अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले को लेकर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के बीच सोशल मीडिया पर छिड़ी जुबानी जंग अब कानूनी मोड़ ले चुकी है. विवाद की शुरुआत 5 जुलाई को हुई, जब निशिकांत दुबे ने एक्स पर एक पोस्ट रीशेयर करते हुए लिखा, “टिन्नू टीपू से ही तो बात कर रहा था?”
अब सवाल उठता है कि आखिर यह टिन्नू और टीपू हैं कौन। दरअसल टिन्नू का मतलब है रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव, जो राम मंदिर दान चोरी मामले का मुख्य आरोपी है. निशिकांत दुबे के पोस्ट का इशारा इसी टिन्नू यादव की ओर था, और उन्होंने “टीपू” कहकर सीधा निशाना अखिलेश यादव पर साधा.
यानी दुबे के पोस्ट का मतलब यह निकाला गया कि जिस टिन्नू यादव पर मंदिर का चढ़ावा चोरी करने का आरोप है, उसकी फोन पर बातचीत खुद अखिलेश यादव से हुई थी. बस यही इशारा अखिलेश यादव को इतना नागवार गुजरा कि पूरा विवाद कानूनी लड़ाई में बदल गया.
इस टिप्पणी पर अखिलेश यादव भड़क गए. उन्होंने भगवान राम की मर्यादा और संसदीय परंपरा का हवाला देते हुए निशिकांत दुबे को पोस्ट हटाने के लिए महज 10 मिनट का अल्टीमेटम दिया, वरना FIR दर्ज कराने की चेतावनी दी. लेकिन दुबे ने पोस्ट नहीं हटाई. इसके बाद 7 जुलाई को समाजवादी अधिवक्ता सभा के अध्यक्ष कृष्ण कन्हैया पाल ने निशिकांत दुबे को पांच पन्नों का मानहानि कानूनी नोटिस भेज दिया.
नोटिस में आरोप लगाया गया कि दुबे ने जानबूझकर अखिलेश यादव और सपा के प्रति नफरत फैलाई, जिससे पार्टी और उसके अध्यक्ष की छवि को नुकसान पहुंचा. नोटिस में यह भी कहा गया कि टिप्पणी जातिगत भी है, क्योंकि अखिलेश यादव ओबीसी समुदाय से आते हैं. दुबे को दो हफ्ते के भीतर सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगने को कहा गया, अन्यथा आपराधिक कार्रवाई की चेतावनी दी गई.
निशिकांत दूबे के वकील का पक्ष
इसके जवाब में निशिकांत दुबे के वकील ऋषि के. अवस्थी ने कृष्ण कन्हैया पाल के वकील शशांक भसीन को 9 जुलाई 2026 को एक विस्तृत जवाबी पत्र भेजा. इस जवाब में कुल मिलाकर नौ मुख्य बिंदु रखे गए, जो कुछ इस तरह हैं:
– सबसे पहले साफ किया गया कि नोटिस में लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह झूठे, बेबुनियाद और कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं हैं.
– बताया गया कि निशिकांत दुबे गोड्डा संसदीय क्षेत्र से चार बार के सांसद रह चुके हैं और उनकी सार्वजनिक जीवन में साफ-सुथरी छवि रही है, वे पारदर्शिता, जवाबदेही और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लगातार उठाते रहे हैं.
– यह भी कहा गया कि नोटिस भेजने वाले पक्ष ने पूरी और सही जानकारी वकील के सामने नहीं रखी, जिस वजह से नोटिस गलतफहमी पर आधारित है.
– दुबे की तरफ से हर आरोप, हर दावे को सिरे से नकार दिया गया.
– स्पष्ट किया गया कि असली शिकायत सिर्फ इतनी है कि दुबे ने एक्स प्लेटफॉर्म पर कथित तौर पर मानहानिकारक टिप्पणी की थी.
– यह भी लिखा गया कि दुबे का न तो कोई इरादा किसी को बदनाम करने का था, और न ही नोटिस भेजने वाले कृष्ण कन्हैया पाल से उनकी पहले कोई निजी जान-पहचान थी.
– याद दिलाया गया कि खुद अखिलेश यादव की तरफ से भी 7 जुलाई 2026 को समाजवादी पार्टी के लेटरहेड पर एक नोटिस भेजा गया था, और दुबे का बयान उसी नोटिस के जवाब में आया था.
– दुबे की तरफ से कहा गया कि वे वकालत के पेशे और अधिवक्ताओं का पूरा सम्मान करते हैं, इसलिए किसी वकील की गरिमा को ठेस पहुंचाने का सवाल ही नहीं उठता.
– और आखिर में, बिना किसी कानूनी जिम्मेदारी को स्वीकार किए, सिर्फ मामले को शांत करने और आपसी सौहार्द बनाए रखने की नीयत से यह कहा गया कि अगर किसी बयान से अनजाने में ठेस पहुंची हो तो उसके लिए खेद है.
यानी दुबे के वकील ने एक तरफ सारे आरोपों को खारिज किया, दूसरी तरफ बिना कानूनी जिम्मेदारी माने “अनजाने में हुई ठेस” के लिए औपचारिक खेद भी जता दिया.
दूसरी ओर, अखिलेश यादव ने टिन्नू यादव से किसी भी तरह की फोन बातचीत को पूरी तरह झूठा करार दिया और भाजपा नेताओं समेत इस दावे को फैलाने वाले सभी लोगों के खिलाफ FIR कराने की चेतावनी दी. यह पूरा प्रकरण अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में गरमाया हुआ है, और आने वाले दिनों में इसका आगे क्या कानूनी नतीजा निकलता है, इस पर सबकी नजर टिकी है.
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