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    Home»आदिवासी»रांची में आदिवासी महाजुटान: क्या है परिसीमन और झारखंड में कितना बदल सकता है राजनीतिक समीकरण?
    आदिवासी

    रांची में आदिवासी महाजुटान: क्या है परिसीमन और झारखंड में कितना बदल सकता है राजनीतिक समीकरण?

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkAugust 30, 2026No Comments5 Mins Read5
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    झारखंड की राजधानी रांची में आज परिसीमन के मुद्दे पर आदिवासी समाज अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए जुट रहा है. मोरहाबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान के केंद्र में सिर्फ एक रैली नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीति से जुड़ा बड़ा सवाल है, क्या नए परिसीमन के बाद आदिवासियों की राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो जाएगी?

    आदिवासी संगठनों की सबसे बड़ी चिंता विधानसभा और लोकसभा की ST आरक्षित सीटों को लेकर है. झारखंड विधानसभा की 81 सीटों में अभी 28 ST के लिए आरक्षित हैं, जबकि 14 लोकसभा सीटों में 5 सीटें ST के लिए आरक्षित हैं.

    चिंता की बड़ी वजह साल 2007 का पुराना परिसीमन ड्राफ्ट है, जिसमें विधानसभा की ST सीटें 28 से घटकर 22 और लोकसभा की ST सीटें 5 से घटकर 4 होने की स्थिति बनी थी. इसी पुराने प्रस्ताव को आधार बनाकर नए परिसीमन को लेकर आशंकाएं तेज हैं.

    परिसीमन के इस पुराने ड्राफ्ट का राजनीतिक संदर्भ भी महत्वपूर्ण है. साल 2007 में जब झारखंड में ST आरक्षित सीटों को 28 से घटाकर 22 करने का प्रस्ताव सामने आया था, उस समय केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार थी.

    आखिर परिसीमन है क्या?

    आसान भाषा में कहें तो परिसीमन का मतलब चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से तय करना है. इसमें आबादी और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर तय होता है कि कौन सा इलाका किस विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र में आएगा. इस प्रक्रिया में सिर्फ सीटों की सीमा नहीं बदलती, बल्कि उनका आरक्षण भी बदल सकता है. यही झारखंड के आदिवासी समाज की सबसे बड़ी चिंता है.

    2007 के ड्राफ्ट में कुल सीटें नहीं बढ़ीं, ST सीटें 6 कम हो जातीं

    पुराने प्रस्तावित ड्राफ्ट में झारखंड विधानसभा की कुल सीटें 81 ही रखी गई थीं. बदलाव आरक्षित सीटों के ढांचे में था.
    • कुल विधानसभा सीटें: 81 से 81
    • ST आरक्षित सीटें: 28 से 22
    • यानी ST सीटों में कमी: 6
    इसी तरह लोकसभा की कुल 14 सीटें बरकरार थीं, लेकिन ST आरक्षित सीटों की संख्या 5 से घटकर 4 होने की स्थिति सामने आई थी. यानी विवाद सिर्फ सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका का है.

    22 ST सीटों का प्रस्तावित नक्शा

    पुराने ड्राफ्ट में जिन 22 विधानसभा क्षेत्रों को ST के लिए आरक्षित रखने का प्रस्ताव था, उनमें लातेहार, नाला, महेशपुर, दुमका, शिकारीपाड़ा, लोहरदगा, सिसई, गुमला, सिमडेगा, ठेठईटांगर, सिल्ली, तमाड़, खूंटी, रातू, बुड़मू, चक्रधरपुर, मनोहरपुर, जगन्नाथपुर, चाईबासा, सरायकेला, पोटका और बहरागोड़ा शामिल थे.

    इस प्रस्तावित नक्शे में मौजूदा 28 की जगह सिर्फ 22 सीटें ST के लिए आरक्षित रह जातीं. परिसीमन में केवल सीटों का आरक्षण नहीं बदलता. कई विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं बदलती हैं, कुछ सीटों का नाम बदलता है और कई इलाकों को मिलाकर नए निर्वाचन क्षेत्र बनते हैं.

    इसलिए किसी मौजूदा सीट के बारे में सीधे यह कहना कि उसका आरक्षण खत्म हो जाता, हर मामले में सही नहीं होगा. लेकिन प्रस्तावित नक्शे में कई आदिवासी राजनीतिक गढ़ों का स्वरूप जरूर बदल जाता. यानी लड़ाई सिर्फ 28 बनाम 22 सीटों की नहीं, बल्कि झारखंड में आदिवासी राजनीति के पूरे भूगोल की है.

    विधानसभा सीटें बढ़ेंगी या नहीं?

    यही सबसे बड़ा सवाल है. झारखंड में अभी 81 विधानसभा सीटें हैं. नए परिसीमन के बाद सीटों की संख्या बढ़ेगी या नहीं और कितनी बढ़ेगी, इस पर अभी कोई अंतिम आधिकारिक फैसला नहीं है. हालांकि, 81 से 100, 122 या 125 सीटें होने जैसी चर्चाएं जरूर हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 2007 के पुराने परिसीमन ड्राफ्ट में विधानसभा सीटों की संख्या 81 ही रखी गई थी.

    महाजुटान का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है. क्या सीटें बढ़ीं तो आदिवासी प्रतिनिधित्व बढ़ेगा. कुल विधानसभा सीटें बढ़ने का मतलब यह नहीं कि ST आरक्षित सीटें भी उसी अनुपात में बढ़ेंगी.

    आदिवासी संगठनों का तर्क है कि अगर विधानसभा की कुल सीटें बढ़ती हैं, तो ST आरक्षित सीटों में भी अनुपातिक बढ़ोतरी होनी चाहिए. अगर कुल सीटें बढ़ जाएं लेकिन ST सीटें 28 पर ही रहें या कम हो जाएं, तो प्रतिशत के हिसाब से आदिवासी समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी और घट सकती है.

    लोकसभा में भी प्रतिनिधित्व घटने की आशंका

    झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में अभी 5 सीटें ST के लिए आरक्षित हैं. पुराने प्रस्तावित परिसीमन में कुल सीटों की संख्या तो 14 ही थी, लेकिन ST प्रतिनिधित्व घटकर 4 होने की स्थिति सामने आई थी.

    प्रस्तावित संसदीय नक्शे में दुमका, लोहरदगा, खूंटी और सिंहभूम ST क्षेत्र के रूप में रखे गए थे. इसी बदलाव ने आदिवासी संगठनों की चिंता बढ़ाई थी कि नए राजनीतिक नक्शे में लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है.

    रांची, संथाल और कोल्हान तक बदल सकता है समीकरण

    पुराने प्रस्तावित परिसीमन में झारखंड के कई बड़े राजनीतिक क्षेत्रों का चुनावी नक्शा बदलने का प्रस्ताव था.

    रांची संसदीय क्षेत्र में पतरातु, रामगढ़, मांडू, रांची दक्षिण, रांची केंद्रीय और कांके को शामिल करने का प्रस्ताव था.

    खूंटी ST लोकसभा क्षेत्र में सिल्ली, तमाड़, खूंटी, रातू, बुड़मू और चक्रधरपुर को शामिल करने की बात थी. वहीं सिंहभूम ST क्षेत्र में मनोहरपुर, जगन्नाथपुर, चाईबासा, सरायकेला, आदित्यपुर और चांडिल को जोड़ा गया था.

    यानी परिसीमन का असर सिर्फ सीटों पर नहीं पड़ता. इससे राजनीतिक दलों का वोट बैंक, उम्मीदवारों का चयन और चुनावी रणनीति का पूरा गणित बदल सकता है.

    JMM के लिए क्यों बड़ा मुद्दा? BJP और दूसरे दलों का भी बदलेगा गणित

    आदिवासी पहचान, जल-जंगल-जमीन और राजनीतिक अधिकार लंबे समय से JMM की राजनीति के केंद्र में रहे हैं. ऐसे में अगर भविष्य के परिसीमन में ST आरक्षित सीटें कम होती हैं, तो यह JMM और आदिवासी संगठनों के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है.

    परिसीमन का असर केवल आदिवासी संगठनों या JMM तक सीमित नहीं रहेगा. सीटों की सीमाएं बदलने या नई सीटें बनने पर BJP, कांग्रेस और दूसरे क्षेत्रीय दलों को भी अपनी रणनीति बदलनी होगी.

    रांची, जमशेदपुर, धनबाद और बोकारो जैसे शहरी इलाकों में नए चुनावी समीकरण उभर सकते हैं. वहीं आदिवासी बहुल क्षेत्रों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व बचाए रखने का सवाल और तेज हो सकता है.

    Also Read : झारखंड: परिसीमन के सवाल पर एकजुट होगा आदिवासी समाज, रांची में कल महाजुटान रैली

    आदिवासी झारखंड परिसीमन
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