्कूल का ड्रेस कोड सभी छात्रों के लिए समान, वास्तविक, गैर-भेदभावपूर्ण और अनुशासन व संस्थान की पहचान बनाए रखने के उद्देश्य से लागू किया गया है, तो कोई छात्र उसमें अपनी पसंद के अनुसार बदलाव की मांग नहीं कर सकता.
कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि उसके पास कर्नाटक हाईकोर्ट की 2022 की फुल बेंच के फैसले से अलग राय रखने का कोई कारण नहीं है. कर्नाटक हाईकोर्ट ने उस फैसले में कहा था कि मुस्लिम महिलाओं का हिजाब पहनना इस्लाम धर्म की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फुल बेंच के फैसले को “बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली न्यायिक आधार” बताया. हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि बाद में इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘आयशात शिफा’ मामले में विचार किया था, जहां शीर्ष अदालत का फैसला बंटा हुआ था.
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता सुकैना रिजवी प्रयागराज के अतरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की छात्रा हैं. यह एक निजी, गैर-सहायता प्राप्त CBSE स्कूल है. उन्होंने कक्षा 10 पास करने के बाद उसी स्कूल में कक्षा 11 में दाखिले की मांग की थी. सुकैना ने अपनी मां के जरिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था. उन्होंने कोर्ट से स्कूल प्रबंधन को निर्देश देने की मांग की थी कि उन्हें स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति दी जाए.
छात्रा का कहना था कि उसने कक्षा 6 से 10 तक इसी स्कूल में पढ़ाई की और इस दौरान वह लगातार सिर पर स्कार्फ पहनती रही. उसके अनुसार, उस समय स्कूल ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी.
हालांकि, छात्रा ने आरोप लगाया कि अब स्कूल कक्षा 11 में उसका दाखिला इसलिए नहीं कर रहा है क्योंकि वह सिर पर स्कार्फ पहनना जारी रखना चाहती है. उसका कहना था कि सिर पर स्कार्फ पहनना उसके धर्म की “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” है और इसे पहनने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(a) के तहत मिले उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.
स्कूल ने क्या कहा
स्कूल की ओर से दलील दी गई कि यह एक निजी, गैर-सहायता प्राप्त, सह-शिक्षा संस्थान है और CBSE से संबद्ध है. स्कूल में सभी छात्रों के लिए एक समान ड्रेस कोड लागू है. स्कूल के प्रिंसिपल का कहना था कि इसी धार्मिक समुदाय से आने वाली अन्य छात्राएं भी स्कूल के निर्धारित ड्रेस कोड का पालन कर रही हैं. ऐसे में याचिकाकर्ता को अलग छूट देने से स्कूल के प्रशासन और अनुशासन पर असर पड़ सकता है.
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने भी कहा कि स्कूल में यूनिफॉर्म निर्धारित करना स्कूल प्रशासन की नीति का विषय है. इसका उद्देश्य संस्थान में पढ़ने वाले सभी छात्रों के बीच समानता बनाए रखना है.

हाईकोर्ट ने खारिज की छात्रा की अपील
हाईकोर्ट ने शुरुआत में ही छात्रा की उस दलील को खारिज कर दिया कि चूंकि उसने पहले की कक्षाओं में हिजाब पहना था, इसलिए अब भी उसे इसे पहनने का अधिकार मिलना चाहिए.
कोर्ट ने कहा कि पहले स्कूल ने निचली कक्षाओं में छात्रा के सिर पर स्कार्फ पहनने पर आपत्ति नहीं की हो सकती है. इसकी वजह लापरवाही, निष्क्रियता, इच्छा की कमी, ड्रेस कोड लागू नहीं करना, शिष्टाचार या झिझक कुछ भी हो सकती है. लेकिन इससे स्कूल के खिलाफ ऐसा कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता, जिसके आधार पर बाद में स्कूल अपनी यूनिफॉर्म नीति लागू न कर सके.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि स्कूल ने अपनी यूनिफॉर्म बदली नहीं है. विवाद सिर्फ इस बात को लेकर है कि छात्रा निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ अतिरिक्त रूप से सिर पर स्कार्फ पहनना चाहती है.
कोर्ट ने कहा कि जब ड्रेस कोड सभी के लिए समान, वास्तविक, गैर-भेदभावपूर्ण और अनुशासन व संस्थान की पहचान बनाए रखने के उद्देश्य से लागू हो, तो निर्धारित यूनिफॉर्म का चुनाव मुख्य रूप से स्कूल के अधिकार क्षेत्र में आता है.
यूनिफॉर्म के कई उद्देश्य
पीठ ने कहा कि स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म कई उद्देश्यों को पूरा करती है. इनमें अनुशासन, बच्चों के बीच समानता, संस्थान की पहचान और कक्षा में अलग-अलग पहचान के आधार पर भेदभाव से बचना शामिल है. कोर्ट ने यह भी कहा कि अलग-अलग धर्मों को मानने वाले छात्रों के लिए एक समान यूनिफॉर्म “धर्म-निरपेक्ष माहौल” बनाने में मदद करती है.
हिजाब को अनिवार्य धार्मिक प्रथा बताए जाने की दलील पर कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का दावा केवल एक “साधारण दावा” है. छात्रा की ओर से ऐसा पर्याप्त पक्ष या प्रमाणिक धार्मिक सामग्री पेश नहीं की गई, जिससे यह साबित हो सके कि कक्षा के अंदर सिर पर स्कार्फ पहनना उसके लिए अनिवार्य है. कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा कोई पर्याप्त प्रमाण नहीं दिया गया जिससे यह साबित हो कि सिर पर स्कार्फ नहीं पहनने से उसके धर्म के मूल स्वरूप पर कोई असर पड़ेगा.
विभिन्न हाईकोर्ट के फैसलों का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा कि जहां भी यह मुद्दा सामने आया है, वहां हाईकोर्ट का मत लगभग एक जैसा रहा है कि मुस्लिम महिलाओं के लिए सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लाम धर्म का ऐसा अनिवार्य हिस्सा नहीं है, जिसके बिना उनकी धार्मिक आस्था खतरे में पड़ जाए.
पीठ ने कहा कि अगर छात्रों को अपनी व्यक्तिगत पसंद या अलग-अलग आधार पर निर्धारित यूनिफॉर्म से अलग होने की अनुमति दी जाती है, तो इससे यूनिफॉर्म की मूल अवधारणा ही प्रभावित होगी. इससे स्कूल में अनुशासन तय करने का अधिकार संस्थान से हटकर अलग-अलग छात्रों के हाथ में चला जाएगा. इन सभी दलीलों और परिस्थितियों को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुकैना रिजवी की रिट याचिका खारिज कर दी.
Also Read : नई दिल्ली : पत्रकार तरुण तेजपाल को SC से झटका, रेप केस में दो हफ्ते में सरेंडर का आदेश


