दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में दिल्ली परिवहन निगम (DTC) पर 1 लाख का जुर्माना लगाया है, जो करीब 32 साल तक अदालतों में चलता रहा. मामला एक बस कंडक्टर की बकाया सैलरी से जुड़ा था, लेकिन विवाद की शुरुआत महज 67 रूपये को लेकर हुई थी.
जस्टिस अमित महाजन ने फैसले में कहा कि इतने लंबे समय तक इतने छोटे दावे को लेकर मुकदमा लड़ना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इससे सरकारी पैसे की अनावश्यक बर्बादी हुई.
बिना टिकट यात्रियों को सफर कराने का मामला
मामला 1994 का है. डीटीसी के कंडक्टर राजेंद्र प्रसाद पर आरोप लगा था कि उन्होंने यात्रियों से 67 रूपये लिए लेकिन उन्हें टिकट जारी नहीं किए.
इस आरोप के बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू हुई और 1996 में उन्हें नौकरी से हटा दिया गया. हालांकि, राजेंद्र प्रसाद ने डीटीसी के मैनेजिंग डायरेक्टर के सामने अपील की. इसके बाद उन्हें दोबारा नौकरी पर तो बहाल कर दिया गया, लेकिन पिछली अवधि की सैलरी नहीं दी गई.
इंडस्ट्रियल ट्रीब्यूनल ने कंडक्टर के पक्ष में दिया फैसला
बकाया वेतन नहीं मिलने के बाद राजेंद्र प्रसाद ने इंडस्ट्रियल विवाद उठाया. इंडस्ट्रियल ट्रीब्यूनल ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए माना कि उन्हें दी गई सजा गैरकानूनी और आधारहीन थी. ट्रिब्यूनल ने डीटीसी को 1996 से 1998 के बीच की अवधि का बकाया वेतन देने का आदेश दिया.
डीटीसी ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दे दी. साल 2005 में हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश पर रोक लगा दी.
हाईकोर्ट ने कहा- 32 साल तक मुकदमा चलाना उचित नहीं
अब मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने DTC की याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल का फैसला उचित और तर्कसंगत था.
कोर्ट ने डीटीसी की ओर से इतने लंबे समय तक मुकदमा जारी रखने के तरीके पर भी कड़ी नाराजगी जताई. कोर्ट ने कहा कि इतने सीमित दावे को लेकर लंबे समय तक मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इससे सरकारी पैसे की अनावश्यक बर्बादी हुई.
इसी वजह से हाईकोर्ट ने डीटीसी पर कुल 1 लाख रुपये की लागत लगाई है. इसमें 25,000 दिल्ली हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी को, 50,000 प्रधानमंत्री राहत कोष में और 25,000 राजेंद्र प्रसाद को दिए जाएंगे.
कोर्ट ने डीटीसी को यह छूट भी दी है कि वह इस जुर्माने की रकम उस अधिकारी से वसूल सकता है, जो इस ‘मामूली विवाद’ को इतने लंबे समय तक आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदार था. डीटीसी की ओर से अधिवक्ता मनीषा त्यागी पेश हुईं, जबकि राजेंद्र प्रसाद की ओर से अधिवक्ता ऋषभ वर्मा और अनिल अग्रवाल ने पैरवी की.
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