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    Home»जोहार ब्रेकिंग»5 साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही है आखिर स्टेन स्वामी थे कौन? हम क्या जवाब देंगे?
    जोहार ब्रेकिंग

    5 साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही है आखिर स्टेन स्वामी थे कौन? हम क्या जवाब देंगे?

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkJuly 5, 2026No Comments5 Mins Read2
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    स्टेन स्वामी
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    सचिन झा शेखर

    5 जुलाई 2021… यानी आज से ठीक पांच साल पहले, 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी ने मुंबई के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली. आधिकारिक तौर पर उनकी मौत इलाज के दौरान हुई, लेकिन वे उस समय न्यायिक हिरासत में थे. इसलिए उनके समर्थक इसे “कस्टोडियल डेथ” कहते हैं, जबकि सरकार और जांच एजेंसियां इसे न्यायिक प्रक्रिया के दौरान हुई मृत्यु मानती हैं.

    लेकिन पांच साल बाद भी मेरे लिए सबसे बड़ा सवाल उनकी मौत नहीं, बल्कि उनकी पहचान है. अगर आज कोई छात्र, कोई युवा या आने वाली पीढ़ी मुझसे पूछे कि स्टेन स्वामी कौन थे? तो क्या जवाब दूं? क्या मैं कहूं कि वे देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने, माओवादी संगठन से संबंध रखने और UAPA के आरोपी थे? या यह कहूं कि उन्होंने अपने जीवन के लगभग पांच दशक झारखंड के आदिवासियों, विस्थापितों, जंगल-जमीन के अधिकार और जेलों में बंद हजारों अंडरट्रायल आदिवासियों के लिए काम करते हुए बिताए?

    सच यह है कि सार्वजनिक रिकॉर्ड में दोनों बातें मौजूद हैं. स्टेन स्वामी 1970 के दशक से झारखंड में सक्रिय थे. रांची स्थित बगइचा उनके काम का प्रमुख केंद्र बना. उन्होंने पेसा कानून, पांचवीं अनुसूची, भूमि अधिग्रहण, खनन परियोजनाओं से विस्थापन और आदिवासी स्वशासन जैसे मुद्दों पर लगातार काम किया. उन्होंने झारखंड की जेलों में बंद हजारों अंडरट्रायल आदिवासी युवाओं पर अध्ययन कराया और सवाल उठाया कि जिन लोगों का मुकदमा तक पूरा नहीं हुआ, वे वर्षों से जेल में क्यों हैं.

    फिर आया भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामला. 8 अक्टूबर 2020 को NIA ने उन्हें गिरफ्तार किया. उन पर IPC की धारा 120B, 121, 121A, 124A समेत UAPA की कई गंभीर धाराएं लगाईं. एजेंसी का आरोप था कि उनका प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) से संबंध था और वे उससे जुड़े नेटवर्क का हिस्सा थे.

    स्टेन स्वामी ने हर आरोप से इनकार किया. उन्होंने कहा कि वे कभी भीमा कोरेगांव गए ही नहीं और हिंसा से उनका कोई संबंध नहीं है.
    यहां तक तो यह एक सामान्य आपराधिक मुकदमे जैसा लगता है. लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने इस मामले को असाधारण बना दिया.

    84 साल का एक बुजुर्ग, जो पार्किंसन रोग से पीड़ित था, बार-बार मेडिकल आधार पर जमानत मांगता रहा. उसके हाथ इतने कांपते थे कि पानी पीने के लिए स्ट्रॉ और सिपर की जरूरत पड़ती थी. अदालत में इस पर भी बहस हुई. अंतिम समय तक उन्हें ईलाज तक के लिए जमानत नहीं मिल रही थी आखिरकार उन्हें इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। 5 जुलाई 2021 को उनकी मृत्यु हो गई. ध्यान दीजिए उनकी मृत्यु तक अदालत ने उन्हें किसी भी आरोप में दोषी घोषित नहीं किया था.

    भारतीय कानून में आरोपी और दोषी एक ही बात नहीं होते. गिरफ्तारी अपराध सिद्ध होने का प्रमाण नहीं होती. किसी व्यक्ति को दोषी केवल अदालत घोषित करती है. यही वह बिंदु है, जहां स्टेन स्वामी का मामला केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता.
    उनकी मृत्यु पर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने चिंता जताई. भारत के कई विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, चर्च संगठनों और इतिहासकारों ने भी सवाल उठाए. दूसरी ओर सरकार और जांच एजेंसियों का कहना था कि पूरा मामला कानून के अनुसार चल रहा था और अदालतें स्वतंत्र थीं.

    बाद के वर्षों में डिजिटल फॉरेंसिक कंपनी Arsenal Consulting की रिपोर्टों ने यह दावा किया कि भीमा कोरेगांव मामले के कुछ आरोपियों के कंप्यूटर में बाहरी हस्तक्षेप के जरिए दस्तावेज़ डाले गए हो सकते हैं. जांच एजेंसियों ने इन निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया और अपने आरोपों पर कायम रहीं. इसलिए यह बहस आज भी समाप्त नहीं हुई है. इसीलिए पांच साल बाद भी यह मामला भारतीय लोकतंत्र के सामने कई असहज सवाल छोड़ता है.

    क्या किसी 84 वर्षीय गंभीर रूप से बीमार अंडरट्रायल को मेडिकल आधार पर जमानत मिलनी चाहिए थी? क्या इतने गंभीर आरोपों वाले मुकदमों का समयबद्ध ट्रायल नहीं होना चाहिए? क्या जांच एजेंसियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए, यदि वर्षों तक मुकदमा अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंचता?

    और सबसे बड़ा सवाल… अगर आने वाली पीढ़ी सिर्फ एक लाइन में पूछे स्टेन स्वामी कौन थे? तो क्या हम उन्हें सिर्फ “UAPA आरोपी” कहेंगे? या “आदिवासी अधिकारों के लिए जीवन समर्पित करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता”? या फिर इतना ईमानदार जवाब देंगे कि वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन पर देश के खिलाफ गंभीर आरोप लगे, जिन्होंने उन आरोपों से अंत तक इनकार किया, और जिनकी मृत्यु अदालत द्वारा दोष तय होने से पहले न्यायिक हिरासत में हो गई.

    शायद यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी त्रासदी है. क्योंकि किसी लोकतंत्र में सबसे कठिन प्रश्न अक्सर किसी व्यक्ति के बारे में नहीं होते.  वे न्याय, प्रक्रिया और राज्य की जवाबदेही के बारे में होते हैं. और स्टेन स्वामी का नाम, पांच साल बाद भी, उन्हीं सवालों के साथ हमारे सामने खड़ा है.

    लेखक पत्रकार हैं और इंडियन कॉमरेड एके रॉय : अ हीरो ऑफ ग्राउंड पॉलिटिक्स नामक किताब के लेखक हैं और धनबाद के रहनेवाले हैं. यह लेख उनका निजी विचार है.

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    5 साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही है आख़िर स्टेन स्वामी थे कौन? हम क्या जवाब देंगे? स्टेन स्वामी
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