बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन के मदरसों पर दिए गए विवादित बयान के बाद सियासी बहस तेज हो गई है. कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तस्लीमा नसरीन ने दावा किया कि बांग्लादेश के मदरसे “जिहादी तैयार करने की फैक्ट्री” बन गए हैं और कट्टरपंथी सोच को बढ़ावा दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरता लगातार बढ़ रही है और इसके लिए मदरसों की शिक्षा व्यवस्था की भी समीक्षा की जानी चाहिए.
तस्लीमा नसरीन के इस बयान का समर्थन करते हुए उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने और भी तीखी टिप्पणी की।
उन्होंने कहा,
“मदरसा बांग्लादेश का हो, चाहे पाकिस्तान का हो या भारत का हो, यदि वास्तव में देखा जाए, तो मदरसे अघोषित तौर पर आतंकवादियों को पैदा करने की फैक्टरी हैं।”
केशव प्रसाद मौर्य के इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है. विपक्षी दलों और कई मुस्लिम संगठनों ने इस तरह की टिप्पणियों को पूरे मदरसा तंत्र और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ बताया है, जबकि भाजपा का कहना है कि उसका निशाना कट्टरपंथ और आतंकवाद है, किसी धर्म विशेष के लोग नहीं.
केशव प्रसाद मौर्य के पहले के विवादित बयान
यह पहली बार नहीं है जब केशव प्रसाद मौर्य अपने बयानों को लेकर विवादों में आए हों. इससे पहले भी वे कई मौकों पर तीखी राजनीतिक टिप्पणियां कर चुके हैं. 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान महाराष्ट्र की एक चुनावी सभा में उन्होंने कहा था कि “भाजपा को वोट देना पाकिस्तान पर एटम बम गिराने जैसा है.” इस बयान को लेकर विपक्ष ने चुनावी भाषणों की मर्यादा पर सवाल उठाए थे. वहीं राम मंदिर आंदोलन के दौरान और उसके बाद कई बार उन्होंने कहा कि “अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद अब काशी और मथुरा की बारी है.” इस बयान को लेकर भी राजनीतिक विवाद हुआ था.
ज्ञानवापी विवाद पर उन्होंने कहा था कि “जहां शिवलिंग है, वहां मस्जिद कैसे हो सकती है?” विपक्ष ने इसे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला बयान बताया था. समय-समय पर उन्होंने विपक्षी दलों पर “मुस्लिम तुष्टिकरण” की राजनीति करने का आरोप लगाया है और कहा है कि तुष्टिकरण की राजनीति देश के लिए नुकसानदायक है.
गौरतलब है कई चुनावी सभाओं में उन्होंने यह भी कहा कि “जो राम का नहीं, वह किसी काम का नहीं”, जिस पर भी विपक्ष ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का आरोप लगाया था. अब ये बयान ये और भी विवादित और ध्रुवीकृत है.
तस्लीमा नसरीन और केशव प्रसाद मौर्य के बयानों ने एक बार फिर मदरसा शिक्षा, धार्मिक कट्टरता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है. आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों, मुस्लिम संगठनों और सामाजिक समूहों की प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है.

