सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने संविधान के केशवानंद भारती फैसले को भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था की आधारशिला बताते हुए कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसके मूल ढांचे को बदला नहीं जा सकता. उन्होंने इस ऐतिहासिक फैसले की न्यायशास्त्रीय वैधता पर सवाल उठाने को गलत बताया. जस्टिस भुइयां ने कहा कि यह फैसला समय की कसौटी पर खरा उतरा है और बाद में कई संविधान पीठों द्वारा इसे लागू किया गया है.
उन्होंने कहा कि संविधान का मूल ढांचा और मौलिक अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद हैं. इसी संदर्भ में उन्होंने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और असहमति के लिए सार्वजनिक जगह लगातार सिकुड़ने पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि अपने विचार व्यक्त करना और शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करना नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रताओं का हिस्सा है. बहस और असहमति लोकतंत्र का सार हैं, लेकिन दुर्भाग्य से कई बार सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों को भी अपराध की तरह देखा जा रहा है.
जस्टिस भुइयां भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में आयोजित 5वें जस्टिस जी.पी. सिंह मेमोरियल लेक्चर को संबोधित कर रहे थे.
उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय क्षरण जैसे वास्तविक मुद्दों को लेकर आवाज उठाने वाले लोगों को भी कई बार अपराधियों की तरह खदेड़ा जाता है. विश्वविद्यालय परिसरों में अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन करने वाले छात्रों को गिरफ्तार किया जाता है और उन्हें 30-40 दिनों तक जमानत नहीं मिलती. इसके बाद निलंबन जैसी कार्रवाई का सामना करने वाले छात्रों को न्याय के लिए अदालत का रुख करना पड़ता है, जिसमें काफी समय लग जाता है.
अपराध नहीं तो तीन महीने जेल क्यों?
जस्टिस भुइयां ने गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित करने वाले युवाओं की गिरफ्तारी का उदाहरण देते हुए जमानत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि यदि कोई गतिविधि अपराध नहीं है तो उसके लिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर तीन महीने तक जेल में रखना और जमानत से वंचित करना कैसे उचित हो सकता है.
उन्होंने कहा, “मुझे पूरा विश्वास है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है. गंगा नदी के ऊपर चिकन खाने पर प्रतिबंध लगाने वाला कोई कानून नहीं है. फिर भी लोगों को इसी वजह से गिरफ्तार किया गया और उन्हें तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा. क्या किसी ऐसी गतिविधि के लिए, जो अपराध ही नहीं है, लोगों को गिरफ्तार करके तीन महीने तक जमानत से वंचित किया जा सकता है?”
उन्होंने दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में छात्र कार्यकर्ताओं को जमानत के दौरान लगाई गई प्रतिबंधात्मक शर्तों का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि लंबे समय तक जेल में रहने के बाद जमानत पाने वाले युवा कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक बैठकों में प्रत्यक्ष या ऑनलाइन भाग लेने और उन्हें संबोधित करने से रोकना उनकी मौलिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है.
गाजा-फिलिस्तीन प्रदर्शन पर भी उठाए सवाल
जस्टिस भुइयां ने मुंबई के शिवाजी पार्क में गाजा और फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन की अनुमति नहीं दिए जाने का भी उल्लेख किया. उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट की उस टिप्पणी पर सवाल उठाया, जिसमें प्रदर्शनकारियों से कहा गया था कि जब देश में कई समस्याएं हैं तो वे गाजा और फिलिस्तीन के मुद्दे पर क्यों प्रदर्शन कर रहे हैं.
उन्होंने कहा कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन को मान्यता दी है और भारत में फिलिस्तीनी दूतावास भी है. उन्होंने गाजा में हिंसा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाए गए सवालों का भी जिक्र किया.
विश्वविद्यालयों में असहमति के लिए जगह जरूरी
जस्टिस भुइयां ने कहा कि विश्वविद्यालय छात्रों के लिए आलोचनात्मक सोच, शोध और बहस के केंद्र होने चाहिए. छात्रों को विभिन्न मुद्दों पर सवाल पूछने और अपनी राय रखने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, न कि उनके विचारों के कारण उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए.
उन्होंने न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण को भी लोकतंत्र के लिए जरूरी बताया. तीन पैरों वाली स्टूल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि उसके दो पैर एक ही स्थान पर हों तो वह गिर जाएगी. इसी तरह सत्ता के दो अंगों का अत्यधिक निकट आ जाना लोकतांत्रिक संतुलन के लिए उचित नहीं है.
जस्टिस भुइयां ने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के राजनीति में जाने के मुद्दे पर भी टिप्पणी की और कहा कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच “पुल” बनने की बात शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत है.
उन्होंने पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा केशवानंद भारती फैसले की न्यायशास्त्रीय वैधता पर सवाल उठाए जाने की भी आलोचना की. जस्टिस भुइयां के संबोधन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता, असहमति, बहस और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा से होती है.
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