जंतर-मंतर से शुरू हुए आंदोलन में अगर कोई सबसे चमकदार और लड़ाकू चेहरा नजर आया है, तो वह नेहा बोरा का है. जिस ढंग से उन्होंने गोरखपुर जाकर योगी आदित्यनाथ को उनके गढ़ में ललकारा और अपने आरोपों को बेहद तीखे और निर्भीक शब्दों में रखा, वह आज की राजनीति में असाधारण बात है. गुंडा-मवाली जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए भी जिस आत्मविश्वास के साथ उन्होंने अपनी बात कही, उससे पता चलता है कि नई पीढ़ी में राजनीतिक साहस और प्रतिरोध की क्षमता अभी भी मौजूद है.
नेहा बोरा सीपीआई-एमएल से जुड़ी हुई हैं और दीपांकर भट्टाचार्य इस संगठन के महासचिव हैं. मुझे विनोद मिश्रा जी का दौर याद है. उनके नेतृत्व में सीपीआई-एमएल ने एक मजबूत संगठनात्मक आधार बनाया था. मेरा उनसे राजनीतिक संपर्क उस समय का है, जब हम लोगों ने समता पार्टी के रूप में पहली बार चुनाव लड़ा था. उस समय जॉर्ज फर्नांडिस और विनोद मिश्रा जी साथ उन्हीं के दफ़्तर से उम्मीदवारों की सूची जारी की गई थी और हमारा चुनावी गठबंधन बना था.
विनोद मिश्रा जी के निधन के बाद दीपांकर भट्टाचार्य के हाथ में संगठन का नेतृत्व आया. उस समय उनकी उम्र कम थी, लेकिन उन्होंने संगठन को जिस मजबूती के साथ खड़ा किया और आगे बढ़ाया वह जंतर मंतर नजर आया.आज नेहा बोरा जैसी युवा और निर्भीक नेतृत्व क्षमता का सामने आना उसी संगठनात्मक काम की उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है.
यह संयोग है कि जिस वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गठन हुआ था उसी वर्ष हमारे देश में कम्युनिस्ट पार्टी की भी स्थापना हुई थी. लेकिन मार्क्सवादी पार्टियों में भी लंबे समय से टूट और विभाजन की परंपरा रही है. मार्क्सवादी धारा के अनेक संगठन और गुट बने हैं, जिसके कारण आम आदमी के लिए यह समझना भी कठिन हो जाता है कि कौन किस धारा या गुट से संबंधित है. लेकिन इसके बावजूद कुछ संगठनों ने अपने युवा आधार को बनाए रखा है. जंतर-मंतर के आंदोलन में सीपीआई(एम), सीपीआई और अन्य वामपंथी संगठनों के लोग भी दिखाई दिए, लेकिन जिस तरह की नई ऊर्जा और लड़ाकू तेवर की जरूरत थी, वह सीपीआई-एमएल से जुड़े युवाओं में अधिक दिखाई दिया.
नेहा बोरा मेरी पोती की उम्र की हैं. मैं उन्हें आशीर्वाद देना चाहूँगा. उन्होंने जिस निर्भीकता से अपनी बात रखी है, वह प्रशंसनीय है. साथ ही मैं दीपांकर भट्टाचार्य को भी बधाई देना चाहूँगा कि उन्होंने इतने वर्षों में ऐसा संगठन खड़ा किया जिसमें छात्रों और नौजवानों के बीच राजनीतिक चेतना और संघर्ष की भावना दिखाई देती है.
आज विपक्ष की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों को देखने पर लगता है कि उनमें वह ऊर्जा और राजनीतिक जान नहीं दिखाई देती, जिसकी देश को आवश्यकता है. वे बहुत हद तक अपनी बनी-बनाई और घिसी-पिटी राजनीति के ढर्रे पर चल रही हैं. नेहा बोरा ने जिस तरह का साहस दिखाया है, वैसा तेवर विपक्ष के कितने नेताओं में दिखाई देता है, यह विचार करने की बात है.
देश को आज एक वैकल्पिक राजनीति की जरूरत है. केवल उम्र में नए लोगों के आ जाने से राजनीति नई नहीं हो जाती. राजनीति के तौर-तरीके, सोच और मुद्दे भी नए होने चाहिए. पुरानी पीढ़ी के अनेक राजनीतिक दल आज भी उसी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं. ऐसे में छात्रों और नौजवानों के बीच से जो नई राजनीतिक ऊर्जा सामने आ रही है, उससे उम्मीद बंधती है.
मुझे उम्मीद है कि जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह छात्र-युवा आंदोलन रुकेगा नहीं. यह आंदोलन अगर आगे बढ़ता है और नई पीढ़ी को अपनी राजनीतिक भूमिका तथा अपना नेतृत्व विकसित करने का अवसर देता है, तो देश की राजनीति में एक नई शुरुआत की संभावना पैदा हो सकती है.
(लेखक वरिष्ठ राजनेता हैं. पूर्व राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं. साथ ही नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव के प्रमुख सहयोगी रहे हैं. यह उनके नीजि विचार हैं.)
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