कणिका राणा
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शनिवार (24 अक्टूबर) को बताया कि देश ने 11 करोड़ फार्मर आईडी बनाने का लक्ष्य हासिल कर लिया है. सरकार ने यह लक्ष्य 31 मार्च 2027 तक पूरा करने का रखा था, यानी समयसीमा से करीब पांच महीने पहले यह काम पूरा हो गया. मंत्री के मुताबिक यह आँकड़ा 23 अक्टूबर की रात पूरा हुआ. सोशल मीडिया पर जारी वीडियो संदेश में उन्होंने इसे “भारतीय कृषि और किसानों के लिए ऐतिहासिक दिन” बताया. मंत्रालय का दावा है कि छह करोड़ से ज्यादा किसानों को फार्मर आईडी आधारित व्यवस्था से सीधा लाभ मिल चुका है.
फार्मर आईडी क्या है?
यह हर किसान को दी जाने वाली 11 अंकों की डिजिटल पहचान संख्या है, जिसे किसान पहचान पत्र भी कहते हैं. यह आधार और राज्य के जमीन रिकॉर्ड से जुड़ी होती है और सरकार की डिजिटल व्यवस्था “एग्रीस्टैक” का हिस्सा है.
लेकिन आँकड़े का दूसरा पहलू भी है. सरकार की ओर से गिनाए गए प्रमुख राज्यों में झारखंड का नाम नहीं मिलता, और बटाईदार किसानों (दूसरे की जमीन पर बंटाई पर खेती करने वालों) के लिए व्यवस्था अब भी अधूरी है. इसका मतलब यह नहीं कि झारखंड में एक भी आईडी नहीं बनी; बस उसका अलग से आधिकारिक आँकड़ा हमें नहीं मिला.
शुक्रवार को ही चौहान ने कहा था कि 10 करोड़ 99 लाख 70 हजार आईडी बन चुकी हैं और सिर्फ 30 हजार और बनते ही देश 11 करोड़ का आँकड़ा पार कर लेगा. यानी अगले 24 घंटे के भीतर घोषणा आ गई.
रफ्तार की कहानी
- मार्च 2026 में (19 मार्च तक) आँकड़ा करीब 9.2 करोड़ था.
- 20 जुलाई 2026 तक यह 10,18,40,649 पहुंचा.
- 3 अगस्त तक 10.31 करोड़ आईडी बनी थीं.
- 23 अक्टूबर की रात 11 करोड़.
यानी मार्च से अक्टूबर के बीच करीब 1.8 करोड़ नई आईडी जुड़ीं.
राज्यवार आँकड़े
20 जुलाई 2026 तक के राज्यवार आँकड़े (राज्यसभा में 24 जुलाई को रखी गई जानकारी के आधार पर):
- उत्तर प्रदेश: 2.43 करोड़ से ज्यादा
- महाराष्ट्र: 1.35 करोड़
- मध्य प्रदेश: 1.13 करोड़
- राजस्थान: 87.23 लाख
- कर्नाटक: 64.44 लाख
- गुजरात: 62.25 लाख
- बिहार: 55.31 लाख
- आंध्र प्रदेश: 50.42 लाख
- तेलंगाना: 50.02 लाख
- तमिलनाडु: 36.49 लाख
- छत्तीसगढ़: 35.14 लाख
- केरल: 25.57 लाख
- ओडिशा: 20.20 लाख
इन आँकड़ों का हमारा विश्लेषण: तब के कुल 10.18 करोड़ में अकेले यूपी का हिस्सा करीब 24 प्रतिशत है, यानी हर चार में से एक आईडी यूपी में बनी है. यूपी, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश मिलकर करीब आधी (लगभग 48 प्रतिशत) आईडी रखते हैं. इन 13 राज्यों के आँकड़े जोड़ने पर करीब 9.78 करोड़ बैठते हैं, यानी बाकी सभी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश मिलकर करीब 40 लाख ही हैं.
छोटे आँकड़े वाले राज्य: मार्च की सरकारी तालिका में पंजाब में सिर्फ 75,681, त्रिपुरा में 63,325 और उत्तराखंड में 1.50 लाख आईडी दर्ज थीं. उसी मार्च में असम में 12.78 लाख, हरियाणा में 11.34 लाख और हिमाचल में 5.80 लाख थीं.
मध्य प्रदेश: चौहान के गृह राज्य में अब 1.19 करोड़ से ज्यादा किसानों की आईडी बन चुकी है.
झारखंड: आँकड़ा नहीं, सिस्टम अटका
- सरकार की ओर से गिनाए गए राज्यों में (फरवरी में राज्यसभा में बताए गए नाम और जुलाई की 13 प्रमुख राज्यों की सूची) झारखंड का नाम नहीं है.
- झारखंड की आईडी का कोई आधिकारिक आँकड़ा हमें नहीं मिला.
- सितंबर में प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार, भूमि सर्वे की अद्यतन (ताज़ा) रिपोर्ट न होने से राज्य में किसान पहचान पत्र का काम अटका था. राज्य में दो जिलों से इसे पायलट (प्रयोग) के तौर पर शुरू करने की योजना थी.
- कारण: राज्य में 1932 के बाद सभी जिलों का सर्वे नहीं हुआ, इसलिए वर्तमान किसान का नाम रजिस्टर-टू (जमीन के मालिकाना हक का सरकारी रिकॉर्ड) में नहीं है. केंद्र वंशावली (परिवार की पीढ़ियों की सूची) के आधार पर किसान का ब्योरा नहीं मान रहा. इसलिए कृषि विभाग ने उत्तराधिकारी म्यूटेशन (विरासत में जमीन मिलने पर रिकॉर्ड में नाम चढ़ाना) जोड़ने का आग्रह किया, और मामला राज्य कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा गया था. रिपोर्ट के मुताबिक कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही राज्य में यह काम शुरू हो पाएगा.
- इस मंजूरी के बाद क्या हुआ, यह अब तक स्पष्ट नहीं है. झारखंड कृषि विभाग से ताज़ा स्थिति पूछी जानी चाहिए.
क्या बदलेगा किसान की जिंदगी में?
मंत्रालय के अनुसार फार्मर आईडी बैंक ऋण, फसल बीमा, आपदा राहत और फसल बिक्री जैसे कामों में पहचान का आधार बनेगी. एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर खरीद में किसानों के सत्यापन में भी इसका उपयोग होगा. सरकार का कहना है कि सत्यापित डेटाबेस से फर्जीवाड़ा और बार-बार सत्यापन की जरूरत घटेगी, और खरीद प्रक्रिया में बिचौलियों की भूमिका कम होगी.
खाद से जुड़ाव: किसान पहचान रिकॉर्ड को उर्वरक विभाग के इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (iFMS) से जोड़ने का काम चल रहा है. iFMS खाद की बिक्री और सब्सिडी पर नजर रखने वाली सरकारी प्रणाली है.
फसल बीमा में बाध्यता: कृषि मंत्रालय ने फसल बीमा की दो योजनाओं, PMFBY (प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना) और RWBCIS (पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना), में भूमि-स्वामी किसानों के लिए फार्मर आईडी अनिवार्य रखने का फैसला किया है. आंध्र प्रदेश, हिमाचल, ओडिशा और उत्तराखंड ने खरीफ 2026 के लिए छूट मांगी थी, पर मंत्रालय ने उनकी मांग नहीं मानी. बटाईदार-किराएदार किसानों के लिए अभी यह अनिवार्य नहीं है, क्योंकि कई राज्य ऐसे किसानों की पहचान और उनकी आईडी बनाने की प्रक्रिया अभी तय कर रहे हैं.
व्यवस्था कैसी बनी?
- डिजिटल कृषि मिशन को केंद्रीय कैबिनेट ने 2 सितंबर 2024 को मंजूरी दी. ₹2,817 करोड़ के परिव्यय में केंद्र का हिस्सा ₹1,940 करोड़ है. मिशन में 11 करोड़ किसानों की डिजिटल पहचान का लक्ष्य तीन साल में बांटा गया था: 2024-25 में 6 करोड़, 2025-26 में 3 करोड़ और 2026-27 में 2 करोड़.
- आईडी किसान के ब्योरे को डिजिटल भूमि रिकॉर्ड से मिलाकर बनती है.
- मंत्रालय के अनुसार इसमें किसान का डेटा सहमति के आधार पर लिया जाता है, और डेटा का स्वामित्व राज्यों के पास रहता है.
- डिजिटल क्रॉप सर्वे (खेत-खेत जाकर फसल का डिजिटल रिकॉर्ड बनाने की कवायद) रबी 2025-26 में 648 जिलों के 31.3 करोड़ से अधिक भूखंडों (जमीन के टुकड़ों) तक पहुंचा.
सवाल जो अब भी बाकी हैं
- बटाईदार और किराएदार: आईडी जमीन के रिकॉर्ड से बनती है. विशेषज्ञों का कहना है कि मौखिक पट्टेदार (जिनके पास जमीन का कोई लिखित करार नहीं होता), बटाईदार और काश्तकार छूट सकते हैं. मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से आई रिपोर्ट के अनुसार, कुछ राज्यों में अब तक करीब 29,000 बटाईदारों-किराएदारों और 3.14 लाख वनाधिकार धारकों को आईडी जारी हुई है; 11 करोड़ के कुल आँकड़े के सामने यह संख्या बहुत कम है.
- “सहमति” पर बहस: आलोचकों का तर्क है कि जब आईडी पीएम-किसान, बीमा और खाद सब्सिडी की शर्त बन जाए, तो सहमति कितनी स्वतंत्र है. सरकार का पक्ष है कि व्यवस्था डेटा संरक्षण कानूनों के अनुरूप है.
- जमीनी खामियां: मध्य प्रदेश के बीना ब्लॉक (सागर जिला) में 29,968 आईडी बनने के बाद भी करीब 30 हजार खसरे (जमीन के प्लॉट नंबर) नहीं जुड़ पाए, जिससे किसान योजनाओं के लाभ में दिक्कत झेल रहे थे. जून में हरियाणा के जींद में 5.65 लाख किसानों में से सिर्फ 73,743 का पंजीकरण हुआ था.
- खाद सब्सिडी सुधार पर सावधानी: इक्रियर (ICRIER, आर्थिक नीति पर शोध करने वाली संस्था) की दो नीतिगत रिपोर्ट ने कहा है कि फार्मर आईडी जैसे ढांचे सुधार का आधार बन सकते हैं, पर पहले डेटा की गुणवत्ता, सहमति, निजता और शिकायत निवारण पक्का होना चाहिए.
चौहान ने खुद शर्त जोड़ी है. उन्होंने कहा कि प्रणाली की सफलता रिकॉर्ड की सटीकता, समय पर अपडेट और पात्र किसानों के बिना दिक्कत पंजीकरण पर निर्भर करेगी.
चौहान का संदेश
“आज का दिन भारतीय कृषि और किसानों के लिए ऐतिहासिक है. एक सपना साकार हुआ है, एक संकल्प पूरा हुआ है. अब इन फार्मर आईडी के माध्यम से योजनाओं का लाभ पारदर्शी तरीके से मिलेगा. इससे सही किसान को ही लाभ मिलेगा.”
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