Ranchi : राजधानी रांची के हरमू स्थित डी.ए.वी. कपिलदेव के सेवानिवृत्त वरिष्ठ अंग्रेजी शिक्षक पी. एन. झा के आवासीय परिसर में बुधवार को प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ वरुण कुमार तिवारी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने उनके साहित्यिक योगदान पर विस्तार से चर्चा की।
संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ महेन्द्र ने की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि डॉ वरुण कुमार तिवारी ने कोसी अंचल के साहित्य को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि अकेले डॉ तिवारी ने इस क्षेत्र के लिए जितना गहन और व्यापक कार्य किया है, वह अपने आप में मिसाल है।
कार्यक्रम में दूरदर्शन रांची के सेवानिवृत्त निदेशक पी. के. झा ने कहा कि डॉ तिवारी की लेखनी में गहराई और स्पष्टता है। उनकी भाषा सरल, प्रभावशाली और विषयों से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि उन्होंने हिंदी आलोचना के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है।
डॉ कृष्णमोहन झा ‘मोहन’ ने कहा कि डा. तिवारी का योगदान केवल साहित्य लेखन तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार में भी अहम भूमिका निभाई है।
राज्य पुस्तकालय, रांची के सेवानिवृत्त पुस्तकालयाध्यक्ष अमरनाथ झा ने कहा कि डा. तिवारी की रचनाओं में संवेदनशीलता, परंपरा और आधुनिकता का सुंदर मेल देखने को मिलता है। उनकी कविताएं और लेख समाज की सच्चाइयों को गहराई से प्रस्तुत करते हैं, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करते हैं।
प्रसिद्ध व्यंग्यकार राजकुमार मिश्र ने कहा कि कोसी अंचल के साहित्य के लिए डा. तिवारी का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनेगा और उन्हें लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
एसबीआई से सेवानिवृत्त अधिकारी, कवि और स्तंभकार बदरीनाथ झा ने कहा कि डा. तिवारी ने कोसी अंचल की कहानी परंपरा का निष्पक्ष और गंभीर मूल्यांकन किया है। विशेष रूप से कहानी विधा में उनका कार्य काफी महत्वपूर्ण है।
‘किसुन संकल्प लोक’ की सचिव सुस्मिता पाठक ने कहा कि डा. तिवारी की पुस्तक ‘किसुन संकल्प लोक’ हिंदी कथा साहित्य के शुरुआती दौर में कोसी अंचल की मजबूत उपस्थिति को सामने लाती है। यह पुस्तक शोध और अध्ययन की दृष्टि से भी काफी उपयोगी है।
समापन सत्र में वरिष्ठ लेखक केदार कानन ने कहा कि डॉ वरुण कुमार तिवारी एक बहुआयामी लेखक हैं। उन्होंने कोसी अंचल की सौ वर्षों की साहित्यिक यात्रा पर शोधपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। इसके अलावा उन्होंने मधुकर गंगाधर, जनार्दन प्रसाद ‘द्विज’ और शालिग्राम जैसे साहित्यकारों पर आधारित पुस्तकों का संपादन भी किया है।
कार्यक्रम के दौरान किरण झा, वंदना झा और पी. एन. झा ने भी अपने विचार साझा किए और डा. तिवारी के साहित्यिक योगदान की सराहना की।
संगोष्ठी के अंत में सभी अतिथियों ने डॉ वरुण कुमार तिवारी के दीर्घायु और निरंतर सृजनशीलता की कामना की तथा ऐसे आयोजनों को साहित्य के विकास के लिए आवश्यक बताया।
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