मुस्कान चौधरी
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में थे, जिन्होंने राष्ट्र की एकता और अखंडता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी. “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे” का उनका उद्घोष आज भी भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित नारों में गिना जाता है.भारतीय जनसंघ के संस्थापक और प्रखर राष्ट्रवादी विचारक के रूप में उन्होंने देश की एकता के लिए अपना जीवन समर्पित किया.
आज, 6 जुलाई को भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 126वीं जयंती मनाई जा रही है. उनका जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में हुआ था. शिक्षा, राजनीति और राष्ट्रवाद, तीनों क्षेत्रों में उनकी अलग पहचान रही. जम्मू-कश्मीर, अनुच्छेद 370 और राष्ट्रीय एकता को लेकर उनके विचार आज भी देश की राजनीति में चर्चा का विषय बने रहते हैं.
उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा कोलकाता में पूरी की. महज 23 साल की उम्र में कानून की डिग्री हासिल की और बाद में इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर बने. सिर्फ 26 वर्ष की आयु में वे कोलकाता विश्वविद्यालय के सबसे युवा उपकुलपति बने. यह उपलब्धि आज भी एक रिकॉर्ड मानी जाती है.
आजादी के बाद बनी पहली केंद्र सरकार में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को देश का पहला उद्योग मंत्री बनाया गया. हालांकि, कुछ राष्ट्रीय मुद्दों पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से उनके मतभेद बढ़ने लगे. अंततः उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. डॉ. मुखर्जी ने 1950 में हुए नेहरू-लियाकत समझौते का खुलकर विरोध किया. उनका मानना था कि यह समझौता देश के हितों के अनुरूप नहीं है. इसी मुद्दे पर उन्होंने सरकार छोड़ने का फैसला लिया और स्वतंत्र राजनीतिक राह चुनी.
भारतीय जनसंघ की रखी नींव
सरकार से अलग होने के बाद उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की. यही संगठन आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक आधार बना. आज भी भाजपा अपने वैचारिक इतिहास में डॉ. मुखर्जी को प्रमुख स्थान देती है. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर की परमिट व्यवस्था के कड़े विरोधी थे. उनका प्रसिद्ध नारा, “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे”, राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में आज भी याद किया जाता है.
1953 में डॉ. मुखर्जी बिना परमिट जम्मू-कश्मीर पहुंचे. वहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी के दौरान वे करीब 40 दिनों तक हिरासत में रहे. 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान उनकी मृत्यु हो गई. उनकी मौत को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर सवाल उठते रहे हैं. कई लोगों ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग भी उठाई.
डॉ. मुखर्जी के निधन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनकी मां जोगमाया देवी को शोक पत्र भेजा. इसके जवाब में जोगमाया देवी ने अपने बेटे की हिरासत में हुई मौत पर गंभीर सवाल उठाए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की.
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम आज भी भारतीय राजनीति में प्रमुखता से लिया जाता है. भारतीय जनसंघ की स्थापना, राष्ट्रीय एकता, जम्मू-कश्मीर और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर उनके विचार आज भी राजनीतिक बहस और विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं.
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