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    Home»झारखंड» झारखंड की जेलों में डॉक्टरों की भारी कमी पर हाईकोर्ट सख्त, स्वत: संज्ञान लेकर पीआईएल में बदला मामला
    झारखंड

     झारखंड की जेलों में डॉक्टरों की भारी कमी पर हाईकोर्ट सख्त, स्वत: संज्ञान लेकर पीआईएल में बदला मामला

    Team JoharBy Team JoharApril 30, 2026Updated:April 30, 2026No Comments2 Mins Read3
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    Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य की जेलों में डॉक्टरों की कमी और लचर चिकित्सा व्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इस गंभीर विषय पर स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए इसे जनहित याचिका (PIL) में तब्दील कर दिया है। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे आगे की सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) के पास भेज दिया है।

    43 पदों में से सिर्फ 1 पर डॉक्टर तैनात

    एक क्रिमिनल अपील की सुनवाई के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि राज्य की विभिन्न जेलों में डॉक्टरों के कुल 43 पद स्वीकृत हैं। बेहद चिंताजनक स्थिति यह है कि इन स्वीकृत पदों में से मात्र 1 पद पर ही डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि शेष 42 पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। इसके अलावा जेलों में चिकित्सा सुविधाओं के लिए जरूरी आधारभूत संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) की भी भारी कमी पाई गई है।

    इलाज के अभाव में प्रार्थी की मौत

    यह पूरा मामला तब प्रकाश में आया जब एक क्रिमिनल अपील की सुनवाई चल रही थी। प्रार्थी ने हस्तक्षेप याचिका (IA) दाखिल कर अदालत को बताया था कि उसकी किडनी खराब हो चुकी है और जेल में उचित इलाज की सुविधा नहीं है, इसलिए उसे जमानत दी जाए। अदालत ने इस पर सरकार से जवाब मांगा था, लेकिन विडंबना यह रही कि जब तक सरकार का जवाब आता, प्रार्थी की मृत्यु हो गई।

    परिजनों को मुआवजा याचिका की छूट

    प्रार्थी की मौत के बाद उनके परिजनों ने अदालत से मुआवजे की मांग की है। इस पर कोर्ट ने सहानुभूति जताते हुए परिजनों को मुआवजे के संबंध में अलग से याचिका दायर करने की छूट प्रदान की है। अदालत ने माना कि जेलों में डॉक्टरों और संसाधनों की कमी कैदियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

    प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल

    हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद अब राज्य सरकार और जेल प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं। मात्र एक डॉक्टर के भरोसे पूरे राज्य की जेलों की व्यवस्था छोड़ना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि जेल में बंद बंदियों के जीवन के साथ खिलवाड़ भी है। अब चीफ जस्टिस की बेंच इस मामले पर विस्तृत सुनवाई करेगी, जिससे जेलों की व्यवस्था में बड़े सुधार की उम्मीद जगी है।

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