मुस्कान चौधरी
कभी आसमान में उड़ते जहाज को देखकर ज्यादातर लोग बस उसे निहारते थे. लेकिन एक लड़की ऐसी भी थी, जिसने उस जहाज में अपना भविष्य देख लिया था. उस दौर में जब पायलट की सीट को पुरुषों के लिए ही बना माना जाता था, एक भारतीय महिला ने कॉकपिट तक पहुंचकर इतिहास रच दिया. नाम था दुर्बा बनर्जी.
दुर्बा की कहानी सिर्फ भारत की पहली महिला कमर्शियल पायलट बनने की कहानी नहीं है. यह उस महिला की कहानी है, जिसने अपने समय की सोच से आगे जाकर सपना देखा और फिर उसे सच भी किया. आज जब भारत में हजारों महिलाएं पायलट के रूप में उड़ान भर रही हैं, तो इस सफर की शुरुआत करने वाली दुर्बा बनर्जी का नाम सबसे पहले याद आता है.
दुर्बा बनर्जी का जन्म 1930 में कोलकाता में हुआ था. बचपन से ही उन्हें हवाई जहाज और उड़ान में खास दिलचस्पी थी. आसमान में उड़ता कोई विमान उनके लिए सिर्फ देखने की चीज नहीं था. वह सोचती थीं कि एक दिन वह खुद भी विमान उड़ाएंगी. लेकिन जिस समय दुर्बा ने यह सपना देखा, तब हालात आज जैसे नहीं थे. महिलाओं के लिए करियर के विकल्प काफी सीमित थे. विमान उड़ाना तो दूर की बात थी, किसी महिला का पायलट बनने के बारे में सोचना भी लोगों को हैरान कर देता था.
दुर्बा की निजी जिंदगी में भी मुश्किलें कम नहीं थीं. महज 16 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई और 24 साल की उम्र में वह विधवा हो गईं. जिंदगी ने उन्हें कम उम्र में ही कई बड़े झटके दिए, लेकिन उड़ान का सपना उन्होंने नहीं छोड़ा. मुश्किलें बढ़ीं, लेकिन विमान उड़ाने का जुनून कम नहीं हुआ.
1950 के दशक में महिला के लिए कॉकपिट तक पहुंचना आसान नहीं था
दुर्बा बनर्जी ने विमानन क्षेत्र में कदम रखा तो उनके सामने सिर्फ तकनीकी चुनौतियां नहीं थीं. उन्हें लोगों की सोच से भी लड़ना था. उस दौर में यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या एक महिला विमान की कमान संभाल सकती है. क्या वह यात्रियों की जिम्मेदारी उठा सकती है. क्या वह मुश्किल परिस्थितियों में सही फैसला ले सकती है. दुर्बा ने इन सवालों का जवाब बहस से नहीं, अपनी उड़ान से दिया. वह लगातार सीखती रहीं, प्रशिक्षण लेती रहीं और अपने कौशल को मजबूत करती रहीं. धीरे-धीरे वही कॉकपिट, जो कभी महिलाओं के लिए लगभग बंद समझा जाता था, उनके लिए काम की जगह बन गया.
DC-3 से शुरू हुई उड़ान
1959 में दुर्बा बनर्जी ने एयर सर्वे ऑफ इंडिया के साथ DC-3 पायलट के तौर पर अपने विमानन करियर की शुरुआत की. यह उनके करियर का अहम पड़ाव था. DC-3 जैसे विमान को उड़ाने के लिए सिर्फ आत्मविश्वास काफी नहीं था. इसके लिए तकनीकी समझ, अनुशासन और हर परिस्थिति में शांत रहकर फैसला लेने की क्षमता जरूरी थी.
दुर्बा ने यह सब हासिल किया और आगे बढ़ती गईं. उनका सफर यहीं नहीं रुका. उन्होंने इंडियन एयरलाइंस के साथ भी काम किया और भारत की पहली महिला कमर्शियल पायलट के तौर पर अपनी पहचान बनाई. भारतीय विमानन इतिहास में उनका नाम शुरुआती महिला कमर्शियल पायलट के रूप में दर्ज है.
एक विमान नहीं, कई तरह की उड़ान
दुर्बा का करियर किसी एक विमान तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने डच F27 टर्बोप्रॉप विमान की कमान संभाली. इसके अलावा उन्होंने Boeing 737, टॉरनेडो A-200, एयरबस 300 जैसे विमानों के लिए भी प्रशिक्षण और टाइप रेटिंग हासिल की. यानी विमानन तकनीक बदलती गई और दुर्बा भी उसके साथ खुद को बदलती रहीं.
उनके नाम करीब 9,000 घंटे से ज्यादा का उड़ान अनुभव बताया जाता है. यह आंकड़ा अपने आप में उनकी लंबी और शानदार एविएशन यात्रा की कहानी कहता है. सोचिए, हजारों घंटे तक अलग-अलग मौसम, अलग-अलग परिस्थितियों और अलग-अलग जिम्मेदारियों के बीच विमान उड़ाना कैसा अनुभव रहा होगा. हर उड़ान में यात्रियों की सुरक्षा सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है. दुर्बा ने यह जिम्मेदारी लंबे समय तक निभाई.
दुर्बा की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद उनके उड़ाए विमानों की संख्या या फ्लाइट टाइम नहीं था. उनकी असली उपलब्धि यह थी कि उन्होंने लोगों की सोच बदली. उन्होंने दिखाया कि पायलट बनने के लिए पुरुष होना जरूरी नहीं है. जरूरी है प्रशिक्षण, अनुशासन, आत्मविश्वास और जिम्मेदारी उठाने की क्षमता.
आज भारत में 25,001 पायलट, इनमें 2,764 महिलाएं

दुर्बा के समय से भारत का एविएशन सेक्टर काफी बदल चुका है. eGCA में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, भारत में कुल 25,001 रजिस्टर्ड पायलट हैं. इनमें 2,764 महिलाएं हैं. यानी अब भारत में महिला पायलटों की हिस्सेदारी 15 फीसदी से ज्यादा है. दुनिया के आंकड़ों से तुलना करें तो यह और भी खास तस्वीर सामने आती है. इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ वुमेन एयरलाइन पायलट्स के मुताबिक, दुनियाभर में करीब 5 फीसदी पायलट महिलाएं हैं. इसके मुकाबले भारत में यह हिस्सेदारी तीन गुना से भी ज्यादा है. DGCA के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, शेड्यूल एयरलाइंस में काम करने वाले पायलटों में करीब 14 फीसदी महिलाएं हैं.
कमर्शियल पायलट लाइसेंस में भी महिलाओं की बढ़ती हिस्सेदारी
महिला पायलटों की बढ़ती संख्या का असर कमर्शियल पायलट लाइसेंस यानी CPL के आंकड़ों में भी साफ दिखाई देता है. नागरिक उड्डयन मंत्रालय की ओर से राज्यसभा में दिए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में DGCA ने कुल 1,652 CPL जारी किए. इनमें 615 लाइसेंस महिलाओं को मिले, यानी कुल जारी CPL में महिलाओं की हिस्सेदारी 22.57 फीसदी रही.
आंकड़ों के मुताबिक, भारत में कुल 25,001 लाइसेंसधारी पायलट हैं. वहीं, वित्त वर्ष 2025 के दौरान विदेशी फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गनाइजेशन यानी FTO में प्रशिक्षण लेने वाले कैडेट्स को 615 CPL जारी किए गए. इसी अवधि में देश में 2,309 स्टूडेंट पायलट लाइसेंस (SPL) भी जारी किए गए.

इन आंकड़ों को देखें तो तस्वीर साफ है. कुल CPL की संख्या करीब दोगुनी हुई, लेकिन महिलाओं के CPL में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी हुई.
सिर्फ एयरलाइन नहीं, हेलीकॉप्टर सेक्टर में भी बढ़ेंगे मौके
भारत में एविएशन का विस्तार सिर्फ यात्री विमानों तक सीमित नहीं है. हेलीकॉप्टर सेक्टर में भी पायलटों की जरूरत बढ़ रही है. DGCA ने छोटे बिजनेस और हेलीकॉप्टर ऑपरेटरों की मांग को देखते हुए एक नए हेलीकॉप्टर फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गनाइजेशन को मंजूरी दी है. इससे उम्मीदवार हेलीकॉप्टर उड़ाने की ट्रेनिंग लेकर कमर्शियल हेलीकॉप्टर पायलट लाइसेंस हासिल कर सकेंगे.
भारत में हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल रीजनल कनेक्टिविटी, तीर्थयात्रा और एयर एंबुलेंस जैसी सेवाओं में होता है. अभी इस क्षेत्र में प्रशिक्षित पायलटों के लिए पूर्व-सैन्य पायलटों पर काफी निर्भरता रहती है. नई ट्रेनिंग व्यवस्था से नए पायलटों के लिए रास्ता खुल सकता है. और इसमें महिलाओं के लिए भी नए मौके बन सकते हैं.
पायलट बनने के लिए ट्रेनिंग का दायरा भी बढ़ रहा है
सरकार की ओर से पायलट ट्रेनिंग को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए गए हैं. एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पांच एयरपोर्ट्स, बेलगावी, जलगांव, कलबुर्गी, खजुराहो और लीलाबारी में नौ नए फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गनाइजेशन के लिए अवार्ड लेटर जारी किए गए हैं. DGCA में मंजूरी की प्रक्रियाओं को डिजिटल किया गया है. फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर को भी ज्यादा अधिकार दिए गए हैं. उम्मीद है कि इससे फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गनाइजेशन में उड़ान के घंटे बढ़ेंगे और हर साल ज्यादा CPL जारी किए जा सकेंगे. इसका फायदा उन सभी युवाओं को मिलेगा, जो पायलट बनना चाहते हैं. महिलाओं के लिए यह अवसर और महत्वपूर्ण है, क्योंकि संख्या बढ़ने के बावजूद ट्रेनिंग की लागत और सामाजिक सोच अब भी बड़ी चुनौती हैं.
अब बेटियों को भी बताया जा रहा है कि पायलट बनना संभव है
महिला पायलटों की संख्या बढ़ाने के लिए सिर्फ ट्रेनिंग सेंटर खोलना काफी नहीं है. जरूरत है कि लड़कियों को बचपन से ही बताया जाए कि एविएशन भी उनके लिए करियर का विकल्प है. इसी दिशा में Women in Aviation International का इंडिया चैप्टर नागरिक उड्डयन मंत्रालय, इंडस्ट्री और महिला एविएशन प्रोफेशनल्स के साथ मिलकर जागरूकता कार्यक्रम चलाता है.
इन कार्यक्रमों में स्कूली छात्राओं पर खास ध्यान दिया जाता है. कम आय वाले परिवारों से आने वाली छात्राओं को भी एविएशन में करियर के विकल्पों के बारे में जानकारी दी जाती है. क्योंकि कई बार सपना इसलिए नहीं टूटता कि कोई उसे पूरा नहीं कर सकता. सपना इसलिए पीछे छूट जाता है क्योंकि उसे देखने का मौका ही नहीं मिलता.
आने वाले समय में हजारों पायलटों की जरूरत
भारत का एविएशन सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है. एयर इंडिया और इंडिगो जैसी एयरलाइंस के पास बड़ी संख्या में नए विमानों के ऑर्डर हैं. इन विमानों के संचालन के लिए आने वाले वर्षों में हजारों पायलटों की जरूरत होगी. यही वजह है कि देश में पायलट ट्रेनिंग की क्षमता बढ़ाने से लेकर नए FTO खोलने तक पर जोर दिया जा रहा है. इस बदलाव का एक बड़ा फायदा यह हो सकता है कि पायलट का करियर अब सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित न रहे. ज्यादा युवा इस पेशे में आएं और उनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी हों.
दुर्बा की उड़ान आज भी जारी है
दुर्बा बनर्जी के लिए विमान उड़ाना सिर्फ नौकरी नहीं था. यह उनका सपना था. जिंदगी ने उनके सामने कम उम्र में कई मुश्किलें रखीं, लेकिन उन्होंने अपने सपने को पीछे नहीं छोड़ा. आज भारत में 2,764 महिला पायलटों का आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं है. इसके पीछे उन हजारों लड़कियों के सपने हैं, जो अब आसमान को देखकर सिर्फ विमान नहीं देखतीं, बल्कि उसमें अपना भविष्य भी देखती हैं. करीब सात दशक पहले दुर्बा बनर्जी ने जिस कॉकपिट का दरवाजा खोला था, आज वहां पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है.

