भारत में बड़े उद्योगों और कॉरपोरेट कंपनियों की सफलता अक्सर सुर्खियां बनती है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था की असली ताकत का एक बड़ा हिस्सा उन लाखों छोटे कारोबारों में छिपा है, जो शहरों से लेकर कस्बों और गांवों तक लोगों को रोजगार और आय का जरिया उपलब्ध कराते हैं. कोई छोटी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चला रहा है, कोई पारंपरिक कारीगरी को कारोबार में बदल रहा है तो कोई सीमित पूंजी से सर्विस सेक्टर में अपनी पहचान बना रहा है.
इन्हीं छोटे उद्योगों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी MSMEs की भूमिका को पहचान देने के लिए हर साल 30 अगस्त को राष्ट्रीय लघु उद्योग दिवस मनाया जाता है. साल 2025 में भी यह दिवस देश के आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और समावेशी विकास में राष्ट्रीय लघु उद्योग और MSMEs के योगदान को रेखांकित करने का अवसर है.
कैसे हुई National Small Industry Day की शुरुआत?
National Small Industry Day यानी राष्ट्रीय लघु उद्योग दिवस की कहानी साल 2000 से जुड़ी है. 30 अगस्त 2000 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एसएसआई पर पहले राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान लघु उद्योगों के लिए एक व्यापक नीति पैकेज की घोषणा की थी.
इसी पहल की याद में भारत सरकार ने 30 अगस्त को राष्ट्रीय लघु उद्योग दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया. इसका पहला आधिकारिक आयोजन 30 अगस्त 2001 को हुआ. तब से हर साल यह दिन देश के छोटे उद्योगों की उपलब्धियों, उनकी आर्थिक भूमिका और उनके सामने मौजूद चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देता है.
दिलचस्प बात यह है कि वैश्विक स्तर पर भी MSMEs को विशेष महत्व दिया जाता है. संयुक्त राष्ट्र हर साल 27 जून को MSME Day मनाता है. UN के मुताबिक दुनिया के करीब 90% कारोबार MSMEs से जुड़े हैं, जो वैश्विक स्तर पर लगभग 60-70% रोजगार और करीब 50 फीसदी GDP में योगदान करते हैं.
छोटा उद्योग, लेकिन अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान
भारत में MSME सेक्टर को अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है. पिछले पांच दशकों में यह क्षेत्र कृषि के बाद रोजगार देने वाले सबसे बड़े क्षेत्रों में शामिल हो चुका है. इसके आंकड़े इसकी अहमियत को साफ करते हैं. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक MSMEs का भारत के GDP में योगदान 30.1% है. वहीं वित्त वर्ष 2023-24 में देश के कुल निर्यात में MSME क्षेत्र की हिस्सेदारी 45.73% रही.
यानी देश के आर्थिक विकास में छोटे और मध्यम कारोबारों की भूमिका सिर्फ घरेलू बाजार तक सीमित नहीं है. इनके उत्पाद और सेवाएं वैश्विक बाजार में भी भारत की मौजूदगी मजबूत कर रहे हैं.
देश में कहां सबसे ज्यादा MSMEs?
भारत में MSMEs का वितरण भी काफी व्यापक है, लेकिन कुछ राज्य छोटे उद्योगों के बड़े केंद्र बनकर उभरे हैं. महाराष्ट्र देश में MSMEs की सबसे बड़ी हिस्सेदारी के साथ पहले स्थान पर है. यहां कुल MSMEs में लगभग 17.55% हिस्सेदारी है. इसके बाद तमिलनाडु में 10.28% से अधिक और उत्तर प्रदेश में करीब 9% MSMEs हैं.
इन राज्यों में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े औद्योगिक क्लस्टर विकसित हुए हैं, जहां छोटे उद्योग स्थानीय संसाधनों, कौशल और बाजार की जरूरतों के आधार पर कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं.
MSME की नई परिभाषा ने बढ़ाया दायरा
भारत में MSMEs को मुख्य रूप से निवेश और सालाना टर्नओवर के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है.

1. Micro Enterprise के लिए निवेश की सीमा 2.5 करोड़ रुपये तक और टर्नओवर 10 करोड़ रुपये तक है.
2. Small Enterprise के लिए निवेश की सीमा 25 करोड़ रुपये तक और टर्नओवर 100 करोड़ रुपये तक है.
3. Medium Enterprise के लिए निवेश की सीमा 125 करोड़ रुपये तक और टर्नओवर 500 करोड़ रुपये तक है.
इस बदलाव ने कई ऐसे कारोबारों को भी MSME दायरे में आने का अवसर दिया है, जो कारोबार बढ़ने के साथ पहले की श्रेणियों से बाहर हो जाते थे.
Udyam Registration ने बदली पंजीकरण की तस्वीर
छोटे उद्योगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में उद्यम रजिस्ट्रेशन पोर्टल एक महत्वपूर्ण पहल है. इसे 2020 में लॉन्च किया गया था. इस पोर्टल के जरिए एमएसएमई को पेपरलेस और सेल्फ-डिक्लेरेशन बेस्ड रजिस्ट्रेशन की सुविधा मिलती है. इससे छोटे कारोबारियों के लिए सरकारी योजनाएं और औपचारिक वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच आसान बनाने की कोशिश की गई है. जुलाई 2025 तक उद्यम रजिस्ट्रेशन पोर्टल और उद्यम असिस्ट के माध्यम से 6.56 करोड़ से अधिक MSMEs पंजीकृत हो चुके थे. यह संख्या बताती है कि देश में छोटे कारोबार का औपचारिक आर्थिक तंत्र कितना बड़ा हो चुका है.
गांव के हुनर को बाजार से जोड़ रहा PM Vishwakarma
भारत के छोटे उद्योगों की एक खासियत पारंपरिक कारीगरी भी है. देश के लाखों कारीगर पीढ़ियों से अपने हुनर के जरिए परिवार चलाते आए हैं. सरकार ने इन्हें आधुनिक बाजार और वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना शुरू की. यह योजना 17 सितंबर 2023 को लॉन्च हुई थी और 2023-24 से 2027-28 तक इसके लिए 13,000 करोड़ रुपये का प्रारंभिक प्रावधान किया गया है. योजना के तहत 18 पारंपरिक ट्रेड से जुड़े कारीगरों को स्किल ट्रेनिंग, आधुनिक औजार और क्रेडिट सपोर्ट देने का लक्ष्य है.
जुलाई 2025 तक इस योजना के तहत 2.71 करोड़ से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे. इनमें से 1.68 करोड़ कारीगर Stage-1 verification में सफल हुए, जबकि मल्टी लेयर वेरिफिकेशन के बाद करीब 30 लाख कारीगर पंजीकृत किए जा चुके थे. यानी यह योजना केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक हुनर को आधुनिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश भी है.
बिना गारंटी लोन की राह आसान करने की कोशिश
छोटे कारोबार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है पूंजी की उपलब्धता. खासकर उन उद्यमियों के लिए, जिनके पास बैंक से कर्ज लेने के लिए पर्याप्त collateral नहीं होता. इसी समस्या को दूर करने के उद्देश्य से Credit Guarantee Fund Trust for Micro and Small Enterprises यानी CGTMSE की शुरुआत की गई थी. इसे भारत सरकार के MSME मंत्रालय और SIDBI की साझेदारी में स्थापित किया गया.
इसका उद्देश्य सूक्ष्म और लघु उद्यमों को संपार्श्विक-मुक्त ऋण( collateral-free credit) उपलब्ध कराने में मदद करना है. साइंटिफिक एन्हांस्ड क्रेडिट गारंटी व्यवस्था के तहत सूक्ष्म उद्यमों के 5 लाख रुपये तक के ऋण पर 85% तक गारंटी कवरेज का प्रावधान है. 5 लाख से 1 करोड़ रुपये तक के अन्य एमएसई लोन पर 75% और 1 से 5 करोड़ रुपये तक के ऋण पर 50% तक कवरेज दिया जाता है. इस तरह छोटे उद्यमियों के लिए बैंकिंग व्यवस्था तक पहुंचने का रास्ता आसान बनाने की कोशिश की जाती है.
PMEGP से रोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा
छोटे उद्योगों के जरिए रोजगार पैदा करने के लिए प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम यानी PMEGP भी एक महत्वपूर्ण योजना है. 2008 में शुरू हुई यह क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी स्कीम नए माइक्रो एंटरप्राइजेज स्थापित करने में मदद करती है. इसे राष्ट्रीय स्तर पर खादी और ग्रामोद्योग आयोग यानी KVIC लागू करता है, जबकि राज्यों और जिलों में KVIC निदेशालय, KVIB और जिला उद्योग केंद्र इसके क्रियान्वयन से जुड़े हैं.
2025 की पीएमईजीपी गाइडलाइंस के तहत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अधिकतम स्वीकार्य प्रोजेक्ट कॉस्ट बढ़कर 50 लाख रुपये और सर्विस सेक्टर में 20 लाख रुपये कर दी गई है. इससे छोटे स्तर पर अपना उद्योग शुरू करने वाले युवाओं और उद्यमियों के लिए व्यापार खड़ा करने की परियोजनाएं बढ़ सकती हैं.
Budget 2025-26 में MSMEs के लिए कितना प्रावधान?
छोटे उद्योगों की भूमिका को देखते हुए केंद्र सरकार ने भी MSME सेक्टर के लिए बजटीय समर्थन जारी रखा है. यूनियन बजट 2025-26 में MSMEs के लिए 23,168 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. यह राशि वित्तीय सहायता, उद्यमिता, कौशल विकास और छोटे उद्योगों से जुड़ी विभिन्न सरकारी पहलों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
छोटे उद्योगों के सामने बड़ी चुनौतियां
आंकड़ों की चमक के पीछे छोटे कारोबारियों का संघर्ष भी है. सीमित पूंजी, कर्ज तक पहुंच, कच्चे माल की कीमत, तकनीक में बदलाव, स्किल्ड मैनपावर की कमी और बड़े कारोबारों से प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां छोटे उद्योगों के सामने बनी रहती हैं.
इसके अलावा बाजार तक पहुंच भी एक बड़ी चुनौती है. किसी गांव या छोटे शहर में बेहतर उत्पाद तैयार करने वाला कारोबारी जरूरी नहीं कि बड़े बाजार तक आसानी से पहुंच सके. हालांकि डिजिटल प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स और बेहतर लॉजिस्टिक्स ने इस तस्वीर को काफी हद तक बदलना शुरू कर दिया है. अब एक छोटा कारोबारी भी अपने स्थानीय बाजार से बाहर निकलकर देश और दुनिया के ग्राहकों तक पहुंच सकता है.
‘छोटा’ नाम में है, असर में नहीं
राष्ट्रीय लघु उद्योग दिवस का असली महत्व इसी बात में है कि यह हमें अर्थव्यवस्था की उस परत की याद दिलाता है, जो अक्सर बड़ी कंपनियों की चमक के पीछे छिप जाती है. एक छोटी फैक्ट्री कुछ दर्जन लोगों को रोजगार दे सकती है. एक महिला घर से कारोबार शुरू कर कई अन्य महिलाओं को जोड़ सकती है. एक कारीगर अपनी पारंपरिक कला को बाजार से जोड़कर अगली पीढ़ी के लिए रोजगार का रास्ता बना सकता है. यानी एक छोटे उद्योग का असर सिर्फ उसके मालिक की कमाई तक सीमित नहीं रहता. उसके साथ कर्मचारी, सप्लायर, परिवहन से जुड़े लोग, स्थानीय बाजार और कई परिवार जुड़ जाते हैं.
भारत के लिए अगली चुनौती सिर्फ ज्यादा MSMEs बनाना नहीं, बल्कि मौजूदा छोटे उद्योगों को छोटे से बड़े कारोबार में बदलना है. इसके लिए आसान और सस्ता कर्ज, आधुनिक तकनीक, कुशल कार्यबल, बेहतर बुनियादी ढांचा, डिजिटल पहुंच और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक आसानी से पहुंच जरूरी है. अगर छोटे उद्योगों को सही नीतिगत और वित्तीय सहायता मिलती है, तो वे रोजगार पैदा करने के साथ-साथ भारत को वैश्विक विनिर्माण और सप्लाई-चेन नेटवर्क में और मजबूत स्थान दिला सकते हैं.
MSME मंत्रालय की कमान
देश में MSME सेक्टर से जुड़ी संस्थाओं और योजनाओं की जिम्मेदारी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के पास है. वर्तमान में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी इस मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. वे बिहार के गए लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं. वहीं राज्य मंत्री सुश्री शोभा करंदलाजे भी मंत्रालय में अहम भूमिका निभा रही हैं. वह कर्नाटक के बेंगलुरु उत्तर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं.
Also Read : जोहार लाइव एक्सक्लूसिव : यूपी की तरह झारखंड में जेपीएससी घोटाले के लिए तैयार हुआ था सॉफ्टवेयर


