जोहार लाइव ब्यूरो
मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस के चंद्रू के बयान से एक बार फिर न्यायिक व्यवस्था, जजों की नियुक्ति प्रक्रिया और उसक वर्तमान मोदी सरकार के नियंत्रण की पोल खोल कर रख दी है.
चंद्रू के अनुसार, यदि किसी खास विचारधारा से जुड़े व्यक्ति का नाम नियुक्ति के लिए भेजा जाता है, तो उस सूची को आसानी से मंजूरी मिल जाती है, जबकि अन्य नामों पर फैसला अटका रहता है.
उन्होंने कहा, “भगवाकरण बढ़ रहा है. हर हाईकोर्ट में उस भगवा समूह से जुड़ा एक व्यक्ति मौजूद है. ऐसा कैसे हुआ? क्या वे बहुत बड़ी संख्या में मुकदमों का प्रतिनिधित्व करते हैं या असाधारण रूप से प्रतिभाशाली हैं? मैं आज कह रहा हूं कि एक अलिखित मानक प्रक्रिया (SOP) है. अगर आप भगवा समूह से जुड़े हैं, तो आपकी सूची आगे बढ़ जाएगी, अन्यथा आपकी सूची रोक दी जाएगी और लगातार अटकी रहेगी.”
जस्टिस के. चंद्रू ने ये बातें बीते रविवार 11 अक्टूबर को चेन्नई के एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म की ओर से आयोजित ‘हू विल जज द जजेज’ (न्यायाधीशों का फैसला कौन करेगा?) विषय पर आयोजित परिचर्चा में कहीं. यहां वो ‘जजों की नियुक्ति का कॉलेजियम सिस्टम एक संवैधानिक तख्तापलट है’ विषय पर बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे.
चंद्रू ने कहा कि 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद मौजूदा केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) बनाने की कोशिश की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया. उन्होंने कहा कि फैसले के आधार को दूर करने के लिए कानून में संशोधन करने के बजाय सरकार ने एक तरह के ‘लेन-देन वाले समझौते’ का रास्ता चुना, जिसके तहत कुछ मानदंडों के आधार पर अनुशंसित जजों की नियुक्ति की जा सकती थी.
जस्टिस चंद्रू ने कहा, “अब आप मुझसे पूछ सकते हैं कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने के बाद मोदी संसद में जाकर कानून में संशोधन क्यों नहीं लाए. किसी फैसले को सीधे पलटा नहीं जा सकता, लेकिन उस फैसले के आधार को बदला जा सकता है. अगर आप कहते हैं कि तीन सदस्यों के बीच संतुलन समान नहीं है, तो इसे सात सदस्यीय बनाया जा सकता है, जिसमें 4:3 का अनुपात हो. इसके बावजूद आयोग बनाया जा सकता था. लेकिन उन्होंने संसद में जाकर एक और संशोधन लाने और स्थायी नियुक्ति आयोग बनाने का विकल्प नहीं चुना.”
सुप्रीम कोर्ट के सभी जज मोदी सरकार के नियुक्त किए हुए हैं
उन्होंने आगे कहा, “2014 से 2026 तक, पिछले तीन कार्यकालों में देखें तो आज सुप्रीम कोर्ट में 37 जज हैं और इन सभी 37 जजों की नियुक्ति मोदी के कार्यकाल में हुई है.”
जस्टिस चंद्रू ने कहा, “अगर मोदी 37 जजों की नियुक्ति कर सकते हैं और आराम से काम कर रहे हैं, तो उन्हें राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की चिंता क्यों होगी? मौजूदा व्यवस्था उनके लिए ज्यादा बेहतर है. मैंने अपनी किताब में लिखा है कि पर्दे के पीछे होने वाला यह गठजोड़ और लेन-देन, NJAC जैसी व्यवस्था से ज्यादा फायदेमंद है. NJAC में नियुक्ति के लिए वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन होता और प्रक्रिया पारदर्शी रहती. कुछ भी गोपनीय नहीं रहता. इसलिए मोदी को यह गुप्त लेन-देन वाली व्यवस्था ज्यादा बेहतर लगती है.”
जस्टिस चंद्रू ने जस्टिस विक्टोरिया गौरी की नियुक्ति का उदाहरण देते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ खुले तौर पर बयान देने के बावजूद उनकी नियुक्ति आसानी से हो गई. वहीं, अधिवक्ता जॉन सत्यन की नियुक्ति को अब तक मंजूरी नहीं मिली, जबकि कॉलेजियम ने उनके नाम की सिफारिश दोहराई थी.
न्यायिक नियुक्तियों में अन्य विकल्पों की अनदेखी
जस्टिस चंद्रू ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिससे देश के हर नागरिक का सरोकार होना चाहिए. यह ऐसा विषय नहीं है, जिस पर केवल कुछ लोग आवाज उठाएं.
उन्होंने मौजूदा व्यवस्था को ‘संविधान के पीछे के दरवाजे से नियुक्तियां करने वाला तख्तापलट’ करार देते हुए कहा, “यह बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसका संबंध देश के हर व्यक्ति से है. हमें इस मुद्दे को उठाना होगा. सबसे पहले, हमें अस्थायी नहीं, बल्कि स्थायी समाधान चाहिए.
दूसरा, जब संविधान किसी खास तरीके का प्रावधान नहीं करता, तो पीछे के दरवाजे से उस तरीके को कैसे लागू किया जा सकता है? इसी को हम संवैधानिक तख्तापलट कहते हैं. यह एक संवैधानिक तख्तापलट है.”
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