विजय उरांव
लद्दाख के बर्फीले पहाड़, नीली झीलें, विशाल पठार और ठंडे रेगिस्तान दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. लेकिन इसी लद्दाख के चांगथांग (Changthang) इलाके में रहने वाले चांगपा (Changpa) आदिवासी समुदाय की जिंदगी आसान नहीं है. पश्मीना बकरियों, भेड़ और याक के सहारे गुजर-बसर करने वाले इस घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय के सामने बदलते मौसम, बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव, सिकुड़ते चरागाह और पशुधन की घटती उत्पादकता जैसी चुनौतियां हैं.
इन बदलावों का चांगपा की आजीविका और पारंपरिक जीवनशैली पर कितना असर पड़ा है, इसका आकलन करने के लिए सरकार ने अब तक कोई अध्ययन नहीं कराया है. जनजातीय कार्य मंत्रालय ने 30 जुलाई 2026 को लोकसभा में यह जानकारी दी.
लोकसभा में क्या पूछा, सरकार ने क्या कहा?
लोकसभा में (Q. n. 2049) सांसद मोहम्मद हनीफा ने सरकार से पूछा था कि क्या उसने जलवायु परिवर्तन, घटते चरागाह, बदलती बर्फबारी और पशुधन की घटती उत्पादकता का Changpa समुदाय की आजीविका और पारंपरिक घुमंतू जीवनशैली पर असर का आकलन किया है. जवाब में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने कहा कि उसने इस संबंध में कोई अध्ययन नहीं कराया है.
चांगपा समुदाय की चिंता सिर्फ जलवायु परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि चांगथांग में तेजी से बढ़ रही विकास परियोजनाओं को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. पूगा (Puga) में जियोथर्मल पावर प्रोजेक्ट (Geothermal Power Project) और पांग (Pang) में बड़े सोलर पावर प्रोजेक्ट (Solar Power Project) जैसी परियोजनाएं ऐसे इलाकों में आगे बढ़ रही हैं, जहां चांगपा की पारंपरिक आजीविका चरागाहों, पानी और पशुधन पर निर्भर है.
स्थानीय पशुपालकों की चिंता है कि परियोजनाओं के चलते चराई के इलाके और पानी के स्रोत प्रभावित हुए तो उन्हें अपने पशुओं को दूर और ऊंचे इलाकों में ले जाना पड़ सकता है. ऐसे में यह जांच का विषय है कि चांगपा समुदाय पर पड़ने वाले पर्यावरणीय दबाव में जलवायु परिवर्तन की भूमिका कितनी है और विकास परियोजनाओं का कितना असर है.
योजनाओं का लाभ, पश्मीना से आजीविका बढ़ाने की कोशिश
सरकार के अनुसार ST समुदाय होने के कारण चांगपा परिवार PM-JANMAN, DAJGUA, EMRS, प्री-मैट्रिक, पोस्ट-मैट्रिक और नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप समेत कई योजनाओं के पात्र हैं. DAJGUA के तहत दूरदराज की जनजातीय बस्तियों में मोबाइल मेडिकल यूनिट, मोबाइल नेटवर्क, आवासीय छात्रावास और PM-AWAS (ग्रामीण) के तहत पक्के मकान जैसी सुविधाओं पर काम किया जा रहा है.
PMJVM के तहत TRIFED ने Durbuk में वन धन विकास केंद्र (VDVK) के लिए 15 लाख रुपये जारी किए हैं. वहीं, पिछले पांच वर्षों में TRIFED ने लद्दाख के कारीगरों से 1,88,47,291 रुपये के पश्मीना उत्पाद खरीदे हैं. सरकार का कहना है कि इन उत्पादों में इस्तेमाल होने वाला कच्चा पश्मीना चांगपा समुदाय से आता है, इसलिए इसका अप्रत्यक्ष लाभ पशुपालकों को मिलता है.
अगस्त 2026 में चांगथाग में empanelment camp आयोजित करने का प्रस्ताव भी है, ताकि चांगपा समुदाय के पात्र कारीगरों को सरकारी मार्केटिंग और खरीद कार्यक्रमों से सीधे जोड़ा जा सके.
लद्दाख के EMRS के लिए 1,677.41 लाख रुपये
सरकार ने पिछले पांच वर्षों में लद्दाख के EMRS के लिए जारी राशि का भी ब्योरा दिया है. 2021-22 में 10 लाख, 2022-23 में 450 लाख, 2023-24 में 800 लाख, 2024-25 में 17.41 लाख और 2025-26 में 400 लाख रुपये जारी किए गए. हालांकि इन आंकड़ों को चांगपा समुदाय के लिए अलग से जारी राशि नहीं माना जा सकता.
सरकार ने चांगपा की संस्कृति, भाषा और पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण और प्रचार-प्रसार के लिए Tribal Research Institute के जरिए काम किए जाने की भी जानकारी दी है.
कौन हैं चांगपा समुदाय
चांगपा लद्दाख के चांगथांग क्षेत्र में रहने वाला मुख्य रूप से घुमंतू और अर्ध-घुमंतू पशुपालक अनुसूचित जनजाति समुदाय है. इनकी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा पश्मीना बकरियों पर निर्भर है. भेड़ और याक पालन भी इनकी पारंपरिक आजीविका का हिस्सा है.
चांगपा समुदाय की आबादी जनगणना 2011 के अनुसार, 2661 थी, इनमें 1355 पुरुष और 1306 महिलाएं थी. इसमें 2257 लोग ग्रामीण और 404 शहरी क्षेत्रों में दर्ज किए गए थे. यह 2011 का आंकड़ा है, इसलिए मौजूदा आबादी इससे अलग हो सकती है.
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