मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े वर्ष 2023 के नए कानून की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बुधवार को एक नया मोड़ आया है. मामले की सुनवाई कर रहे दो जजों की राय अलग-अलग होने के कारण अब इसे पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजने का रास्ता साफ हो गया है.
इस पूरे विवाद की जड़ में वर्ष 2023 का वह कानून है जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक तीन सदस्यीय चयन समिति बनाई गई है. इस समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री की ओर से नामित एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को शामिल किया गया है.
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और डॉ. जया ठाकुर समेत अन्य याचिकाकर्ताओं ने इसी व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. उनका तर्क है कि चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर किए जाने से कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ गया है, जिससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं.
क्या है विवाद की जड़?
यह मामला मूल रूप से वर्ष 2023 के अनूप बरनवाल फैसले से जुड़ा हुआ है. उस समय सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला दिया था कि जब तक संसद कोई नया कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (LOP) और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) वाली समिति की सिफारिश पर होगी. इसके बाद सरकार ने दिसंबर 2023 में नया कानून पारित कर लिया जिसमें मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल कर लिया गया.
चयन समिति पर सवाल
बुधवार को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या इस संवैधानिक चुनौती को पांच जजों की बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए. न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने माना कि चुनाव आयोग का केवल स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनता में भी यह विश्वास होना चाहिए कि वह निष्पक्ष रूप से काम कर रहा है.
उन्होंने चयन समिति में प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री की भूमिका पर भी सवाल उठाया क्योंकि वह सरकार का हिस्सा होते हैं. हालांकि, उन्होंने शुरुआती स्तर पर मामले को सीधे बड़ी पीठ के पास भेजने से असहमति जताई. इसके विपरीत, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा का मानना था कि इन याचिकाओं में संविधान की महत्वपूर्ण व्याख्या से जुड़े गंभीर सवाल शामिल हैं, इसलिए इस पर पांच जजों की संविधान पीठ को ही विचार करना चाहिए.

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के अपने-अपने अहम तर्क सामने आए. याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर किए जाने और उनकी जगह केंद्रीय मंत्री को शामिल किए जाने से समिति में कार्यपालिका का एकतरफा प्रभाव बढ़ गया है, जिससे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं और यह वर्ष 2023 के ‘अनूप बरनवाल’ फैसले की मूल भावना के विपरीत है.
वहीं दूसरी ओर, सरकार का यह पक्ष है कि ‘अनूप बरनवाल’ मामले में खुद सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि जब तक संसद कोई नया कानून नहीं बनाती, तब तक पुरानी व्यवस्था लागू रहेगी; ऐसे में संसद ने दिसंबर 2023 में नया कानून पारित कर अपनी विधायी जिम्मेदारी का पालन किया है और इस समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी शामिल किया गया है जो लोकतांत्रिक संतुलन को दर्शाता है.
सुप्रीम कोर्ट में मतभेद
दोनों जजों की राय भिन्न होने के कारण अब यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाएगा जो आगे की प्रक्रिया और संविधान पीठ के गठन का फैसला करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक 2023 के इस कानून को रद्द नहीं किया है.
बुधवार का यह फैसला केवल इस कानूनी सवाल पर था कि इस संवैधानिक चुनौती की सुनवाई किस बड़ी पीठ द्वारा की जानी चाहिए, और कानून की वैधता पर अंतिम निर्णय अब संविधान पीठ के समक्ष होने वाली आगामी सुनवाई में ही लिया जाएगा.
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