आनंद दत्त/किसलय शानू
अपनी पहली रिपोर्ट में हमने बताया कि कैसे झारखंड पब्लिक सर्विस कमिशन (जेपीएससी) के तत्कालीन चेयरमैन ने 2 करोड़ रुपए और 20 प्रतिशत अतिरिक्त कमीशन तय करने के बाद टीडीपीएल कंपनी को काम सौंपा और फिर उसे सीट बेचने का रास्ता खोल दिया. आज हम बताने जा रहे हैं कैसे झारखंड स्टाफ सेलेक्शन कमेटी (जेएसएससी) ने कंबाइंड ग्रैजुएट लेवल (सीजीएल) का पेपर लीक हुआ था. कहां से प्रश्न आए, कहां छात्रों को रखा गया, उन्हें प्रश्न और उसके उत्तर रटवाए गए और उसके बदले कितने पैसे लिए गए. झारखंड के मेहनतकश छात्रों के सपनों को रौंदने की एक और कुत्शित चाल.
साल 2024 के जुलाई महीने में जेएसएसी-सीजीएल की परीक्षा आयोजित की गई. परीक्षा के दौरान ही पेपर लीक की बात सामने आई. जिसके बाद सरकार ने उसे रद्द कर दिया और दुबारा उसी साल सितंबर महीने के 21 और 22 तारीख को आयोजित कराई. जब इसका परिणाम आया, तो फिर हंगामा हुआ. कहा गया कि परीक्षा में सेटिंग हुई है. मामला हाईकोर्ट पहुंचा. हाईकोर्ट ने परीक्षा के परिणाम पर रोक लगा दी और कहा कि परीक्षा संचालन अधिनियम 2023 के तहत पुलिस एफआईआर दर्ज करे और अनुसंधान कर रिपोर्ट दे.
बता दें, जेएसएससी सीजीएल (झारखंड सामान्य स्नातक योग्यताधारी संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा) झारखंड कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली एक प्रमुख प्रतियोगी परीक्षा है. इसके माध्यम से राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में स्नातक स्तर के पदों (जैसे सहायक प्रभाग अधिकारी, अंचल निरीक्षक आदि) पर भर्तियां की जाती हैं.

मामले की जांच सीआईडी कर रही थी. सुनवाई के दौरान बीते 3 दिसंबर 2025 को कथित पेपर लीक मामले की सीबीआई से जांच की मांग वाली याचिका को झारखंड हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया. साथ ही रिजल्ट जारी कर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया था. तत्कालीन महाधिवक्ता राजीव रंजन ने खंडपीठ को बताया था कि सीआईडी जांच में प्रश्न पत्र लीक होने के कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं. गेस प्रश्न पत्र को पेपर लीक होने के साक्ष्य के तौर पर पेश किया जा रहा है. वहीं सफल अभ्यर्थियों में दीपक उरांव समेत अन्य की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वकील गोपाल शंकर नारायण, वी मोहना और अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने कोर्ट को बताया था कि प्रश्न पत्र लीक होने की बात आधारहीन है. बीते वर्षों के कुछ प्रश्नों की पुनरावृत्ति जरुर हुई थी.
अब जब आंदोलनरत छात्र इस परीक्षा को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, तो सरकार का कहना है कि परिणाम कोर्ट के आदेश पर जारी किए गए हैं. ऐसे में वो इसे रद्द नहीं कर सकती.

वेबल एजेंसी शामिल है पेपर लीक में
लेकिन जोहार लाइव को मिले कागजातों के मुताबिक पेपर लीक हुई थी. यह कोई और नहीं, बल्कि लीक के लाभुक खुद स्वीकार कर रहे हैं. अभय तिवारी ने अपने कबूलनामे में बताया कि, टीडीपीएल कंपनी को जेएसएससी में सबसे पहले जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा का बायोमिट्रिक्स का काम मिला. लेकिन कम रेट होने के कारण कंपनी ने काम करने से मना कर दिया. जिसके बाद जेएसएससी ने टीडीपीएल को डी-इंपैनल्ड कर दिया गया.
जैसा कि अभय तिवारी ने अपने कबूलनामें में बताया, ‘’इसके बाद मेरा संपर्क वेबल नामक एजेंसी से हुआ. ये वही एजेंसी थी, जो टीडीपीएल के डी-इंपैनल्ड होने के बाद काम कर रही थी. इस कंपनी के मालिक थे पटना के रहनेवाले मिथिलेश सिंह और उनका पार्टनर था खूंटी का रहनेवाला उमाकांत प्रमाणिक. कंपनी को बायोमिट्रिक के अलावा प्रश्न पत्रों की छपाई का भी काम मिला था.’’
इन दोनों से अभय तिवारी का संपर्क हुआ. दोनों ने अभय तिवारी को जेएसएससी-सीजीएल के परीक्षा का प्रश्न और उत्तर दे दिया. बकौल अभय तिवारी, ‘’मेरा सीजीएल में परीक्षा पहले दिन था, जिसका लैंग्वेज हिन्दी था. उस जेएसएससी-सीजीएल प्रश्नों का उत्तर वेबल एजेंसी के मालिक मिथिलेश सिंह के सहयोगी राकेश सिंह के द्वारा बोकारो स्थिति क्वार्टर में मेरे अलावा 15 अन्य छात्रों को रटाया गया था. रटाने के समय बोकारो में राकेश सिंह और मिथिलेश सिंह दोनों ही उपस्थित थे.’’

वो आगे कहता है, ‘’प्रश्नों का उत्तर पहले से ही मिल जाने के कारण मेरा चयन जेएसएससी-सीजीएल में हुआ और मेरा रैंक 48 आया. मेरे अलावा मेरे घर से मेरा भाई अक्षय तिवारी, उसकी पत्नी सुषमा कुमारी का भी चयन हुआ. अक्षय तिवारी वर्तमान में जेएसए पोस्ट में महिला बाल विकास धुर्वा और उसकी पत्नी निगरानी विभाग धुर्वा में कार्यरत है. खुद अभय तिवारी गिरफ्तार होने से पहले प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी गोड्डा जिले के पोड़ैयाहाट प्रखंड के पद पर कार्यरत था.’’

अभय ने अपने कबूलनामें में आगे बताया है, ‘’हम सभी को वेबल एजेंसी की ओर से 65 प्रश्नों का उत्तर रटाया गया था. जिसके एवज में प्रति अभ्यर्थी 12 लाख रुपया दिया गया था.’’ इस लिहाज से देखें तो 15 छात्रों से कुल 1.80 करोड़ रुपए लिए गए. उसने कहा, ‘’परीक्षा के प्रश्न पत्र वेबल एजेंसी की मिलीभगत से लीक कराया गया था. परिणाम आने के बाद मामला कोर्ट में चला गया, जिसके कारण वो ज्वाइन नहीं कर पा रहा था. साथ ही डे-2 सीजीएल परीक्षा की भी जांच चल रही थी. ऐसे में मैंने अन्य परीक्षाओं में भी बैठने की शुरूआत कर दी.’’
क्या सीबीआई जांच की मांग जायज है
पूरी स्थिति से स्पष्ट है कि छात्रों की मांग पूरी तरह जायज हैं. इससे पहले बीते 4 अगस्त को राज्य के पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार ने भी इस मसले पर अपनी राय जाहिर की थी. अपने एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा था, सरकार, जेएसएससी और सीआईडी ने इस मामले में न्यायालय से कई महत्वपूर्ण तथ्य छुपाए हैं.
प्रकाश कुमार मामले में सरकार और जेएसएससी की ओर से अदालत में दाखिल शपथ पत्र में कहा गया था कि पेपर लीक बड़े स्तर पर नहीं हुआ था और छात्र पिछले वर्षों के प्रश्नों के आधार पर सिर्फ अनुमान लगा रहे थे.
उन्होंने इस दावे को गलत बताते हुए कहा कि केस डायरी में ऐसे कई तथ्य हैं, जिन्हें अदालत के सामने नहीं रखा गया. उन्होंने दावा किया कि जांच में ऐसे साक्ष्य मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि कुछ छात्रों को बिना प्रश्न पत्र देखे ही 120 प्रश्नों के 120 उत्तर रटवाए गए थे.
उनके अनुसार यह सामान्य तैयारी का मामला नहीं बल्कि गंभीर अनियमितता का संकेत है. अजीत कुमार ने कहा कि हाई कोर्ट ने छह महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया था. अब छह महीने पूरे होने वाले हैं, लेकिन जांच अभी तक पूरी नहीं हुई है.
क्रमश…



