आनंद दत्त/किसलय शानू
पटना बम ब्लास्ट के 13 साल हो चुके हैं. साल 2013 में 27 अक्टूबर के दिन जब गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी पटना के गांधी मैदान में एक जनसभा को संबोधित करनेवाले थे. उसी दिन गांधी मैदान में एक धमाका हुआ और 6 लोग तक्काल मर गए. कुल 89 लोग घायल हुए.
जांच की आंच पटना से रांची पहुंची. रांची जिले के सीठीयो गांव. एक ऐसा गांव जो इससे पहले नकारात्मक या सकारात्मक, किसी भी तरह की बात को ले चर्चा में नहीं आया. अचानक देश की सभी सुरक्षा एजेंसी धड़ाधड़ पहुंचने लगे. गांव से परोक्ष और अपरोक्ष तौर पर जुड़े कुल 9 लोग गिरफ्तार हुए.
जोहार लाइव इस घटना के बहाने यह पड़ताल किया है कि झारखंड में रह रहे या फिर झारखंड के रहनेवाले कुल 311 ऐसे लोग जिन्हें सुरक्षा एजेंसियां या तो संदिग्ध मानती है, या वो किसी न किसी घटना के आरोपी हैं, या फिर आरोप से बरी हो चुके हैं, सब क्या कर रहे हैं. इसमें कुछ इंडियन मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तोयबा, सिमी, अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (एक्यूआईएस), आईएसआईएस, हिज्ब-उत-तहरीर जैसे आतंकी संगठन से जुड़े हुए हैं. इस पड़ताल में हमने जानने की कोशिश की है कि वो संदिग्ध आज क्या कर रहे हैं?
लगभग डेढ़ महीने की पड़ताल के बाद जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक कोई जमीन कारोबारी बन गया है, कोई ट्यूशन पढ़ा रहा है. कोई मुंबई में प्लंबर का काम कर रहा, कोई स्कूल की वैन चला रहा है. कई तो इस वक्त भी जेल में हैं. पूरी जानकारी कड़ी-दर-कड़ी बताएंगे.
पहली कड़ी में आज हम बताने जा रहे हैं रांची के सीठीयो गांव और वहां के वो लोग जो पटना बम ब्लास्ट में आरोपी रहे. कुल 9 लोगों में तीन जेल से बाहर आ चुके हैं. बरी हो चुके हैं. एक की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गई थी. बाकि इस वक्त जेल में हैं.
बाहर आ चुके असलम (बदला हुआ नाम. बात करने से पहले बाहर आ चुके असलम ने अनुरोध किया कि उनका असली नाम अब नहीं लिखा जाए. हमने उनके नए जीवन की शुरुआत को देखते हुए, हमने उनके अनुरोध को स्वीकार किया) कहते हैं, मैं उस वक्त सिर्फ 15 साल का था. दसवीं की परीक्षा दे चुका था. इसी दौरान गांव में कुछ नए लड़के आने लगे थे. मुझे किसी से घुलने-मिलने में बहुत अच्छा लगता था. मैं उनके संपर्क में आ गया. वो आदमी था हैदर उर्फ ब्लैक ब्यूटी.
असलम बताते हैं, वो कुरान और हदीस के बारे में बताता था. बस चलते फिरते कुरान के मार्फत यह समझाता था कि इस्लाम के अलावा सभी धर्म और उसके लोग हमारे दुश्मन हैं. इनके साथ बुरा बर्ताव करना चाहिए. हम उनकी बातों पर यकीन करें, इसके लिए कई बार खाने-पीने की पार्टी अरेंज की जाती थी. कोई मीटिंग या अलग से बैठकर इसके बारे में बात नहीं होती थी, लेकिन धार्मिक कट्टरता की बातें वो लगातार बताता था.
क्या वो बातें आसानी से समझ आ जाती थीं? शुरूआत में तो नहीं. क्योंकि मैंने थोड़ी बहुत अरबी सीखी थी और कुरान समझ पा रहा था. उर्दू का कोई ज्ञान नहीं था. बल्कि मैं तो संस्कृत का छात्र था. मैट्रिक में मुझे संस्कृत में 61 नंबर आए थे.
आपको कब पता चला कि पटना बम ब्लास्ट में आपका भी नाम है और आप गिरफ्तार होने जा रहे हैं? असलम कहते हैं, पटना में जैसे ही ब्लास्ट हुआ, अगले दिन हैदर का नाम हमने देखा. मुझे तो लगा कि अब मैं खत्म हो चुका हूं. एजेंसी आई और मुझे उठा ले गई.
चूंकि मैं 15 साल का था, तो मुझे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में रखा गया. मुझे बाल सुधार गृह भेज दिया गया. यहां मैं पहली बार किसी नॉन मुस्लिम के साथ खा रहा था, सो रहा था. लेकिन इस दौरान सबसे खास बात रही बाल सुधार गृह के जो भी अधीक्षक थे, इसमें दो लोगों का नाम मैं जरूर लेना चाहूंगा. पहला मनोज कुमार और दूसरा अजय कुमार सिंह. आज मैं जो कुछ भी हूं, इसमें इन दोनों का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है.

सात साल बाद वापस आया. अभी मैं मैकेनिक का काम कर रहा हूं. लेकिन बहुत जल्द एक कैफे खोलने जा रहा हूं. मैं गांव में कम रहता हूं, ताकि गांव के लोगों को मैं याद न आऊ और मुझे उनके मार्फत पुरानी घटना याद आए. मैंने खुद को बदल दिया है, मेरी दुनिया बदल चुकी है.
दूसरे आरोपी जो जेल से बाहर आ चुके हैं, उनमें बख्तियार आलम (बदला हुआ नाम) कहते हैं, मेरा सिर्फ इतना दोष था कि मैंने उन आरोपियों को अपने टेंपो से सीठियो से रांची रेलवे स्टेशन तक पहुंचाया था. बस इतने से आरोप में पूरे 7 साल जेल में बिताना पड़ा.
वापस आने के बाद सबसे ज्यादा दिक्कत अपने लोगों, गांव समाज के लोगों के व्यवहार से हुई. जबकि मुझे अदालत ने निर्दोष करार दिया है, तब भी वो मुझे शक की नजर से देखते थे. मुझ से काम तो करवा लेते थे लोग, लेकिन खुद के साथ देखना पसंद नहीं करते थे. फिर मैंने तय किया कि जो करना है, खुद के लिए खुद करना है.
मैंने दुबारा से एक सेकेंड हैंड वैन खरीदा. अब अपने बेटे को जिस स्कूल में पढ़ाता हूं, उसी स्कूल का वैन चलाता हूं. लेकिन एक बाद में जोर देकर बताना चाहूंगा कि मेरा जीवन अगर पटरी पर लौट पाया है, तो इसमें स्थानीय पुलिस और एजेंसी के अधिकारियों का बड़ा हाथ है.

जांच के दौरान उन्हें समझ आ गया था कि ब्लास्ट में मेरी कोई सीधी भूमिका नहीं है. अब जब मैं अपने गांव में रहता हूं, तो समय – समय पर सुरक्षा एजेंसी के लोग ये अपडेट लेते रहते हैं कि अब मैं कहां हूं और क्या करता हूं. लेकिन इस पूछताछ के लिए वो मेरे गांव या घर नहीं आते. यहां तक कि मेरे बेटे के स्कूल भी नहीं आते. अगर कभी जल्दबाजी में मुलाकात करनी ही हुई, तो सादे वर्दी में आते हैं. मैं आपको बता नहीं सकता कि यह मेरे लिए कितने सुकून की बात है.
बता दें, इस घटना से जुड़े फिरोज अख्तर उर्फ फिरोज असलम, उर्फ पप्पू वर्तमान में घर पर रह कर ट्यूशन पढ़ाने का काम करते हैं. तबीश नियाज उर्फ अरशद अंसारी जिन्हें उस वक्त डोरंडा के मनीटोला से गिरफ्तार किया गया था, वो बिहार के मोतिहारी जिले के अपने गांव लौट गए हैं.
इसके अलावा मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक हैदर अली उर्फ अब्दुल्ला उर्फ ब्लैक ब्यूटी फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद है. मो. मुजिबुल्लाह अंसारी उर्फ आर्यन उर्फ उमर फारूख उर्फ शाहिद उर्फ आसिफ उर्फ राज मल्होत्रा, उर्फ अरविंद गुप्ता भागलपुर जेल में कैद है. नुमान आलम उर्फ नुमान अंसारी भी भागलपुर जेल में बंद है. इम्तियाज आलम उर्फ इम्तियाज अली उर्फ मो. इम्तियाज अंसारी भी तिहाड़ जेल में बंद है.
पटना गांधी मैदान सीरियल ब्लास्ट: 27 अक्टूबर 2013 की पूरी कहानी
27 अक्टूबर 2013 को बिहार की राजधानी पटना में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया था. उस दिन भाजपा के तत्कालीन प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की गांधी मैदान में हुंकार रैली हो रही थी. रैली से पहले पटना जंक्शन और इसके बाद गांधी मैदान के आसपास कई धमाके हुए. इस घटना में छह लोगों की मौत हुई और 80 से अधिक लोग घायल हुए. जांच में इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े संदिग्धों का नाम सामने आया. मामले में कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और विशेष एनआईए अदालत ने दोषियों को सजा सुनाई.
1. सुबह पटना जंक्शन पर पहला धमाका
पटना हाईकोर्ट के फैसले के मुताबिक, 27 अक्टूबर 2013 की सुबह करीब 9:30 बजे पटना जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर 10 के पास सार्वजनिक शौचालय में पहला बम विस्फोट हुआ. इस घटना में मोहम्मद तारिक आजम नाम का संदिग्ध भी घायल हुआ, जिसकी इलाज के दौरान मौत हो गई.
इसके करीब दो घंटे बाद, सुबह 11:40 बजे गांधी मैदान में धमाका हुआ. इसके बाद वहां पांच और विस्फोट हुए. गांधी मैदान में उस समय भाजपा की हुंकार रैली चल रही थी, जिसमें नरेंद्र मोदी मुख्य वक्ता थे. धमाकों और भगदड़ में छह लोगों की मौत हुई और 89 लोग घायल हुए.

2. जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी
केंद्र सरकार के निर्देश पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने मामले की जांच अपने हाथ में ली. जांच में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से जुड़े लोगों की भूमिका सामने आई. अभियोजन पक्ष के मुताबिक, साजिश रायपुर में रची गई और विस्फोटक तैयार करने का काम रांची में हुआ.
मामले में आरोपित प्रमुख लोगों में इम्तियाज अंसारी, हैदर अली, नोमान अंसारी, मुजीबुल्लाह अंसारी, उमेर सिद्दीकी, अजहरुद्दीन कुरैशी, अहमद हुसैन, मोहम्मद फिरोज असलम और मोहम्मद इफ्तेखार आलम शामिल थे. फखरुद्दीन नामक आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया. एक नाबालिग का मामला किशोर न्याय बोर्ड को सौंपा गया.
3. 2021 में नौ दोषियों को सजा
27 अक्टूबर 2021 को एनआईए की विशेष अदालत ने नौ आरोपियों को दोषी ठहराया. इसके बाद 1 नवंबर 2021 को सजा सुनाई गई.
- मौत की सजा: हैदर अली, नोमान अंसारी, मुजीबुल्लाह अंसारी और इम्तियाज अंसारी.
- उम्रकैद: उमेर सिद्दीकी और अजहरुद्दीन कुरैशी.
- 10 साल की सजा: अहमद हुसैन और मोहम्मद फिरोज असलम.
- 7 साल की सजा: मोहम्मद इफ्तेखार आलम.
4. 2024 में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
11 सितंबर 2024 को पटना हाईकोर्ट ने चारों दोषियों की मौत की सजा को बदलकर 30 साल के कारावास में तब्दील कर दिया. अदालत ने उम्रकैद पाए उमेर सिद्दीकी और अजहरुद्दीन कुरैशी की सजा बरकरार रखी.
इस तरह पटना सीरियल ब्लास्ट मामले में निचली अदालत ने चार दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनकी सजा 30 साल के कारावास में बदल गई. यह मामला राजनीतिक रैली को निशाना बनाकर किए गए बड़े आतंकी हमलों में से एक के रूप में दर्ज है.


