कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए बढ़ाए गए आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया है. अदालत ने कहा कि कुल आरक्षण को 50 प्रतिशत की सीमा से आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त संवैधानिक आधार होना जरूरी है. साथ ही, राज्य सरकार ने आरक्षण बढ़ाने से पहले राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से आवश्यक परामर्श नहीं किया था.
मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति के. एस. हेमलेखा की खंडपीठ ने 12 अक्टूबर को यह फैसला सुनाया. जिसमें अदालत ने कर्नाटक एसटी व एससी (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों तथा राज्य सेवाओं में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण) अधिनियम, 2022 की संबंधित धाराओं को असंवैधानिक ठहराया.
इस फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भाजपा पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों की आकांक्षाओं के लिए यह बड़ा झटका है. उन्होंने सवाल उठाया कि तत्कालीन भाजपा सरकार ने 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण तो बढ़ाया, लेकिन उसकी संवैधानिक वैधता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए.
क्या है पूरा मामला?
कर्नाटक में पहले अनुसूचित जाति के लिए 15 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के लिए 3 प्रतिशत आरक्षण था. अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 32 प्रतिशत आरक्षण लागू था. इस तरह राज्य में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत था.
न्यायमूर्ति नागमोहन दास की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के आधार पर SC का आरक्षण 15 से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और ST का आरक्षण 3 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत करने का प्रस्ताव आया. इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 2022 में कानून बनाया. राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह कानून जनवरी 2023 में राजपत्र में प्रकाशित हुआ और इसे 1 नवंबर 2022 से प्रभावी माना गया.
आरक्षण में इस वृद्धि के बाद SC, ST और OBC का कुल आरक्षण 56 प्रतिशत हो गया. यहीं से कानूनी विवाद शुरू हुआ. याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन है और इससे संविधान में दिए गए समानता तथा सरकारी नौकरियों में समान अवसर के अधिकार प्रभावित होते हैं.
इस कानून को चुनौती देने वाली दो याचिकाएं हाईकोर्ट के सामने थीं. एक याचिका महेंद्र कुमार मित्रा ने दायर की थी, जो डॉ. आंबेडकर अनुसूचित जाति महासंघ के राज्य अध्यक्ष हैं. दूसरी याचिका सागर एच. आर., प्रज्वल कुमार डी. और पुरुषोत्तम गौड़ा जी. एम. ने दायर की थी. ये सिविल इंजीनियर हैं और बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका (BBMP) में सहायक अभियंता के पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन कर चुके थे.
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि कानून के जरिए आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 56 प्रतिशत करना संवैधानिक समानता के प्रावधानों के विपरीत है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि आरक्षण बढ़ाने से पहले राष्ट्रीय SC और ST आयोगों से आवश्यक परामर्श नहीं किया गया.
सिद्धारमैया ने उठाये सवाल
फैसले के बाद सिद्धारमैया ने कहा कि न्यायपालिका का सम्मान करते हुए भी भाजपा सरकार की सामाजिक न्याय संबंधी नीति पर सवाल उठाना जरूरी है. उन्होंने पूछा कि जब कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ऊपर जा रहा था, तब सरकार ने कानून की संवैधानिक वैधता सुनिश्चित करने के लिए पहले से तैयारी क्यों नहीं की. उन्होंने कहा कि नागमोहन दास समिति की सिफारिशों का आधार कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में तैयार हुआ था. आरक्षण बढ़ाने की मांग दशकों के सामाजिक संघर्ष से निकली थी, न कि किसी राजनीतिक दल की उदारता से.
सिद्धारमैया ने आरक्षण को ऐतिहासिक अन्याय दूर करने और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का संवैधानिक माध्यम बताया. उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय को चुनाव के समय की घोषणाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता. इसके लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता और स्थायी संस्थागत सुधार जरूरी हैं.
सिद्धारमैया ने केंद्र सरकार से आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा की समीक्षा करने और आबादी को ध्यान में रखते हुए संवैधानिक रूप से टिकाऊ व्यवस्था बनाने की मांग की. उन्होंने कर्नाटक के बढ़े हुए आरक्षण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने के प्रस्ताव पर भी दोबारा विचार करने को कहा.
उन्होंने कर्नाटक सरकार से भी उचित कानूनी उपाय अपनाने की अपील की, ताकि बढ़े हुए आरक्षण से जुड़े विवाद के बीच विद्यार्थियों और सरकारी नौकरी के अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा की जा सके.
सिद्धारमैया ने कहा कि सामाजिक और आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा है. उनका कहना है कि लक्ष्य केवल प्रतिनिधित्व का वादा करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सुनिश्चित करना होना चाहिए.
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