विजय उरांव
उत्तर प्रदेश में खास तौर पर कमजोर आदिवासी समुदायों यानी PVTGs की आबादी 3,527 दर्ज की गई है. इनमें बुक्सा और राजी समुदाय शामिल हैं. सरकार इन समुदायों को रोजगार और कमाई से जोड़ने के लिए वन धन विकास केंद्र (VDVK) चला रही है, ताकि आदिवासी अपने जंगल और स्थानीय उत्पादों को बेचकर बेहतर कमाई कर सकें.
राज्यसभा में 29 जुलाई 2026 (Q. No. 1263) को दिए जवाब में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने बताया कि देश के 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में PVTGs के लिए अब तक 540 वन धन विकास केंद्र मंजूर किए गए हैं. इन केंद्रों से करीब 46,042 PVTG लोगों को जोड़ने की बात सरकार ने कही है.
उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां सिर्फ 5 PVTG वन धन केंद्र मंजूर हुए हैं और ये पांचों बिजनौर जिले में हैं. इन केंद्रों से 319 PVTG लाभार्थी जुड़े हैं.
इन केंद्रों का काम सिर्फ सामान बनवाना नहीं है. यहां आदिवासी स्वयं सहायता समूहों को अपने उत्पादों को बेहतर तरीके से तैयार करने, उनकी कीमत बढ़ाने और उन्हें बाजार तक पहुंचाने में मदद दी जाती है. सरकार का कहना है कि TRIFED के जरिए इन उत्पादों को बाजार दिलाने की कोशिश की जाती है.
3,527 PVTGs में 319 को फायदा, बाकी का क्या?
सरकारी सर्वे में उत्तर प्रदेश में 3,527 PVTG आबादी दर्ज है. वहीं VDVK के तहत 319 लोगों को लाभार्थी बताया गया है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी सभी PVTG परिवारों को योजना का कोई लाभ नहीं मिला. एक केंद्र के जरिए स्वयं सहायता समूहों से जुड़े कई परिवारों को जोड़ा जा सकता है.
फिर भी सवाल उठता है कि इन पांच केंद्रों की पहुंच कितनी है और बाकी PVTG परिवारों तक ऐसी योजनाओं का फायदा कैसे पहुंच रहा है? सरकार के जवाब में यह साफ नहीं है कि 319 लाभार्थियों में बुक्सा और राजी समुदाय के कितने लोग हैं और ये पांच केंद्र किन-किन गांवों या बस्तियों को कवर कर रहे हैं.
असली सवाल: जमीन पर कितना फायदा मिला?
सरकारी कागजों में बिजनौर में पांच वन धन केंद्र और 319 लाभार्थी हैं. लेकिन असली तस्वीर तभी सामने आएगी जब यह पता चले कि इन केंद्रों से जुड़े लोगों की जिंदगी में क्या बदला.
क्या उनकी कमाई बढ़ी?
क्या उनके बनाए सामान को बाजार मिला?
क्या उन्हें अपने उत्पाद की सही कीमत मिल रही है?
क्या TRIFED ने उनके सामान को बड़े बाजार तक पहुंचाया?
और क्या ये पांचों केंद्र सच में चल रहे हैं?
क्योंकि योजना का मकसद सिर्फ केंद्र खोलना या लाभार्थियों की संख्या बताना नहीं है. असली मकसद PVTG परिवारों की कमाई बढ़ाना और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना है.
इटावा के चंबल में क्या हुआ?
राज्यसभा में 29 जुलाई 2026 (Q. No. 1263) को पूछे गए सवाल में इटावा के चंबल इलाके को लेकर भी जानकारी मांगी गई थी. सवाल था कि क्या वहां रहने वाले PVTGs को जनजातीय विकास मिशन में शामिल किया गया है और क्या वहां वन धन केंद्र या ट्राइबल हाट बाजार बनाए गए हैं.
सरकार के जवाब में इटावा के चंबल इलाके में किसी वन धन केंद्र या ट्राइबल हाट बाजार की मंजूरी या स्थापना की जानकारी नहीं दी गई. इसका मतलब यह नहीं है कि चंबल इलाके में PVTGs के लिए कोई दूसरी सरकारी योजना नहीं चल रही. लेकिन इस खास योजना के तहत चंबल क्षेत्र के लिए सरकार के जवाब में कोई केंद्र या हाट बाजार सामने नहीं आया.
अब सवाल सीधा है—सरकारी आंकड़ों में उत्तर प्रदेश में 3,527 PVTGs हैं, लेकिन पांच वन धन केंद्र और 319 लाभार्थियों वाली यह योजना आखिर कितने परिवारों की जिंदगी बदल रही है? और बिजनौर के जिन लोगों को इसका फायदा मिल रहा है, क्या उन्हें सच में इसका लाभ महसूस हो रहा है?
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