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    Home»झारखंड»रेत खोदकर प्यास बुझा रही आदिम जनजाति, डीसी ने दिए जांच के आदेश
    झारखंड

    रेत खोदकर प्यास बुझा रही आदिम जनजाति, डीसी ने दिए जांच के आदेश

    Team JoharBy Team JoharApril 30, 2026Updated:April 30, 2026No Comments3 Mins Read5
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    Chatra:  झारखंड के चतरा जिले में भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच पानी की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मचा हुआ है। प्रतापपुर, कुंदा, कान्हाचट्टी और लावालौंग जैसे सुदूरवर्ती प्रखंडों से जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे सरकारी हर घर नल से जल योजना की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवालिया निशान लगा रही हैं। सरकारी फाइलों में करोड़ों खर्च होने के बावजूद आज भी ग्रामीण नदी किनारे गड्ढे (चूआ) खोदकर गंदा पानी पीने को मजबूर हैं।

    आदिम जनजातियों के सामने जीवन का संकट

    प्रतापपुर प्रखंड की सिद्दीकी पंचायत के हेसातू गांव स्थित परहिया टोला में बैगा, बिरहोर और गंझू समुदाय के लोग आज भी बुनियादी पेयजल सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। गांव में लगे चापाकल और जलमीनार जवाब दे चुके हैं। जल स्तर गिरने के कारण कुएं सूख गए हैं, जिससे ग्रामीणों के पास नदी की गंदी जलधारा या रेत के चूआ से निकले मटमैले पानी के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

    बीमार पड़ रहे बच्चे और बंद हुआ मिड डे मील

    दूषित पानी के सेवन से गांव के बच्चे लगातार बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा इलाज में ही खर्च हो जा रहा है। स्थिति इतनी विकराल है कि पानी की कमी के कारण गांव के स्कूलों में संचालित होने वाला मध्याह्न भोजन (मिड डे मील) तक बंद करना पड़ा है।

    प्रशासनिक उपेक्षा से ग्रामीणों में आक्रोश

    स्थानीय महिला पार्वती देवी ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि कई बार मुखिया और अधिकारियों से शिकायत की गई, लेकिन नतीजा शून्य रहा। वहीं ग्रामीण महेंद्र बैगा का कहना है कि आदिम परिवारों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब जलमीनार और नल जल योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, तो धरातल पर आदिम जनजातियों के हिस्से सिर्फ बीमारियां और गंदा पानी ही क्यों आ रहा है।

    मीडिया के हस्तक्षेप के बाद जागा सिस्टम

    जब यह मामला चतरा के उपायुक्त रवि आनंद के संज्ञान में लाया गया, तब जाकर प्रशासनिक महकमे की नींद टूटी। डीसी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। उन्होंने प्रतापपुर बीडीओ को आदेश दिया है कि प्रभावित गांवों में खराब पड़े चापाकल और जलमीनार को प्राथमिकता के आधार पर ठीक कराया जाए।

    आश्वासन या समाधान: बड़ा सवाल बरकरार

    उपायुक्त के निर्देश के बाद अब ग्रामीणों को उम्मीद तो जगी है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर आदिम जनजातियों के कल्याण के लिए आने वाला बजट कहां खर्च हो रहा है? क्या प्रशासन की नींद तभी खुलती है जब कैमरा उनकी नाकामियों को उजागर करता है? हेसातू गांव के परहिया टोला के लोग अब भी इस इंतजार में हैं कि उन्हें कब प्यास से आजादी मिलेगी और कब उनके घर तक शुद्ध पानी पहुंचेगा।

    Also read : झारखंड PGT शिक्षक नियुक्ति: दोहरी डिग्री विवाद पर हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी, अदालत ने सुरक्षित रखा फैसला

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