31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गांव में जन्मे प्रेमचंद ने हिंदी और उर्दू साहित्य को सिर्फ कहानियां और उपन्यास नहीं दिए, बल्कि भारतीय समाज को देखने का एक नजरिया भी दिया. उनकी रचनाओं में किसान, मजदूर, गरीब, महिला और वह आम आदमी दिखाई देता है, जिसकी जिंदगी की मुश्किलें अक्सर बड़ी चर्चाओं से बाहर रह जाती हैं. यही वजह है कि प्रेमचंद को पढ़ना आज भी सिर्फ साहित्य पढ़ना नहीं, बल्कि अपने समाज को समझना माना जाता है.
धनपत राय से प्रेमचंद बनने तक का सफर
प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था. उनका बचपन आर्थिक परेशानियों के बीच बीता. कम उम्र में मां का निधन हो गया और परिवार की जिम्मेदारियां भी जल्दी उनके कंधों पर आ गईं. इसके बावजूद पढ़ने और लिखने का शौक बना रहा.
उन्होंने लेखन की शुरुआत उर्दू से की और शुरुआती दौर में ‘नवाब राय’ नाम से लिखा. साल 1908 में उनकी किताब ‘सोज़-ए-वतन’ प्रकाशित हुई. इसमें देशभक्ति की भावना थी, जिसे अंग्रेज सरकार ने आपत्तिजनक माना और इसकी प्रतियां जब्त कर लीं. इसके बाद ‘नवाब राय’ नाम से लिखना मुश्किल हो गया और आगे चलकर उन्होंने ‘प्रेमचंद’ नाम से लिखना शुरू किया.
प्रेमचंद ने शिक्षक की नौकरी की और बाद में शिक्षा विभाग में भी काम किया. लेकिन 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी. इसके बाद साहित्य ही उनके जीवन का मुख्य आधार बन गया.
‘गोदान’ से ‘गबन’ तक, समाज की तस्वीर
प्रेमचंद ने करीब तीन सौ कहानियां और कई उपन्यास लिखे. उनके साहित्य में समाज के अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं.
उनका सबसे चर्चित उपन्यास ‘गोदान’ 1936 में प्रकाशित हुआ. इसका मुख्य पात्र होरी एक किसान है, जो अपनी छोटी-सी इच्छा पूरी करने के लिए जिंदगीभर संघर्ष करता है. होरी के जरिए प्रेमचंद ने किसान जीवन, कर्ज, गरीबी और सामाजिक दबाव की पूरी तस्वीर सामने रखी.
प्रेमचंद की गबन में मध्यवर्गीय जीवन, दिखावे और आर्थिक लालच की कहानी है. वहीं निर्मला दहेज और बेमेल विवाह की समस्या सामने रखती है, जबकि सेवासदन में स्त्री जीवन और सामाजिक व्यवस्था के सवाल उठते हैं. इसके अलावा कर्मभूमि और रंगभूमि में सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों की झलक मिलती है.
उनकी कहानियां भी उतनी ही चर्चित हैं. जैसे – ईदगाह का हामिद गरीबी के बीच अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है. पूस की रात में किसान की मजबूरी दिखाती है. सद्गति जातिगत भेदभाव पर सवाल उठाती है और कफन में गरीबी की उस सीमा को सामने लाती है, जहां मानवीय संवेदनाएं भी सवालों के घेरे में आ जाती हैं.
साहित्य में दिखा भारत का असली चेहरा
प्रेमचंद के समय का भारत गरीबी, सामाजिक असमानता और अंग्रेजी शासन की चुनौतियों से जूझ रहा था. लेकिन उनकी नजर सिर्फ राजनीतिक घटनाओं पर नहीं थी. वह यह भी देख रहे थे कि इन परिस्थितियों का असर आम आदमी की जिंदगी पर कैसे पड़ रहा है.
उनके साहित्य में किसान सिर्फ खेत में काम करने वाला व्यक्ति नहीं है, उसके साथ कर्ज और आर्थिक मजबूरी भी है. मजदूर सिर्फ मेहनत करने वाला इंसान नहीं, बल्कि शोषण का शिकार भी है. महिला सिर्फ परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं और संघर्षों वाली एक स्वतंत्र व्यक्ति भी है.
प्रेमचंद ने इन समस्याओं के आसान समाधान नहीं दिए. उन्होंने समाज के सामने आईना रख दिया. यही उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी ताकत है.
प्रेमचंद की सबसे बड़ी विरासत
प्रेमचंद का महत्व सिर्फ गोदान, गबन, निर्मला, सेवासदन, कर्मभूमि और रंगभूमि जैसे उपन्यासों या ‘ईदगाह’, ‘कफन’, ‘सद्गति’ और ‘पूस की रात’ जैसी कहानियों के कारण नहीं है. उनकी असली ताकत यह थी कि उन्होंने साहित्य का केंद्र बदल दिया.
उन्होंने आम आदमी को कहानी का मुख्य पात्र बनाया और उस भारत को लिखा, जो गांवों में रहता था, खेतों में काम करता था और अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए संघर्ष करता था.
साल 8 अक्टूबर 1936 को 56 वर्ष की उम्र में प्रेमचंद का निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएं उनके साथ खत्म नहीं हुईं. गोदान का होरी, ईदगाह का हामिद और पूस की रात का हल्कू आज भी पाठकों के बीच जिंदा हैं.
समय बदला, समाज बदला और भारत भी बदला. लेकिन किसान की चिंता, गरीबी, सामाजिक असमानता और बराबरी के सवाल आज भी मौजूद हैं. शायद यही प्रेमचंद की सबसे बड़ी विरासत है, उन्होंने साहित्य को सिर्फ पढ़ने की चीज नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज को समझने का जरिया बना दिया.
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