जोहार लाइव ब्यूरो
झारखंड हाईकोर्ट ने टाटा हिताची कंस्ट्रक्शन मशीनरी कंपनी प्राइवेट लिमिटेड को बड़ी राहत देते हुए कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) की ओर से जारी 28.03 लाख रुपये की वसूली के आदेश और उससे जुड़ी आगे की कार्रवाई को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि EPFO यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सका कि संबंधित ठेकेदार की कोई राशि टाटा हिताची के पास बकाया थी या कंपनी पर ठेकेदार की देनदारी थी. इसके बावजूद वसूली की कार्रवाई आगे बढ़ाई गई.
जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने 12 अक्टूबर 2026 को सुनाए गए फैसले में टाटा हिताची की याचिका स्वीकार कर ली. हालांकि, कोर्ट ने EPFO को संबंधित ठेकेदार अर्थ मूवर कंसल्टेंसी प्राइवेट लिमिटेड से बकाया राशि वसूलने के लिए कानून के मुताबिक दूसरी कार्रवाई करने की छूट दी है.
क्या है पूरा मामला?
मामला टाटा हिताची कंस्ट्रक्शन मशीनरी कंपनी और जमशेदपुर की अर्थ मूवर कंसल्टेंसी प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है. अर्थ मूवर कंसल्टेंसी को 29 जुलाई 2008 को डीलरशिप समझौते के तहत टाटा हिताची का डीलर नियुक्त किया गया था. इसके बाद 22 अगस्त 2012 को जारी वर्क ऑर्डर के जरिए कंपनी ने अर्थ मूवर कंसल्टेंसी से वेस्ट बोकारो में टाटा स्टील की साइट पर फुल मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट (FMC) के तहत मैनपावर सपोर्ट की सेवा भी ली थी.
अर्थ मूवर कंसल्टेंसी के कर्मचारियों ने EPFO में शिकायत की थी कि अक्टूबर 2012 से मार्च 2015 के बीच उनके वेतन से हर महीने भविष्य निधि (PF) की राशि काटी गई, लेकिन उसे उनके PF खातों में जमा नहीं किया गया. शिकायत की जांच के बाद EPFO ने ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई शुरू की.
EPFO के अनुसार, अर्थ मूवर कंसल्टेंसी को मार्च 2012 से अप्रैल 2016 की अवधि के लिए PF कोड आवंटित था. कर्मचारियों की शिकायत मिलने के बाद जांच की गई और ठेकेदार को रिकॉर्ड पेश करने के लिए नोटिस दिया गया. EPFO का कहना था कि कई अवसर दिए जाने के बावजूद ठेकेदार सुनवाई में उपस्थित नहीं हुआ.
ठेकेदार पर 28 लाख रुपये से अधिक की देनदारी
EPFO ने 9 जून 2017 को आदेश जारी कर अर्थ मूवर कंसल्टेंसी को 19,98,087 रुपये PF, पेंशन फंड, बीमा फंड और प्रशासनिक शुल्क के मद में जमा करने का निर्देश दिया. इसके अलावा 8,04,954 रुपये ब्याज निर्धारित किया गया. इस तरह कुल बकाया राशि 28,03,041 रुपये हो गई.
इसके बाद 31 जुलाई 2017 को EPFO ने भविष्य निधि अधिनियम, 1952 की धारा 8F के तहत टाटा हिताची को 28,03,041 रुपये जमा करने का निर्देश दिया. 5 जनवरी 2018 को वसूली प्रमाणपत्र जारी किया गया. फिर 19 जनवरी 2018 को कंपनी को नोटिस देकर 15 दिनों के भीतर राशि जमा करने को कहा गया. भुगतान नहीं करने पर कानूनी प्रक्रिया के तहत वसूली की चेतावनी दी गई.
टाटा हिताची ने क्या दलील दी?
टाटा हिताची की ओर से अदालत में कहा गया कि अर्थ मूवर कंसल्टेंसी एक अलग कंपनी है और उसका अपना PF प्रतिष्ठान कोड भी है. कर्मचारियों की नियुक्ति, चयन और कामकाज की व्यवस्था ठेकेदार के नियंत्रण में थी. दोनों कंपनियों के बीच समझौता स्वतंत्र व्यावसायिक संबंधों पर आधारित था.
कंपनी ने यह भी बताया कि अर्थ मूवर कंसल्टेंसी को उपकरणों की आपूर्ति के बदले टाटा हिताची को बड़ी रकम चुकानी थी. भुगतान में चूक के कारण उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही और मध्यस्थता की प्रक्रिया भी चल रही थी. कंपनी का दावा था कि उसे ठेकेदार से राशि वसूलनी थी, न कि ठेकेदार की कोई रकम उसके पास बकाया थी.
टाटा हिताची ने 31 अगस्त 2017 को EPFO को अपना जवाब भी दिया था. कंपनी का आरोप था कि उसके जवाब और उसमें उठाए गए बिंदुओं पर उचित विचार किए बिना ही वसूली प्रमाणपत्र जारी कर दिया गया.
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया वसूली आदेश?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि EPFO ने धारा 8F के तहत कार्रवाई करते हुए टाटा हिताची से 28,03,041 रुपये की वसूली का निर्देश दिया था. इस प्रावधान के तहत किसी ऐसे व्यक्ति से बकाया राशि वसूलने की कार्रवाई की जा सकती है, जिसके पास संबंधित नियोक्ता की रकम मौजूद हो या आने वाली हो.
अदालत ने कहा कि इस प्रावधान के इस्तेमाल के लिए यह जरूरी है कि संबंधित तीसरे व्यक्ति के पास नियोक्ता की कोई राशि हो या उसे राशि मिलने वाली हो. लेकिन EPFO ऐसा कोई दस्तावेज अदालत के सामने नहीं रख सका, जिससे यह साबित हो कि अर्थ मूवर कंसल्टेंसी की कोई रकम टाटा हिताची के पास थी या कंपनी पर ठेकेदार की कोई देनदारी थी.
कोर्ट ने यह भी पाया कि टाटा हिताची ने अपने जवाब में स्पष्ट रूप से कहा था कि अर्थ मूवर कंसल्टेंसी की कोई राशि उसके पास बकाया नहीं है. इसके बावजूद EPFO ने जवाब में उठाए गए तथ्यों पर विचार किए बिना वसूली प्रमाणपत्र जारी कर दिया.
अदालत ने प्रशासनिक निष्पक्षता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी सार्वजनिक प्राधिकरण को जवाब मिलने के बाद उस पर विचार करना और उसे अस्वीकार करने की स्थिति में उचित कारण बताना जरूरी है. आदेश जारी होने के बाद अदालत में नए तर्क देकर उसकी कमियों को दूर नहीं किया जा सकता. इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त मामले के फैसले का भी उल्लेख किया गया.

