सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में 2018 में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि संशोधन के बाद कानून का अन्य जातियों के लोगों के खिलाफ दुरुपयोग हो रहा है और यह ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ को बढ़ावा दे रहा है. कोर्ट ने कहा कि कानून में पहले से पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं.
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि अदालतें यह देख सकती हैं कि किसी मामले में SC/ST एक्ट के तहत प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं. पीठ ने यह भी कहा कि 2018 में किए गए संशोधन को सुप्रीम कोर्ट पहले ही बरकरार रख चुका है, इसलिए इस मुद्दे को दोबारा खोलने का आधार नहीं है.
मुआवजे पर भी उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से SC/ST एक्ट के तहत पीड़ितों को दिए जाने वाले मुआवजे का मुद्दा भी उठाया गया. वकील ने कोर्ट को बताया कि करीब 493 करोड़ रुपये मुआवजे के तौर पर वितरित किए गए हैं. उन्होंने तर्क दिया कि मुआवजे की यह व्यवस्था लोगों को FIR दर्ज कराने के लिए प्रोत्साहित करने जैसी है.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया.
2018 के संशोधन से क्या बदला था?
याचिका में SC/ST एक्ट में किए गए 2018 के संशोधन के तहत जोड़ी गई धारा 18A को चुनौती दी गई थी. इस संशोधन के जरिए SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता को हटा दिया गया था. साथ ही, एक्ट के मामलों में अग्रिम जमानत पर लगी रोक को फिर से प्रभावी किया गया.
यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के 2018 के Subhash Kashinath Mahajan बनाम State of Maharashtra फैसले के बाद किया गया था. उस फैसले में कोर्ट ने FIR दर्ज करने और गिरफ्तारी से पहले कुछ सुरक्षा उपायों की बात कही थी तथा SC/ST एक्ट के मामलों में अग्रिम जमानत पर पूर्ण प्रतिबंध को स्वीकार नहीं किया था.

संसद ने बाद में कानून में संशोधन कर इन निर्देशों के प्रभाव को समाप्त कर दिया. 2020 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने Prathvi Raj Chauhan बनाम Union of India मामले में इस संशोधन को बरकरार रखा था.
मौजूदा याचिका में दलील दी गई थी कि संसद सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले को केवल कानून में बदलाव करके प्रभावहीन नहीं कर सकती, जब तक उस फैसले में बताई गई कमियों को दूर न किया जाए. हालांकि, मौजूदा पीठ ने कहा कि 2018 का संशोधन पहले ही सुप्रीम कोर्ट से वैध ठहराया जा चुका है. इसी आधार पर पीठ ने मामले को दोबारा खोलने से इनकार कर दिया.
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