“कोई भी देश तभी आगे बढ़ सकता है, जब उसके उद्योग, विज्ञान और लोग साथ-साथ आगे बढ़ें.” यह सोच सिर्फ एक विचार नहीं थी, बल्कि जेआरडी टाटा के पूरे जीवन का आधार थी.
आज जब भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रहा है, टाटा समूह देश के सबसे भरोसेमंद कारोबारी घरानों में गिना जाता है और एयर इंडिया एक बार फिर टाटा परिवार का हिस्सा है, तब एक नाम सबसे पहले याद आता है. वह नाम है जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा, जिन्हें दुनिया जेआरडी टाटा के नाम से जानती है.

29 जुलाई 1904 को पेरिस में जन्मे जेआरडी टाटा सिर्फ एक सफल उद्योगपति नहीं थे. वे भारत के पहले लाइसेंस प्राप्त पायलट, दूरदर्शी कारोबारी, कर्मचारियों के अधिकारों के समर्थक और आधुनिक भारत के औद्योगिक विकास के प्रमुख शिल्पकार थे. महज 34 साल की उम्र में 1938 में उन्होंने टाटा सन्स के चेयरमैन का पद संभाला और लगातार 53 वर्षों तक इस जिम्मेदारी को निभाया. उनके नेतृत्व में टाटा समूह की वैल्यू करीब 50 गुना बढ़ी. उन्होंने टीसीएस समेत 14 नई कंपनियों की नींव रखी और टाटा मोटर्स, टाटा सॉल्ट, टाटा ग्लोबल बेवरेजेज तथा टाइटन जैसे प्रतिष्ठित ब्रांडों को नई पहचान दिलाई. इतना ही नहीं, भारत की पहली एयरलाइन शुरू करने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है.
आज उनकी जयंती पर आइए जानते हैं उस दूरदर्शी व्यक्तित्व की कहानी, जिसने सिर्फ एक कारोबारी साम्राज्य नहीं बनाया, बल्कि भारत को उद्योग, विमानन और कॉरपोरेट मूल्यों की ऐसी विरासत दी, जो आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा बनी हुई है.
फ्रांस में हुआ था जन्म
जेआरडी टाटा का जन्म 29 जुलाई 1904 को फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुआ था. उनके पिता रतनजी दादाभाई टाटा टाटा परिवार के सदस्य थे, जबकि उनकी मां सुजैन ब्रिएर फ्रांसीसी थीं. बचपन फ्रांस, भारत और जापान जैसे देशों में बीता. अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं के बीच पले-बढ़े जेआरडी का नजरिया शुरू से ही वैश्विक था. लेकिन जब बात भारत की आती थी, तो उनका सपना साफ था. भारत को आधुनिक, आत्मनिर्भर और औद्योगिक रूप से मजबूत बनाना.
गर्मियों की छुट्टियों के दौरान उनकी मुलाकात विमानन क्षेत्र के दिग्गज सर लुई ब्लेरियो से हुई. इस मुलाकात ने उनके भीतर विमान और उड़ान के प्रति गहरी दिलचस्पी पैदा की, जो जीवनभर बनी रही.
जेआरडी की पढ़ाई फ्रांस, जापान, इंग्लैंड और भारत में हुई. फ्रांसीसी नागरिक होने के कारण उन्हें एक वर्ष तक फ्रांसीसी सेना में सेवा देनी पड़ी. सेना में उनका प्रदर्शन इतना अच्छा था कि वे आगे भी सेना में रहना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने उन्हें भारत लौटकर पारिवारिक कारोबार संभालने के लिए बुला लिया. बाद में जिस रेजिमेंट में वे तैनात थे, उसके अधिकांश सैनिक मोरक्को में युद्ध के दौरान मारे गए.
आसमान से शुरू हुआ एक सपना
1920 का दशक विमानन के लिए शुरुआती दौर था. दुनिया उड़ना सीख रही थी और भारत में हवाई यात्रा अभी कल्पना जैसी थी. इसी दौरान जेआरडी टाटा की रुचि विमान उड़ाने में बढ़ी. उन्होंने प्रशिक्षण लिया और 10 फरवरी 1929 को भारत का पहला पायलट लाइसेंस हासिल किया. यह उपलब्धि केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं थी, बल्कि भारतीय विमानन इतिहास की ऐतिहासिक शुरुआत थी.

इसके तीन साल बाद, 15 अक्टूबर 1932 को उन्होंने खुद कराची से अहमदाबाद होते हुए मुंबई तक डाक पहुंचाई. यह भारत की पहली वाणिज्यिक एयरमेल सेवा थी. यही सेवा आगे चलकर टाटा एयरलाइंस बनी और बाद में एयर इंडिया के नाम से दुनिया भर में पहचान बनाई. उस दौर में जब भारत में विमानन उद्योग की कोई मजबूत नींव नहीं थी, जेआरडी टाटा ने उस नींव को तैयार किया.
34 साल की उम्र में संभाली सबसे बड़ी जिम्मेदारी
1938 में केवल 34 वर्ष की आयु में जेआरडी टाटा, टाटा सन्स के चेयरमैन बने. उस समय टाटा समूह में लगभग 14 कंपनियां थीं. लेकिन अगले 53 वर्षों में उनके नेतृत्व में समूह का अभूतपूर्व विस्तार हुआ.
उनके कार्यकाल में टाटा मोटर्स, टाटा सॉल्ट, टाइटन, टाटा ग्लोबल बेवरेजेज जैसी कंपनियां मजबूत हुईं और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) जैसी नई कंपनी की शुरुआत हुई. उनके नेतृत्व में टाटा समूह की वैल्यू लगभग 10 करोड़ डॉलर से बढ़कर 500 करोड़ डॉलर तक पहुंच गई. उनका मानना था कि किसी भी कंपनी की पहचान केवल उसके मुनाफे से नहीं, बल्कि समाज पर उसके प्रभाव से होती है.
कर्मचारियों के अधिकारों के सबसे बड़े समर्थक
जेआरडी टाटा उन उद्योगपतियों में थे जिन्होंने कर्मचारियों के हितों को व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना. उन्होंने टाटा समूह में सबसे पहले आठ घंटे का कार्यदिवस, मुफ्त चिकित्सा सुविधा, भविष्य निधि (Provident Fund) और दुर्घटना मुआवजा जैसी व्यवस्थाओं को लागू किया. बाद में इनमें से कई प्रावधान देश के श्रम कानूनों का हिस्सा बने.
1956 में उन्होंने टाटा एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (TAS) की शुरुआत की. इसका उद्देश्य युवा प्रतिभाओं को प्रशिक्षित कर टाटा समूह के भविष्य का नेतृत्व तैयार करना था.
जेआरडी टाटा का मानना था कि व्यापार का उद्देश्य केवल पैसा कमाना नहीं होना चाहिए. उनके अनुसार कारोबार का असली मकसद समाज की प्रगति और लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना है. इसी सोच ने टाटा समूह को केवल एक कारोबारी संस्था नहीं, बल्कि भरोसे और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक बना दिया.
विज्ञान, शिक्षा और स्वास्थ्य में भी बड़ा योगदान
जेआरडी टाटा ने महसूस किया कि केवल उद्योग लगाने से कोई देश विकसित नहीं बन सकता. इसके लिए विज्ञान, अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश भी उतना ही जरूरी है. उन्होंने टाटा ट्रस्ट्स के माध्यम से टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR), टाटा मेमोरियल सेंटर और कई अन्य संस्थानों को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई. इन संस्थानों ने भारत में विज्ञान, चिकित्सा और अनुसंधान को नई दिशा दी.
जेआरडी टाटा अपने काम में उत्कृष्टता के लिए जाने जाते थे. वे छोटी से छोटी बात पर भी ध्यान देते थे और गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं करते थे. उनका प्रसिद्ध कथन आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करता है. “हमेशा उत्कृष्टता का लक्ष्य रखिए. अगर आप उत्कृष्टता का लक्ष्य रखेंगे, तो पूर्णता के करीब पहुंच जाएंगे.”
भारत रत्न से सम्मानित

जेआरडी ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) की तर्ज पर 1956 में टाटा प्रशासनिक सेवा (TAS) की शुरुआत की थी जिसका मकसद टाटा ग्रुप में युवा प्रतिभाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें लीडरशिप के लिए तैयार करना था. टाटा ने उद्यमिता के साथ अपने कर्मचारियों और उनके परिवारों के कल्याण के लिए कई काम किए. टाटा ने ही सबसे पहले 8 घंटे की ड्यूटी तय की. उन्होंने अपने कर्मचारियों के लिए फ्री मेडिकल सुविधा और भविष्य निधि योजना की भी शुरुआत की. किसी कर्मचारी के साथ दुर्घटना हो जाने की स्थिति में टाटा ने सबसे पहले मुआवजा देने की पहल की. जेआरडी टाटा देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित होने वाले इकलौते उद्योगपति हैं. उन्हें 1992 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. इसके एक साल बाद 29 नवंबर 1993 को उन्होंने जेनेवा के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली.
आखिरी सफर, लेकिन अमर विरासत
जेआरडी टाटा भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार और मूल्य आज भी जीवित हैं. टाटा समूह की विश्वसनीयता, कर्मचारियों के प्रति संवेदनशीलता, समाज के प्रति जिम्मेदारी और गुणवत्ता के प्रति प्रतिबद्धता आज भी उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही है. 2022 में जब एयर इंडिया फिर से टाटा समूह के पास लौटी, तो कई लोगों ने इसे केवल एक कारोबारी सौदा नहीं, बल्कि जेआरडी टाटा के सपने की घर वापसी कहा.

आज जब दुनिया स्टार्टअप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तेज मुनाफे की बात करती है, तब जेआरडी टाटा की सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो जाती है. उन्होंने सिखाया कि सफलता केवल बैलेंस शीट में नहीं होती. सफलता इस बात में होती है कि आपके फैसलों से कितने लोगों का जीवन बेहतर हुआ.
उन्होंने यह भी साबित किया कि ईमानदारी, गुणवत्ता और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ भी वैश्विक स्तर पर सफलता हासिल की जा सकती है. यही वजह है कि जेआरडी टाटा को केवल टाटा समूह का चेयरमैन नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के उन निर्माताओं में गिना जाता है, जिन्होंने देश को नई सोच, नई दिशा और सचमुच नई उड़ान दी.
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