जून 2026 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारत में भयंकर आर्थिक सुनामी आने की चेतावनी दी थी, जिसके ठीक तीन महीने बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक स्तर पर ऊर्जा, खाद्य, खाद और वित्त संकट के एक साथ गहराने की बात कही है. इस समय पूरी दुनिया की सबसे बड़ी चिंता सप्लाई चेन को लेकर है, क्योंकि युद्ध और व्यापारिक मार्गों में रुकावट के कारण अनाज, खाद और ईंधन की आवाजाही प्रभावित हो रही है, जिसका सीधा असर उत्पादन लागत और आम आदमी की रसोई तक पहुँचने वाली कीमतों पर पड़ रहा है.
नेताओं के वे बयान, जिन्होंने बढ़ाई चिंता
इस पूरे आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो राहुल गांधी ने जून 2026 में चेतावनी देते हुए कहा था, “जो हिंदुस्तान का प्रोटेक्शन का सिस्टम था, जो एक प्रकार से इंटरनेशनल इकॉनोमी से शॉक ऑब्जर्वर था, उसको बीजेपी ने हटा दिया है… ऐसी इकॉनोमिक क्राइसिस आ रही है हिंदुस्तान में जो आपने अपने जीवन में नहीं देखी होगी. जो हो रहा है, उसे अब कोई रोक नहीं सकता.”
इसके ठीक तीन महीने बाद सितंबर 2026 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक मंच पर स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा, “जब फूड की बात आती है, तो हम एक ऐसी स्थिति देख रहे हैं, जहां कुछ बड़े ग्रेन निर्यातक अपने शिपमेंट नहीं भेज पाएंगे, खासकर काले सागर (ब्लैक सी) से. हम पहले ही खाद की कमी देख रहे हैं क्योंकि इसके उत्पादक रूस और मिडिल ईस्ट हैं… शायद आने वाले महीनों में हम एक बड़े फूड क्राइसिस की ओर बढ़ रहे हैं.” उन्होंने ऊर्जा, वित्त और वैश्विक निर्णयों के प्रभावों पर भी गहरी चिंता जताई.
राहुल गांधी जिस ‘शॉक ऑब्जर्वर’ की बात कर रहे थे, वह आयात शुल्क, सब्सिडी और आवश्यक वस्तु नियंत्रण जैसे वे नीतिगत सुरक्षा उपाय हैं, जो वैश्विक आर्थिक संकटों और महंगाई के झटकों को सीधे आम जनता तक पहुँचने से रोकते हैं. उनके अनुसार, इन्हें हटाने से भारत पर भारी आर्थिक सुनामी का खतरा मंडरा रहा है.
संकट खेत से लेकर बाजार तक
रूस और यूक्रेन दुनिया के प्रमुख अनाज निर्यातक हैं, लेकिन ब्लैक सी के बंदरगाहों पर हमलों और सुरक्षा जोखिमों के कारण अनाज का निर्यात बाधित हुआ है, जिससे वैश्विक बाजार में गेहूं और अन्य अनाजों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. संयुक्त राष्ट्र की संस्था एफएओ के अनुसार अगस्त में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक में तेजी दर्ज की गई है.
रूस और पश्चिम एशिया (मीडिल ईस्ट) में जारी संघर्ष का असर खाद और ईंधन के उत्पादन व परिवहन पर भी पड़ रहा है, और इसके ऊपर संभावित सुपर अल नीनो का खतरा भविष्य में फसल उत्पादन को और अधिक प्रभावित कर सकता है. संकट की यह पूरी चेन युद्ध और संघर्ष से शुरू होकर समुद्री मार्गों के बाधित होने, खाद-अनाज की सप्लाई में बाधा आने, परिवहन व ऊर्जा के महंगे होने, उत्पादन लागत के बढ़ने और अंततः थोक व खुदरा बाजार में महंगाई का झटका देने के रूप में काम करती है.
भारत में इसका क्या असर दिख रहा है?
अंतरराष्ट्रीय बाजार के इन झटकों का असर अब धीरे-धीरे घरेलू बाजार और आम आदमी की जेब पर भी साफ दिखाई देने लगा है. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के मुताबिक, अगस्त में भारत की थोक महंगाई दर 9.92% दर्ज की गई, जिसमें ईंधन और बिजली की कीमतों में 22.93% और पेट्रोलियम-प्राकृतिक गैस में 34.41% की भारी बढ़ोतरी शामिल है. इसके अलावा खुदरा बाजार में भी खाद्य महंगाई का दबाव बढ़ने लगा है, जिससे रसोई का बजट गड़बड़ाने लगा है.
कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी की जून वाली आर्थिक सुनामी की चेतावनी को, विदेश मंत्री एस. जयशंकर के सितंबर के बयानों और देश में लगातार बढ़ रही महंगाई के आंकड़ों के साथ जोड़कर केंद्र सरकार पर लगातार हमलावर बनी हुई है. निष्कर्ष यह है कि यह संकट केवल एक देश या एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि भू-राजनीतिक तनाव और जलवायु जोखिमों से जुड़ी एक बड़ी वैश्विक चुनौती है, जिसका सीधा असर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है.

