विजय उराँव
झारखंड का नाम लेते ही जहन में घने जंगलों, पहाड़ियों और प्राकृतिक हरियाली की तस्वीर उभरती है. सरकारी आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि पिछले ढाई दशकों में राज्य का कुल वनावरण (Forest Cover) बढ़ा है. लेकिन, जब इन आंकड़ों की गहराई से पड़ताल की जाती है, तो पता चलता है कि जंगल की यह कहानी सिर्फ कुल क्षेत्रफल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भीतर पारिस्थितिकीय संरचना और पेड़ों के घनत्व में बड़ा बदलाव आया है.
भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की रिपोर्टों के अनुसार, राज्य में हरियाली का दायरा लगातार बढ़ा है. साल 2001 में झारखंड का कुल वनावरण 22,637 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में बढ़कर 23,765.78 वर्ग किलोमीटर हो गया. यानी इस दौरान करीब 1,129 वर्ग किलोमीटर की कुल बढ़ोतरी दर्ज की गई.
इसके साथ ही राज्य के कुल क्षेत्रफल में वनावरण की हिस्सेदारी 28.40 फीसदी से बढ़कर 29.81 फीसदी हो गई है. वहीं, वनावरण के अलावा जंगलों के बाहर पेड़ों से ढका क्षेत्र यानी ट्री कवर (Tree Cover) भी 2001 में 2,694 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 2023 में 3,637 वर्ग किलोमीटर पहुंच गया. इन आंकड़ों को देखने पर प्रथम दृष्टया यही लगता है कि राज्य ने बीते 22 वर्षों में अपनी हरियाली का दायरा काफी हद तक बढ़ाया है.
2011 के बाद की तस्वीर
झारखंड सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 और FSI के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले पर्यावरण शोधकर्ताओं व नीति विश्लेषकों के मुताबिक, जंगल की सेहत को समझने के लिए सिर्फ जमीन का रकबा काफी नहीं है, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि वहां पेड़ों का घनत्व (Canopy Density) कैसा है.
आंकड़ों के मुताबिक, 2011 से 2023 के बीच कुल वनावरण में बढ़ोतरी के बावजूद, घने वनों (Very Dense और Moderately Dense Forest) का संयुक्त क्षेत्रफल करीब 232 वर्ग किलोमीटर घट गया. इसी अवधि में ‘ओपन फॉरेस्ट’ (खुले जंगल) का दायरा करीब 1,019 वर्ग किलोमीटर बढ़ गया.
वर्ष 2023 के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड के कुल वनावरण का लगभग आधा हिस्सा यानी करीब 48 प्रतिशत (11,489 वर्ग किलोमीटर) अब ओपन फॉरेस्ट श्रेणी में आता है. विश्लेषकों का कहना है कि इसका अर्थ यह है कि भले ही कागजों और उपग्रह चित्रों में कुल वनावरण का दायरा बढ़ा हो, लेकिन उस क्षेत्र में पेड़ों का घनत्व और प्राकृतिक सघनता पहले जैसी मजबूत नहीं रही है.

खनन और जिलेवार चुनौतियां
राज्य के सभी जिलों में जंगल की स्थिति एक जैसी नहीं है. उदाहरण के लिए, पश्चिमी सिंहभूम के पास राज्य का सबसे बड़ा वनावरण क्षेत्र लगभग 3,377 वर्ग किलोमीटर है और हालिया वर्षों में यहां हल्की बढ़ोतरी भी दर्ज हुई है.
लेकिन, चूंकि यही जिला अपनी समृद्ध खनिज संपदा और लौह अयस्क के खनन के लिए भी जाना जाता है, इसलिए पारिस्थितिकी विशेषज्ञों का यह मानना है कि जहां खनन और जंगल एक ही जमीन पर मौजूद हैं, वहां धरातल पर पारिस्थितिकीय संतुलन की असल स्थिति की स्वतंत्र और गंभीर जांच जरूरी है.
झारखंड सरकार के हालिया आर्थिक सर्वेक्षण में अब केवल वनावरण के आंकड़ों के साथ-साथ कार्बन स्टॉक (2023 में लगभग 18.64 करोड़ टन), संरक्षित क्षेत्र और अन्य पर्यावरणीय संकेतकों को भी शामिल किया गया है.
पर्यावरणविदों और विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि जंगल का आकलन अब केवल क्षेत्रफल के चश्मे से नहीं किया जा सकता, बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि जंगल कितना घना और प्राकृतिक है, वहां जैव विविधता कितनी सुरक्षित है, और विकास तथा खनन गतिविधियों के बीच पारिस्थितिकीय संतुलन पर इसका क्या असर पड़ रहा है.
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