जोहार लाइव ब्यूरो
पलामू के पूर्व सांसद ब्रजमोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल नियुक्त किया गया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 12 अक्टूबर 2026 को छह राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति और फेरबदल की घोषणा की. इसके तहत ब्रजमोहन राम को ओडिशा की जिम्मेदारी सौंपी गई है. वह हरि बाबू कंभमपति का स्थान लेंगे. उनकी नियुक्ति पदभार ग्रहण करने की तारीख से प्रभावी होगी.
ब्रजमोहन राम की नियुक्ति से उनके परिवार और समर्थकों में खुशी है. परिवार के मुताबिक, उनका राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. तीन बार लोकसभा सांसद बनने के बाद भी उन्हें लंबे समय तक पार्टी में अलग-अलग भूमिकाओं में काम करना पड़ा. उनके भतीजे शेखर सुमन ने वर्ष 2004 से 2026 तक के 22 वर्षों को उनके राजनीतिक जीवन में संघर्ष का दौर बताया है. उनके अनुसार, इस दौरान ब्रजमोहन राम ने भाजपा नहीं छोड़ी और संगठन में एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह काम करते रहे.
जोहार लाइव से बातचीत में शेखर सुमन ने ब्रजमोहन राम के राजनीतिक सफर के कई पहलुओं को साझा किया. उन्होंने बताया कि ब्रजमोहन राम जनसंघ के दौर से ही भाजपा से जुड़े रहे हैं. राजनीतिक जीवन में कई ऐसे मौके आए, जब उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिला, लेकिन उन्होंने पार्टी से दूरी नहीं बनाई. शेखर सुमन के मुताबिक, ब्रजमोहन राम ने पार्टी की ओर से मिलने वाली जिम्मेदारियां निभाईं और संगठन के लिए काम करते रहे.
साल 1991 में लातेहार से विधायक बने, फिर लगातार तीन बार सांसद
ब्रजमोहन राम का जन्म 1 जनवरी 1958 को तत्कालीन बिहार के पलामू जिले के चंदवा में हुआ था. यह इलाका अब झारखंड के लातेहार जिले में है. उन्होंने लोहरदगा स्थित बीएस कॉलेज से पढ़ाई की. उनका विवाह लीला देवी से हुआ है और उनके तीन बेटे हैं.
ब्रजमोहन राम ने 1991 में भाजपा के टिकट पर अविभाजित बिहार की लातेहार विधानसभा सीट से चुनाव जीता. वह 1995 तक बिहार विधानसभा के सदस्य रहे. इसके बाद भाजपा ने उन्हें पलामू लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया. वर्ष 1996 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव जीता. इसके बाद 1998 और 1999 में भी जीत दर्ज की. इस तरह वह लगातार तीन बार पलामू से सांसद चुने गए.
चुनावी सफर में जीत का अंतर
- साल 1991, लातेहार विधानसभा चुनाव: ब्रजमोहन राम को 68,000 वोट मिले. उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 28,131 वोटों से हराया.
- साल 1996, पलामू लोकसभा चुनाव: भाजपा के ब्रजमोहन राम को 2,06,419 वोट मिले. उन्होंने जनता दल के उदय नारायण चौधरी को 54,415 वोटों से हराया.
- साल 1998, पलामू लोकसभा चुनाव: ब्रजमोहन राम को 3,17,513 वोट मिले. उन्होंने राजद के उदय नारायण चौधरी को 80,827 वोटों से हराया.
- साल 1999, पलामू लोकसभा चुनाव: उन्हें 2,71,657 वोट मिले. उन्होंने राजद के जोरावर राम को 85,125 वोटों से हराया.
लगातार तीन लोकसभा चुनावों में जीत के साथ ब्रजमोहन राम भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए. उन्होंने संगठन में भी जिम्मेदारियां निभाईं. लोकसभा की जीवनी संबंधी जानकारी के अनुसार, वह 1996 से 1998 तक वनांचल प्रदेश भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के अध्यक्ष रहे. वह संसदीय समितियों से भी जुड़े रहे.
2004 की हार को पत्रकार ने बताया चुनावी प्रबंधन की नाकामी
लगातार तीन बार पलामू से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद 2004 में ब्रजमोहन राम को हार का सामना करना पड़ा. राजद के मनोज कुमार ने उन्हें 55,144 वोटों से हराया. मनोज कुमार को 2,06,733 वोट मिले, जबकि ब्रजमोहन राम को 1,51,589 वोट प्राप्त हुए.
पलामू के स्थानीय पत्रकार सतीश मिश्रा के मुताबिक, 2004 की हार को ब्रजमोहन राम की व्यक्तिगत हार के बजाय चुनावी प्रबंधन की विफलता के रूप में देखना चाहिए. उनके अनुसार, भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर ‘इंडिया शाइनिंग’ अभियान चला रही थी, लेकिन उसका संदेश जमीनी स्तर तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच सका.
सतीश मिश्रा का कहना है कि उस चुनाव में कई कारण एक साथ काम कर रहे थे. अटल बिहारी वाजपेयी की अस्वस्थता और राष्ट्रीय नेतृत्व से जुड़े हालात के साथ-साथ चुनावी अभियान तथा स्थानीय स्तर पर उसके क्रियान्वयन को भी समझने की जरूरत है. उनके आकलन में पार्टी राष्ट्रीय स्तर के प्रचार को स्थानीय मतदाताओं तक प्रभावी तरीके से पहुंचाने में सफल नहीं रही.
हालांकि, चुनावी आंकड़े हार का अंतर बताते हैं, लेकिन किसी एक कारण को हार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराते. पलामू में ‘इंडिया शाइनिंग’ अभियान का वास्तविक प्रभाव और स्थानीय चुनावी प्रबंधन की भूमिका सतीश मिश्रा का आकलन है.
2007 के उपचुनाव में भाजपा तीसरे स्थान पर रही
साल 2004 के बाद पलामू लोकसभा सीट पर 2007 में उपचुनाव हुआ. इस चुनाव में ब्रजमोहन राम उम्मीदवार नहीं थे. राजद के घूरन राम ने जीत दर्ज की. उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के कामेश्वर बैठा को 22,327 वोटों से हराया. भाजपा के जवाहर पासवान तीसरे स्थान पर रहे.
इस उपचुनाव का उल्लेख ब्रजमोहन राम के राजनीतिक सफर के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह 2004 की हार के बाद पलामू में हुए चुनावी बदलाव को दिखाता है. हालांकि, इस परिणाम को ब्रजमोहन राम की व्यक्तिगत लोकप्रियता का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि भाजपा ने इस चुनाव में दूसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारा था.
2009 में निर्दलीय लड़े, 2014 में भाजपा ने नहीं दिया टिकट
वर्ष 2009 में भाजपा और जदयू के बीच सीटों के बंटवारे में पलामू लोकसभा सीट जदयू के हिस्से में चली गई. इसके बाद ब्रजमोहन राम निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरे. इस चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा के कामेश्वर बैठा ने जीत दर्ज की, जबकि राजद के घूरन राम दूसरे स्थान पर रहे.
वर्ष 2009 में निर्दलीय चुनाव लड़ने के बावजूद ब्रजमोहन राम भाजपा से जुड़े रहे. वर्ष 2014 में पलामू लोकसभा सीट से भाजपा के टिकट के लिए उनका नाम चर्चा में था, लेकिन पार्टी ने पूर्व पुलिस अधिकारी विष्णु दयाल राम को उम्मीदवार बनाया. विष्णु दयाल राम ने चुनाव जीत लिया.
ब्रजमोहन राम ने 2014 में लातेहार विधानसभा सीट से भी भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली. उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार, उन्हें 44,402 वोट मिले. झारखंड विकास मोर्चा के प्रकाश राम ने 71,189 वोट हासिल कर उन्हें 26,787 वोटों से हराया.
हालांकि, साल 2019 और 2024 में भी भाजपा की ओर से टिकट नहीं मिली. 2014 के बाद से चुनावी राजनीति के लिए अब वे अप्रसांगिक हो गए थे. भले ही वह समर्पित कार्यकर्ता रहे हो.
शेखर सुमन के मुताबिक, टिकट नहीं मिलने के बावजूद ब्रजमोहन राम भाजपा से जुड़े रहे. उन्होंने संगठन के लिए काम किया और पार्टी की ओर से मिलने वाली जिम्मेदारियां निभाईं. परिवार का कहना है कि इस दौरान दूसरी पार्टियों की ओर से भी उन्हें प्रस्ताव मिले, लेकिन उन्होंने भाजपा नहीं छोड़ी.
पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान देने का संदेश
पलामू के स्थानीय पत्रकार सतीश मिश्रा के मुताबिक, ब्रजमोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल बनाया जाना भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं के लिए एक संदेश भी है. उनका मानना है कि पार्टी अपने पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को लंबे समय बाद भी नहीं भूलती.
मिश्रा के अनुसार, ब्रजमोहन राम तीन बार सांसद रहे, लेकिन 2004 के बाद उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिला. 2009 में उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और 2014 में भाजपा ने पलामू से विष्णु दयाल राम को उम्मीदवार बनाया. इसके बावजूद ब्रजमोहन राम पार्टी से जुड़े रहे और संगठन में काम करते रहे.
सतीश मिश्रा का मानना है कि उनकी राज्यपाल पद पर नियुक्ति को लंबे समय तक पार्टी के साथ जुड़े रहने वाले नेताओं को सम्मान देने के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है. हालांकि, भाजपा ने नियुक्ति के पीछे पुराने कार्यकर्ताओं को संदेश देने को आधिकारिक कारण बताया है या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हुई है.
परिवार में खुशी, भतीजे ने जताया आभार
ब्रजमोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल नियुक्त किए जाने की खबर के बाद परिवार में खुशी का माहौल है. शेखर सुमन ने बताया कि रिश्तेदार और परिचित उन्हें बधाई देने पहुंच रहे हैं. उन्होंने इस नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रति आभार जताया.
परिवार के मुताबिक, ब्रजमोहन राम की पत्नी लीला देवी हैं और उनके तीन बेटे अनिल कुमार, सुनील कुमार और अमित कुमार हैं. शेखर सुमन ने बताया कि उनके बड़े बेटे अनिल कुमार भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा में मीडिया प्रभारी हैं, जबकि अमित कुमार गैस एजेंसी चलाते हैं.
शेखर सुमन ने कहा कि परिवार के लिए यह गर्व का क्षण है. उनके मुताबिक, ब्रजमोहन राम ने लंबे समय तक भाजपा में काम किया और राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद पार्टी से जुड़े रहे. अब ओडिशा के राज्यपाल की जिम्मेदारी मिलने से परिवार और उनके समर्थकों में खुशी है.

