आदिल नवाब, जोहार लाइव
पंजाब विधानसभा चुनाव अब कुछ ही महीने दूर हैं. ऐसे समय में भारतीय जनता पार्टी ने संत रविदास की 650वीं जयंती के अवसर पर लगभग आठ महीने तक चलने वाले राष्ट्रव्यापी अभियान का ऐलान किया है. बीते मंगलवार 28 जुलाई को झारखंड के रांची स्थित बीजेपी प्रदेश मुख्यालय में पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा ने इसकी घोषणा की.
29 जुलाई यानी आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर 20 फरवरी यानी संत रविदास जयंती तक चलने वाले इस अभियान में वाराणसी स्थित संत रविदास जन्मस्थली सीर गोवर्धनपुर की मिट्टी पूरे देश के राज्यों, जिलों और मंडलों तक पहुंचाई जाएगी. इसके साथ ही कलश यात्राएं, सामाजिक समरसता कार्यक्रम, सांस्कृतिक आयोजन और जनसंपर्क अभियान चलाए जाएंगे.
बीजेपी इस अभियान को संत रविदास के विचारों के प्रचार-प्रसार और सामाजिक समरसता का अभियान बता रही है. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका समय और स्वरूप पंजाब विधानसभा चुनाव से अलग करके नहीं देखा जा सकता.
सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि पंजाब देश का वह राज्य है जहां अनुसूचित जाति की आबादी सबसे अधिक है और रविदासिया समुदाय चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है.
क्यों महत्वपूर्ण है रविदासिया समाज?
संत रविदास दलित समाज के सबसे बड़े संतों और समाज सुधारकों में से एक हैं. उन्होंने जाति-भेद, ऊंच-नीच और छुआछूत का विरोध करते हुए समानता, मानव गरिमा और सामाजिक न्याय का संदेश दिया. उनके विचारों ने विशेष रूप से रविदासिया (चमार) समुदाय सहित अनेक दलित समुदायों को आत्मसम्मान और सामाजिक पहचान दी.
संत रविदास का प्रसिद्ध पद— “मन चंगा तो कठौती में गंगा“—बताता है कि ईश्वर की प्राप्ति बाहरी आडंबरों से नहीं, बल्कि मन की पवित्रता और सदाचार से होती है. यही कारण है कि पंजाब सहित उत्तर भारत के बड़े हिस्से में दलित समाज संत रविदास को अपनी आध्यात्मिक और सामाजिक चेतना का प्रतीक मानता है.
पंजाब की लगभग 32 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति की है, जो देश में सबसे अधिक है. इनमें रविदासिया, रामदासिया और आदधर्मी समुदाय का बड़ा हिस्सा दोआबा क्षेत्र—जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और शहीद भगत सिंह नगर—में रहता है. यही क्षेत्र पंजाब की कई विधानसभा और लोकसभा सीटों का चुनावी परिणाम तय करने की क्षमता रखता है.
राजनीतिक दल वर्षों से इस समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते रहे हैं. कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, अकाली दल और अब बीजेपी—सभी की राजनीतिक रणनीति में रविदासिया समाज और उससे जुड़े धार्मिक केंद्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने अभूतपूर्व जीत दर्ज की थी. पंजाब पर पंजाब विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर अशुतोष कुमार के द्वारा किए गए रिसर्च “द 2024 पार्लियामेंटरी इलेक्शन्स एंड पंजाब पॉलिटिक्स: कॉमनैलिटीज़, एक्सेप्शनलिज़्म एंड टेकअवेज़” के अनुसार दलित मतदाताओं का बड़ा हिस्सा उस पार्टी की ओर गया जिसे सत्ता में आने की सबसे अधिक संभावना दिखाई दे रही थी.
इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को दलित समाज का व्यापक समर्थन मिला और उसने राज्य की सत्ता पर कब्जा कर लिया. यानी दलित वोट किसी एक पार्टी के स्थायी वोट बैंक नहीं रहे, बल्कि परिस्थितियों और राजनीतिक माहौल के अनुसार उनका रुझान बदलता रहा है. यही वजह है कि आज सभी दल इस वर्ग को साधने में जुटे हैं.
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रकाशित चुनावी अध्ययन बताते हैं कि दलित सिख मतदाताओं के बीच कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अभी भी बीजेपी से आगे हैं. वहीं हिंदू दलित मतदाताओं में बीजेपी ने कुछ आधार बढ़ाया है, लेकिन वह अभी भी निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंची है.
सीएसडीएस अपने पोस्ट पोल सर्वे में बताते हैं दलित सिख मतदाताओं में लगभग 38 प्रतिशत वोट आम आदमी पार्टी को, 31 प्रतिशत कांग्रेस को, जबकि बीजेपी को केवल लगभग 6 प्रतिशत समर्थन मिला. दूसरी ओर हिंदू दलित मतदाताओं में कांग्रेस को लगभग 32 प्रतिशत, आम आदमी पार्टी को 24 प्रतिशत और बीजेपी को लगभग 23 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया है. यानी आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती दलित सिख मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की है.
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में बीजेपी ने संत रविदास की 650वीं जयंती को केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि इसे देशव्यापी सामाजिक अभियान का स्वरूप दिया है.
वाराणसी स्थित संत रविदास जन्मस्थली से पवित्र मिट्टी का संग्रह. “कलश-वंदन अभियान” के माध्यम से मिट्टी को राज्यों, जिलों और मंडलों तक पहुंचाना. सामाजिक समरसता सम्मेलन. दलित बहुल क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान. इसके अलावा संत रविदास जयंती तक लगातार कार्यक्रमों का आयोजन. यह अभियान ठीक उसी अवधि में चल रहा है जब पंजाब में चुनावी गतिविधियां तेज होने वाली हैं. ऐसे में इसकी राजनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है.
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क्या डेरों तक पहुंच बनाने की भी कोशिश?
पंजाब की राजनीति में धार्मिक डेरों का प्रभाव लंबे समय से रहा है. विशेषकर रविदासिया समाज जो कि 11 से 13 प्रतिशत से जुड़े डेरों का दोआबा और जालंधर क्षेत्र में व्यापक सामाजिक प्रभाव माना जाता है. चुनाव के समय लगभग सभी राजनीतिक दल इन डेरों के प्रमुखों से मुलाकात करते हैं और उनका आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं.
बीजेपी भी पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में लगातार सक्रिय रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं कई बार संत रविदास जयंती कार्यक्रमों में शामिल हो चुके हैं. वाराणसी स्थित संत रविदास मंदिर के विकास और संत रविदास से जुड़े आयोजनों में भी केंद्र सरकार विशेष रुचि दिखाती रही है.
पंजाब के जालंधर जिले के बल्लां गांव में ‘डेरा सचखंड बल्लां’ स्थित है. इसे रविदासिया समुदाय का सबसे प्रमुख धार्मिक और संस्थागत केंद्र माना जाता है. यह केवल संत रविदास से जुड़ा एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि रविदासिया परंपरा का केंद्रीय संस्थान है, जो संत रविदास को अपना आदि गुरु और आध्यात्मिक संस्थापक मानता है.
देश और विदेश, विशेषकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, कनाडा और ब्रिटेन में रहने वाले लाखों रविदासिया अनुयायियों की इस डेरे में गहरी आस्था है. पंजाब की राजनीति में इस डेरे का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि दोआबा क्षेत्र के रविदासिया समाज पर इसका व्यापक सामाजिक और धार्मिक प्रभाव माना जाता है.
यही कारण है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल—कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी—डेरा सचखंड बल्लां के संतों और अनुयायियों तक अपनी पहुंच बनाने का प्रयास करते हैं.
ऐसे में संत रविदास की 650वीं जयंती पर बीजेपी द्वारा शुरू किए गए आठ महीने लंबे अभियान को राजनीतिक विश्लेषक रविदासिया समाज के बीच अपनी पैठ मजबूत करने की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं.
सिर्फ बीजेपी ही नहीं, सभी दलों की नजर दलित वोट पर
दलित राजनीति को लेकर केवल बीजेपी सक्रिय नहीं है. कांग्रेस ने 2021 में चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का पहला दलित मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था. आम आदमी पार्टी सत्ता में आने के बाद लगातार दलित समुदाय और धार्मिक संस्थानों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रही है. शिरोमणि अकाली दल भी रविदासिया समाज और डेरों के साथ अपने पुराने संबंधों को मजबूत करने में जुटा हुआ है. यानी पंजाब की राजनीति में दलित समाज आज सबसे बड़ा चुनावी केंद्र बन चुका है.
यहीं से सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल पैदा होता है. बीजेपी का कहना है कि यह अभियान संत रविदास के विचारों—समानता, सामाजिक न्याय और समरसता—को जन-जन तक पहुंचाने के लिए चलाया जा रहा है. लेकिन विपक्ष का आरोप है कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले शुरू किया गया यह लंबा अभियान दलित मतदाताओं, विशेषकर रविदासिया समाज, को अपने पक्ष में करने की चुनावी रणनीति है.
सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं हो सकती है. धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का राजनीतिक महत्व पंजाब जैसे राज्य में हमेशा रहा है. ऐसे में चुनाव से पहले संत रविदास के नाम पर शुरू हुआ यह आठ महीने का अभियान केवल आध्यात्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम भर नहीं माना जा सकता , बल्कि इसे पंजाब की बदलती दलित राजनीति और 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में भी देखा जा सकता है.
पंजाब में दलित मतदाता अब पहले की तरह किसी एक दल के साथ स्थायी रूप से नहीं जुड़े हैं. 2022 में उन्होंने आम आदमी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया, 2024 में उनका समर्थन अलग-अलग दलों में बंटा दिखाई दिया. अब 2027 के चुनाव से पहले बीजेपी संत रविदास के माध्यम से उसी सामाजिक आधार में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है.
आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि संत रविदास की विरासत पर आधारित यह व्यापक अभियान सामाजिक संवाद तक सीमित रहता है या फिर पंजाब की चुनावी राजनीति में बीजेपी के लिए नया दलित आधार तैयार करने में सफल होता है.
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