मुस्कान चौधरी, जोहार लाइव संवाददाता
हाल के दिनों में स्कैम, हर्षद मेहता जैसी वेब सीरीज और फिल्मों ने आम लोगों के बीच भी शेयर बाजार को पहुंचा दिया है. वो भले ही सूचकांक, निफ्टी, शेयर बाजार का चढ़ना, गिरना आदि न समझते हों, लेकिन वहां पैसा बहुत है, ये आम समझदारी तो बनी है.
कारोबारी और कारोबार से जुड़े अन्य स्टेक होल्डरों की तो आत्मा ही बसती है. ऐसे में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, यह एक नाम नहीं, बल्कि भारत की तरक्की का वो संस्थान है, जिसके बिना देश और देश का व्यापार चलना लगभग मुश्किल है. आइए समझते हैं, आखिर इसके बनने और होने की कहानी क्या है.
भारत के आर्थिक इतिहास में 9 जुलाई 1875 का दिन बेहद खास है. इसी दिन एशिया के पहले और सबसे पुराने स्टॉक एक्सचेंज – बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) की आधिकारिक स्थापना प्रेमचंद रॉयचंद द्वारा की गई थी. इसकी शुरुआत 1850 के दशक में मुंबई के हॉर्निमन सर्कल में एक बरगद के पेड़ के नीचे कुछ शेयर दलालों के अनौपचारिक समूह से हुई थी.
धीरे-धीरे यह समूह बढ़ता गया और 318 दलालों ने मिलकर 9 जुलाई 1875 को “द नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स एसोसिएशन” (The Native Share & Stock Brokers Association) नामक संस्था की स्थापना की, जो आगे चलकर BSE बना. यह एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है और आज भी भारत की वित्तीय प्रणाली की एक मजबूत आधारशिला बना हुआ है. साल 2017 में यह भारत का पहला सूचीबद्ध स्टॉक एक्सचेंज भी बना. बता दें, स्टॉक मार्केट की शुरुआत 1602 में नीदरलैंड में हुई थी.
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) भारत के पूंजी बाजार की सबसे अहम संस्थाओं में से एक है. इसकी स्थापना ने देश के असंगठित शेयर बाजार को एक व्यवस्थित और आधुनिक पूंजी बाजार में बदलने का काम किया. आज देश की ज्यादातर बड़ी कंपनियों ने पूंजी जुटाने के लिए BSE का सहारा लिया है. BSE का सेंसेक्स भारतीय शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था का सबसे प्रमुख संकेतक माना जाता है. इसकी चाल देखकर निवेशक, उद्योग जगत और सरकार बाजार की स्थिति का अंदाजा लगाते हैं.
एक समय था जब शेयरों की खरीद-बिक्री ट्रेडिंग रिंग में आवाज लगाकर होती थी. BSE ने 1995 में BOLT (BSE Online Trading) सिस्टम शुरू कर इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया. इसके बाद ऑनलाइन ट्रेडिंग ने बाजार को तेज, सुरक्षित और पारदर्शी बना दिया. आज निवेशक मोबाइल फोन से कुछ सेकंड में शेयर खरीद और बेच सकते हैं.
पारदर्शी व्यवस्था और आधुनिक ट्रेडिंग सिस्टम की वजह से विदेशी निवेश बढ़ा. वहीं आम लोगों का रुझान भी बैंक और सोने के साथ-साथ शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड की ओर बढ़ा. डिजिटल ट्रेडिंग और सख्त नियमों ने बाजार को अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद बनाया.
यह देश का पहला एक्सचेंज बना जिसने ऑनलाइन ट्रेडिंग, इक्विटी डेरिवेटिव्स, फ्री फ्लोट इंडेक्स और यूएस डॉलर आधारित सेंसेक्स जैसी सुविधाएं शुरू कीं. 2002 में इसका नाम बदलकर आधिकारिक रूप से BSE कर दिया गया और पहली बार ‘बेल रिंगिंग सेरेमनी’ की शुरुआत हुई, जो आज किसी भी कंपनी की लिस्टिंग का प्रतीक बन चुकी है.
BSE का सबसे बड़ा पहचान चिन्ह है सेंसेक्स 30. प्रमुख कंपनियों पर आधारित यह सूचकांक भारतीय शेयर बाजार का बैरोमीटर माना जाता है. जब सेंसेक्स चढ़ता है तो निवेशकों का भरोसा बढ़ता है और गिरावट आने पर बाजार की चिंता साफ दिखाई देती है. सरकार, उद्योग जगत और विदेशी निवेशक भी सेंसेक्स पर नजर रखते हैं.
BSE ने सिर्फ कारोबार नहीं बढ़ाया, बल्कि निवेशकों को जागरूक करने का भी काम किया. सेबी के साथ मिलकर निवेशक शिक्षा कार्यक्रम चलाए गए. आज BSE दुनिया के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंजों में गिना जाता है. डिजिटल ट्रेडिंग, नए वित्तीय उत्पादों और आधुनिक तकनीक के सहारे यह लगातार आगे बढ़ रहा है. भारत की 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य में भी BSE की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है.
बीएसई के कुछ बुरे दिन
भारत में पिछले कुछ सालों में कई हाई-प्रोफ़ाइल फ़ाइनेंशियल स्कैम हुए हैं, जिनका असर लोगों और संस्थाओं दोनों पर पड़ा है. यहाँ भारतीय इतिहास के कुछ सबसे बदनाम फ़ाइनेंशियल स्कैम दिए गए हैं –
- हर्षद मेहता घोटाला (1992) : हर्षद मेहता घोटाला लगभग ₹4,000 से ₹5,000 करोड़ का एक बड़ा शेयर बाजार घोटाला था. स्टॉकब्रोकर हर्षद मेहता ने बैंकिंग प्रणाली की कमियों और फर्जी बैंक रसीदों का फायदा उठाकर बैंकों से अवैध रूप से धन निकाला और उसे शेयरों में लगाकर उनकी कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ा दीं.
- केतन पारेख घोटाला (2001) : केतन पारेख घोटाला भारतीय शेयर बाजार का एक बड़ा वित्तीय घोटाला था. चार्टर्ड अकाउंटेंट और स्टॉक ब्रोकर केतन पारेख ने बैंकों, विशेष रूप से माधवपुरा मर्चेंटाइल को-ऑपरेटिव बैंक, से बड़ी मात्रा में धन जुटाकर आईटी, मीडिया और टेलीकॉम क्षेत्र के 10 चुनिंदा शेयरों (K-10 स्टॉक्स) की कीमतों में कृत्रिम रूप से बढ़ोतरी की.
जब इन शेयरों के दाम काफी ऊंचे हो गए, तो उन्होंने उन्हें बेचकर भारी मुनाफा कमाया. घोटाले के सामने आने के बाद शेयर बाजार में तेज गिरावट आई, जिससे लाखों छोटे निवेशकों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ. इस मामले में केतन पारेख पर 14 वर्षों तक भारतीय शेयर बाजार में ट्रेडिंग करने पर प्रतिबंध लगाया गया. - पीएनबी नीरव मोदी घोटाला (2018) : पंजाब नेशनल बैंक (PNB) नीरव मोदी घोटाला वर्ष 2018 में सामने आया भारत के सबसे बड़े बैंकिंग घोटालों में से एक था, जिसकी राशि लगभग ₹13,850 करोड़ थी. इस घोटाले के मुख्य आरोपी हीरा कारोबारी नीरव मोदी, उसके मामा मेहुल चोक्सी और PNB के कुछ कर्मचारी थे. फर्जी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (LoUs) के जरिए विदेशी बैंकों से बिना पर्याप्त गारंटी के ऋण लिया गया. घोटाले के उजागर होने के बाद बैंकिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे और LoUs की प्रणाली समाप्त कर बैंकिंग नियमों व निगरानी को और सख्त किया गया.
- शारदा चिट फंड घोटाला (2013) : शारदा चिट फंड घोटाला (2013) पश्चिम बंगाल का एक बड़ा वित्तीय घोटाला था. शारदा ग्रुप ने एक पोंजी स्कीम के जरिए लाखों छोटे निवेशकों को अधिक रिटर्न का लालच देकर उनसे हजारों करोड़ रुपये जुटाए. अप्रैल 2013 में कंपनी के बंद होने के बाद यह घोटाला उजागर हुआ, जब निवेशकों को उनका पैसा वापस नहीं मिला. इस घोटाले से लाखों निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ. मामले में शारदा ग्रुप के चेयरमैन को गिरफ्तार किया गया और कई राजनीतिक विवाद भी सामने आए.
- विजय माल्या और किंगफिशर एयरलाइंस घोटाला (2016) : विजय माल्या और किंगफिशर एयरलाइंस घोटाला भारत के सबसे चर्चित बैंकिंग घोटालों में से एक है. किंगफिशर एयरलाइंस के मालिक विजय माल्या पर आरोप है कि उन्होंने विभिन्न बैंकों से ₹9,000 करोड़ से अधिक का ऋण लिया, लेकिन उसे चुकाया नहीं. साथ ही, उन पर गलत वित्तीय जानकारी देकर लोन हासिल करने और धन के दुरुपयोग का भी आरोप है. मार्च 2016 में कानूनी कार्रवाई शुरू होने से पहले वे यूनाइटेड किंगडम (UK) चले गए. इस मामले ने भारत में कॉर्पोरेट जवाबदेही, बैंकिंग प्रणाली और बड़े ऋण डिफॉल्टरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी.
सुनहरे दिन भी देखे हैं
वर्ष 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों ने भारतीय शेयर बाजार को नई दिशा दी. सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के लिए बाजार खोला, एफडीआई नियमों में ढील दी और बाजार सुधारों को लागू किया. इन कदमों से विदेशी निवेश बढ़ा, निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में ऐतिहासिक तेजी देखने को मिली.
आज़ाद भारत में 1969 का बैंकों का राष्ट्रीयकरण एक अहम आर्थिक फ़ैसला था. देश की बैंकिंग व्यवस्था को आम लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई 1969 को 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया. इस फैसले का मकसद किसानों, छोटे उद्योगों और ग्रामीण क्षेत्रों को बैंकिंग सुविधाओं व ऋण तक बेहतर पहुंच देना था. राष्ट्रीयकरण के बाद देशभर में बैंक शाखाओं का तेजी से विस्तार हुआ और इसे भारत के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों में से एक माना जाता है.
स्टॉक एक्सचेंज क्यों है अर्थव्यवस्था की रीढ़?
स्टॉक एक्सचेंज किसी भी देश की वित्तीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. भारत में BSE और NSE जैसे स्टॉक एक्सचेंज कंपनियों, निवेशकों और सरकार के बीच एक संगठित मंच उपलब्ध कराते हैं. इसके जरिए कंपनियां शेयर जारी कर पूंजी जुटाती हैं, जबकि निवेशकों को शेयर खरीदने और बेचने की सुविधा मिलती है.
स्टॉक एक्सचेंज निवेशकों को बेहतर लिक्विडिटी देता है, जिससे वे जरूरत पड़ने पर अपने निवेश को आसानी से नकदी में बदल सकते हैं. साथ ही, मांग और आपूर्ति के आधार पर शेयरों का पारदर्शी मूल्य तय होता है. शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक देश की आर्थिक स्थिति के संकेतक भी माने जाते हैं. इसके अलावा, सूचीबद्ध कंपनियों और नियामकीय निगरानी के कारण निवेशकों का भरोसा मजबूत होता है और आम लोगों की बचत को उत्पादक निवेश की दिशा मिलती है.
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