New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा 25 पुस्तकों पर लगाए गए प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई करने से शुक्रवार को मना कर दिया। ये किताबें कथित तौर पर “गलत सोच फैलाने” और “आतंकवाद का समर्थन करने” के आरोपों के चलते प्रतिबंधित की गई हैं। कोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ता को संबंधित उच्च न्यायालय का रास्ता अपनाने को कहा है।
यह याचिका कश्मीर के अधिवक्ता शाकिर शब्बीर ने दायर की थी, जिनका पक्ष सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने रखा। याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 98 को भी चुनौती दी गई, जो सरकार को विवादित प्रकाशनों को जब्त करने और तलाशी लेने का अधिकार देती है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(2) और 21 का उल्लंघन करती है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि धारा 98 पूरे देश में लागू है, और यह अत्यधिक व्यापक होने के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा डालती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि इस मामले की जांच संबंधित उच्च न्यायालय में ही होनी चाहिए, क्योंकि इसमें स्थानीय संदर्भ और लेखक भी शामिल हैं।
कोर्ट ने आदेश में कहा, “हम संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध करते हैं कि वे इस मामले के लिए तीन न्यायाधीशों की पीठ बनाएँ और शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित करें। हमने मामले के तथ्य या अधिकारों पर कोई टिप्पणी नहीं की है।”
जम्मू-कश्मीर गृह विभाग की अधिसूचना में कहा गया है कि जांच और खुफिया रिपोर्टों से पता चला है कि इन किताबों का फैलाव युवाओं को कट्टरता की ओर प्रेरित करता है। अधिसूचना में यह भी कहा गया है कि ये पुस्तकें ऐतिहासिक या राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आतंकवादी नायकों और पीड़ित मानसिकता को बढ़ावा देने वाली सामग्री हैं।
प्रतिबंधित किताबों में प्रमुख लेखकों की महत्वपूर्ण रचनाएँ शामिल हैं, जिनमें Azadi (अरुंधति रॉय), The Kashmir Dispute (ए.जी. नूरानी), Colonizing Kashmir (हाफ्सा कंजवाल), Resisting Occupation in Kashmir (हेली डुशिंस्की) और अन्य कई किताबें हैं। ये किताबें पेंग्विन, रूटलेज, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस जैसे प्रमुख प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित की गई हैं।