“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा…”
यह सिर्फ एक नारा नहीं था. यह उस दौर की आवाज थी, जब भारत की आजादी की लड़ाई कई रास्तों से आगे बढ़ रही थी. गांधी सत्याग्रह और अहिंसा के जरिए अंग्रेजों को चुनौती दे रहे थे, तो भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारी रास्ते से ब्रिटिश साम्राज्य को ललकार रहे थे. इसी दौर में सुभाष चंद्र बोस अपनी अलग राजनीतिक राह बना रहे थे. रास्ता अलग था, लेकिन मंजिल एक थी- पूर्ण स्वतंत्रता.
सुभाष की कहानी को सिर्फ जन्म, पढ़ाई, कांग्रेस, आजाद हिंद फौज और मृत्यु की तारीखों में बांटकर नहीं समझा जा सकता. उन्हें समझने के लिए उस दौर के भारत को देखना होगा, जहां हर तरफ एक सवाल था- अंग्रेज भारत से जाएंगे कैसे?

16 जनवरी 1941 की वह रात
कलकत्ता का एल्गिन रोड. सुभाष चंद्र बोस अपने घर में नजरबंद थे. बाहर ब्रिटिश पुलिस और खुफिया विभाग की निगरानी थी. लेकिन अंग्रेजों को अंदाजा नहीं था कि घर के भीतर भागने की योजना तैयार हो चुकी है. सुभाष ने अपना हुलिया बदला और मोहम्मद जियाउद्दीन नाम के एक बीमा एजेंट के रूप में घर से निकल गए. उनके भतीजे शिशिर कुमार बोस कार चला रहे थे. जनवरी की रात 17 तारीख को करीब डेढ़ बजे वह घर से निकले और कार से गोमो पहुंचे. वहां से ट्रेन पकड़कर भारत से बाहर निकल गए.
सवाल था – एक ऐसा आदमी जिसने इंडियन सिविल सर्विस यानी ICS की प्रतिष्ठित परीक्षा पास की थी, उसे अपनी ही जमीन से भेष बदलकर क्यों निकलना पड़ा?
इसका जवाब उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा में छिपा था.
ICS की नौकरी छोड़ी, आजादी का रास्ता चुना
23 जनवरी 1897 को ओडिशा के कटक में जन्मे सुभाष संपन्न परिवार से थे. उनके पिता जानकीनाथ बोस प्रतिष्ठित वकील थे. परिवार चाहता था कि सुभाष पढ़-लिखकर बड़ा अधिकारी बनें. सुभाष इंग्लैंड गए और ICS की परीक्षा पास की. उस दौर में किसी भारतीय का इस सेवा में पहुंचना बड़ी उपलब्धि थी. लेकिन भारत लौटकर उन्होंने अंग्रेजी शासन की नौकरी करने के बजाय स्वतंत्रता आंदोलन का रास्ता चुना.
जलियांवाला बाग हत्याकांड और देश में बढ़ते असहयोग आंदोलन ने उनकी सोच पर गहरा असर डाला. उन्होंने ICS से इस्तीफा दे दिया. यह फैसला उनकी जिंदगी का निर्णायक मोड़ था.

गांधी का सम्मान, लेकिन रास्ता अलग
सुभाष कांग्रेस में सक्रिय हुए और गांधी के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन का हिस्सा बने. लेकिन आजादी हासिल करने की रणनीति को लेकर दोनों की सोच अलग थी. गांधी अहिंसा और जनआंदोलन को सबसे बड़ा हथियार मानते थे. सुभाष संगठन, अनुशासन और जरूरत पड़ने पर सशस्त्र संघर्ष के पक्षधर थे. वह युवाओं को आंदोलन की अगली कतार में देखना चाहते थे. उधर भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी भी युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रहे थे. यानी आजादी की लड़ाई में कई रास्ते थे और सुभाष ने अपना रास्ता चुन लिया था.

जेल से कांग्रेस अध्यक्ष तक
ब्रिटिश सरकार सुभाष को बड़ी चुनौती मानती थी. उन्हें कई बार जेल भेजा गया, लेकिन उनका राजनीतिक कद बढ़ता गया.
साल 1938 में वह कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. हरिपुरा अधिवेशन में उन्होंने जिस भारत की तस्वीर रखी, उसमें सिर्फ अंग्रेजों से मुक्ति नहीं थी. वह गरीबी, अशिक्षा और आर्थिक पिछड़ेपन से मुक्त आधुनिक भारत चाहते थे. औद्योगीकरण, शिक्षा और आर्थिक योजना उनकी सोच के अहम हिस्से थे. लेकिन अगले ही साल कांग्रेस के भीतर टकराव सामने आ गया.

1939: कांग्रेस से अलग होने की शुरुआत
1939 में सुभाष दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए, लेकिन गांधी और कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं से उनके मतभेद गहरे हो गए.
दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत सुभाष के लिए निर्णायक मोड़ थी. उनका मानना था कि ब्रिटेन युद्ध में फंसा है और यही भारत की आजादी के लिए दबाव बढ़ाने का मौका है. मतभेद बढ़े और सुभाष ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक बनाया. अब उनका रास्ता कांग्रेस की मुख्यधारा से अलग हो चुका था.
नजरबंदी से विदेश तक
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने भारत को भी बिना भारतीय नेताओं की सहमति के युद्ध में शामिल कर दिया. सुभाष ने इसका विरोध किया. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नजरबंद कर दिया और फिर जनवरी 1941 में वह ऐतिहासिक पलायन हुआ.


भारत से निकलकर सुभाष अफगानिस्तान होते हुए यूरोप पहुंचे. उनका मकसद था- भारत की आजादी के लिए ब्रिटेन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना. दूसरे विश्व युद्ध की बदलती परिस्थितियों में उन्होंने ब्रिटेन के दुश्मन देशों से मदद लेने की रणनीति अपनाई. यह रणनीति विवादों से परे नहीं थी, लेकिन सुभाष के लिए प्राथमिकता एक ही थी. भारत की स्वतंत्रता
आजाद हिंद फौज और “दिल्ली चलो”
दक्षिण-पूर्व एशिया पहुंचने के बाद सुभाष ने भारतीय राष्ट्रीय सेना यानी INA की कमान संभाली. इसमें भारतीय युद्धबंदियों और प्रवासी भारतीयों ने बड़ी भूमिका निभाई. 1943 में उन्होंने आजाद हिंद सरकार की घोषणा की. अब उनके पास एक सरकार थी, एक सेना थी और एक लक्ष्य था – भारत की आजादी.
उन्होंने भारतीयों से धन और सैनिक जुटाए. महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट बनाई गई. इसी दौर में उनका सबसे मशहूर आह्वान गूंजा-
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा.”
और सैनिकों के सामने लक्ष्य था-
“दिल्ली चलो.”
जब INA भारत की सीमा तक पहुंची
साल 1944 में INA ने जापानी सेना के साथ मिलकर भारत के पूर्वोत्तर हिस्से में ब्रिटिश सेना के खिलाफ अभियान चलाया. मणिपुर के मोइरांग में आजाद हिंद फौज की मौजूदगी एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनी. लेकिन इंफाल और कोहिमा के मोर्चे पर हालात बिगड़ गए. रसद की कमी, बीमारी और कठिन परिस्थितियों ने अभियान को कमजोर कर दिया. जापान की हार के साथ INA का सैन्य अभियान भी समाप्त हो गया. सैन्य तौर पर यह अभियान सफल नहीं हुआ, लेकिन इसका असर आगे दिखाई दिया.
लाल किले से उठी आवाज
युद्ध के बाद INA के सैनिकों पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमे चले. ब्रिटिश सरकार उन्हें विद्रोही मान रही थी, लेकिन देश का बड़ा हिस्सा उन्हें आजादी के सिपाही के रूप में देख रहा था. INA ट्रायल ने पूरे देश में राजनीतिक हलचल पैदा कर दी. भारतीय सैनिकों की निष्ठा और ब्रिटिश शासन के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे. यही सुभाष के आंदोलन का बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव था. उन्होंने भारतीयों के सामने यह कल्पना रख दी थी कि भारतीय सैनिक ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत बनने के बजाय भारत की आजादी की ताकत भी बन सकते हैं.
सुभाष और गांधी के रास्ते अलग थे, लेकिन दोनों की मंजिल भारत की आजादी थी. सुभाष का राष्ट्रवाद सिर्फ अंग्रेजों को हटाने तक सीमित नहीं था. वह आर्थिक रूप से मजबूत, औद्योगिक रूप से विकसित और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण भारत चाहते थे. वह आजादी के बाद के भारत की तस्वीर भी सोच रहे थे.
और फिर रहस्य बन गया आखिरी अध्याय
आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 81वीं पुण्यतिथि है. यह बात 18 अगस्त 1945 की है. जापान दूसरा विश्व युद्ध हार चुका था. अंग्रेज नेताजी के पीछे पड़े हुए थे. इसे देखते हुए उन्होंने रूस से मदद मांगने का मन बनाया. 18 अगस्त 1945 को उन्होंने मंचूरिया की तरफ उड़ान भरी. इसके बाद किसी को फिर वो दिखाई नहीं दिए. 5 दिन बाद टोक्यो रेडियो ने जानकारी दी कि नेताजी जिस विमान से जा रहे थे वो ताइहोकू हवाई अड्डे के पास क्रैश हो गया. इस हादसे में नेताजी बुरी तरह से जल गए. ताइहोकू सैनिक अस्पताल में उनका निधन हो गया. उनके साथ विमान में सवार बाकी लोग भी मारे गए. एस माना जाता है की आज भी उनकी अस्थियां टोक्यो के रैंकोजी मंदिर में रखी हुई हैं.
देश के अलग-अलग हिस्सों में नेताजी के देखे जाने के दावे किए जाते रहे
नेताजी के निधन के बाद भी देश के कई इलाकों में उनको देखे जाने के दावे किए जाते रहे. फैजाबाद में गुमनामी बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ में उनको देखे जाने की खबरें आईं. छत्तीसगढ़ में ये मामला राज्य सरकार के पास गया, लेकिन सरकार ने मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया.
जिन गुमनामी बाबा के नेताजी होने का दावा किया जाता है, उनके निधन के बाद उनके पास से नेताजी के परिवार की तस्वीरें, पत्र-पत्रिकाओं में छपे नेताजी से जुड़े लेख, कई अहम लोगों के पत्र, नेताजी की कथित मौत के मामले की जांच के लिए गठित शाहनवाज आयोग एवं खोसला आयोग की रिपोर्ट जैसी चीजें मिलीं.


