किसलय शानू
झारखंड में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करने वाली एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की कार्यशैली पर झारखंड हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं. मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने 6 अक्टूबर 2026 को स्वतः संज्ञान से दर्ज जनहित याचिका पर फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों की जांच अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखी जा सकती. इससे न केवल भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच प्रभावित होती है, बल्कि जिन अधिकारियों के खिलाफ जांच चल रही है, उनके करियर, सतर्कता मंजूरी और प्रतिष्ठा पर भी असर पड़ता है.
राज्य में भ्रष्टाचार से जुड़ी 216 प्रारंभिक जांचें लंबित हैं. इनमें कई मामले एक दशक से भी अधिक समय से आगे नहीं बढ़ पाए हैं. हैरानी की बात यह है कि प्रारंभिक जांच पूरी करने के लिए सरकारी अधिसूचना में तीन महीने की समयसीमा तय है, इसके बावजूद कई मामले वर्षों से लंबित हैं. हाईकोर्ट ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए जांच पूरी करने और सक्षम प्राधिकारियों से निर्णय लेने के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की है.
जोहार लाइव की टीम ने जब पूरे मामले में एसीबी के रिकॉर्ड के आधार पर पड़ताल की, तब मामला चौंकाने वाला सामने आया है. राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हैं. लेकिन यहां के अधिकारियों के कारण एसीबी को समय पर मामले में केस दर्ज करने की अनुमति भी नहीं मिलती है.
216 प्रारंभिक जांच में 41 में आरंभिक जांच पूरा, लेकिन केस दर्ज की अनुमति नहीं
हाईकोर्ट में एसीबी ओर से दाखिल अद्यतन रिपोर्ट के अनुसार, एसीबी में कुल 216 प्रारंभिक जांचें लंबित हैं. इनमें से 43 जांच पूरी हो चुकी हैं, लेकिन एफआईआर दर्ज करने की अनुमति या आगे के आदेश के लिए कैबिनेट अथवा संबंधित मंत्री स्तर पर लंबित हैं. शेष 173 प्रारंभिक जांचें अभी एसीबी के स्तर पर ही चल रही हैं.
इन 43 मामलों में से 23 मामले दिसंबर 2025 से पहले ही जांच पूरी होने के बावजूद निर्णय के इंतजार में थे. यानी जांच एजेंसी की ओर से प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी अंतिम निर्णय नहीं हो पाने के कारण मामले आगे नहीं बढ़ सके.
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि प्रारंभिक जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर संज्ञेय अपराध का मामला बनता है या नहीं और एफआईआर दर्ज करने की जरूरत है या नहीं. यदि ऐसी जांच वर्षों तक लंबित रहती है, तो इसका मूल उद्देश्य ही प्रभावित होता है.
तीन महीने में पूरी होनी थी जांच, कई मामले पांच से दस साल पुराने
राज्य के कैबिनेट सतर्कता विभाग की 7 अगस्त 2015 की अधिसूचना संख्या 1623 के क्लॉज 21(4)(viii) के अनुसार, प्रारंभिक जांच सामान्य तौर पर तीन महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए. जरूरत पड़ने पर एसीबी प्रमुख की मंजूरी से समय बढ़ाया जा सकता है. ऐसी अवधि बढ़ाने के फैसले की नियमित अंतराल पर समीक्षा भी जरूरी है.
लेकिन हाईकोर्ट के सामने पेश रिकॉर्ड में कई जांचें पांच से दस साल तक लंबित रहने की बात सामने आई. कुछ मामलों में एक दशक से भी अधिक समय बीत गया. अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में न तो समय बढ़ाने के आदेश मिले और न ही देरी को सही ठहराने वाले असाधारण कारण सामने आए.
अदालत ने स्पष्ट किया कि समयसीमा को अनिवार्य न मानने का अर्थ यह नहीं है कि उसका मनमाने ढंग से उल्लंघन किया जाए. यदि किसी मामले में जांच पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय चाहिए, तो उसके पीछे उचित कारण होना चाहिए और उसका रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए.
समयसीमा तय, लंबित जांचों को गति देने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश
तीन महीने में जांच पूरी करने का सामान्य नियम : प्रारंभिक जांच सामान्य तौर पर तीन महीने के भीतर पूरी करनी होगी.
छह महीने तक की अवधि : एसीबी प्रमुख समय बढ़ाते हैं, तो जांच को अधिसूचना के अनुसार प्राथमिकता के तौर पर छह महीने के भीतर पूरा किया जाना चाहिए.
छह महीने से अधिक समय लेने पर कारण जरूरी : यदि जांच छह महीने से आगे जाती है, तो एसीबी प्रमुख को लिखित रूप में कारण दर्ज करने होंगे, आगे की अवधि बतानी होगी और नियमित अंतराल पर समीक्षा करनी होगी.
पूरी जांच पर तीन महीने में निर्णय : कैबिनेट, कैबिनेट सतर्कता विभाग या अन्य सक्षम प्राधिकार के पास एफआईआर की अनुमति अथवा अन्य आदेश के लिए भेजे गए मामलों पर तीन महीने में निर्णय लेना होगा. लिखित कारण दर्ज कर एक महीने का अतिरिक्त समय लिया जा सकता है.
पहले से लंबित मामलों का भी निपटारा : एसीबी के पास लंबित मौजूदा प्रारंभिक जांचों को छह महीने में पूरा करना होगा. इससे आगे की अवधि के लिए निर्धारित प्रक्रिया और लिखित कारण जरूरी होंगे.
हाईकोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट : फैसले की तारीख से छह महीने बाद एसीबी के एडीजी को अदालत में रिपोर्ट दाखिल करनी होगी. इसमें प्रत्येक लंबित जांच की शुरुआत की तारीख, जांच पूरी होने की स्थिति, सक्षम प्राधिकार को भेजे जाने और एफआईआर की अनुमति अथवा अन्य आदेश की जानकारी देनी होगी.
जांच लंबित रहने से आरोपी अधिकारियों को भी नुकसान
भ्रष्टाचार के आरोपों को बिना उचित जांच के छोड़ना गंभीर है, क्योंकि इससे भ्रष्टाचार में शामिल लोगों के बच निकलने की आशंका रहती है. दूसरी ओर, किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रारंभिक जांच वर्षों तक लंबित रहने से वह लगातार अनिश्चितता में रहता है. उसके सेवा करियर, सतर्कता मंजूरी और सामाजिक प्रतिष्ठा पर इसका असर पड़ सकता है.
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय के अधिकार का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अधिकार केवल मुकदमे की सुनवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि जांच और प्रारंभिक जांच के चरण में भी लागू होता है. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के सार्वजनिक हित और जांच का सामना कर रहे व्यक्तियों को समय पर न्याय मिलने के अधिकार, दोनों के बीच संतुलन जरूरी है.
2019 में शुरू हुई थी हाईकोर्ट की पहल
यह मामला 2019 में एक जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान उठा था. 10 मई 2019 को एकल पीठ ने भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच वर्षों तक लंबित रहने पर सवाल उठाए थे. इसके बाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका दर्ज करने का निर्देश दिया.
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से लंबित जांचों का वर्षवार ब्योरा और देरी के कारण मांगे. मार्च 2023 में दाखिल एक हलफनामे को अदालत ने अपर्याप्त मानते हुए विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था. बाद में अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि एसीबी में कई प्रारंभिक जांचें वर्षों से लंबित हैं.
अदालत ने माना कि जांच एजेंसी को कानून के मुताबिक जांच करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन यह स्वतंत्रता अनिश्चितकाल तक जांच लंबित रखने का अधिकार नहीं देती. अब निगाह इस बात पर रहेगी कि एसीबी राज्य सरकार हाईकोर्ट के निर्देशों का किस तरह पालन करते हैं.
छह महीने बाद दाखिल होने वाली स्टेटस रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि वर्षों से लंबित जांचों में कितनी प्रगति हुई और किन मामलों में एफआईआर, क्लोजर रिपोर्ट या अन्य निर्णय तक पहुंचा जा सका.

