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    Home»जोहार ब्रेकिंग»भारत को सेक्युलर कहना यानी पानी को गीला कहना – गीतांजलि आंगमो
    जोहार ब्रेकिंग

    भारत को सेक्युलर कहना यानी पानी को गीला कहना – गीतांजलि आंगमो

    Joharlive NetworkBy Joharlive NetworkJuly 31, 2026No Comments3 Mins Read0
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    Sonam Wangchuk
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    सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो ने संविधान में सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष शब्द को लेकर एक सवाल खड़ा किया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि भारत को संविधान में ‘सेक्युलर’ कहना कुछ ऐसा ही है, जैसे पानी को गीला कहना.
    आंगमो का कहना है कि भारत 1976 में संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द जुड़ने से पहले भी धर्मनिरपेक्ष था. यानी उनके मुताबिक, इस शब्द को बाद में जोड़ने से भारत की व्यवस्था में कोई नई बात नहीं आई. संविधान पहले से ही हर धर्म को मानने की आजादी और सभी के लिए बराबरी की बात करता था.

    संविधान में पहले से क्या था?

    गीतांजलि आंगमो ने अपनी पोस्ट में संविधान के कई प्रावधानों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 14 हर नागरिक को कानून के सामने बराबरी देता है. अनुच्छेद 25 से 28 तक लोगों को अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने की आजादी है. वहीं, अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं.

    उनका यह भी कहना है कि भारत का कोई सरकारी या राजधर्म नहीं है. ऐसे में संविधान की बुनियादी सोच पहले से ही ऐसी थी, जिसमें किसी एक धर्म को राज्य का धर्म नहीं माना गया.

    सेक्युलर शब्द भारत की सोच से कितना मेल खाता है?

    आंगमो का तर्क है कि सेक्युलर शब्द पश्चिमी देशों से आया है. यूरोप में चर्च और सरकार के बीच लंबे संघर्ष के बाद वहां सेक्युलरिज्म की अवधारणा विकसित हुई. लेकिन भारत का इतिहास अलग रहा है.

    भारत में अलग-अलग धर्मों और विचारों के लोग सदियों से साथ रहते आए हैं. यहां धार्मिक विविधता को संभालने के लिए अपनी अलग सोच रही है. इसी वजह से आंगमो ‘सर्व धर्म समभाव’ को भारत की धार्मिक सोच को समझने के लिए ज्यादा सही मानती हैं.

    सीधी भाषा में कहें तो उनका कहना है कि भारत में दूसरे धर्मों को सहने की बात नहीं, बल्कि सभी धर्मों का बराबर सम्मान करने की परंपरा रही है.

    वसुधैव कुटुंबकम का भी दिया उदाहरण

    गीतांजलि आंगमो ने वसुधैव कुटुंबकम का भी जिक्र किया. उनका कहना है कि दुनिया को एक परिवार मानने वाला यह विचार आधुनिक सेक्युलरिज्म से बहुत पुराना है.

    उनके मुताबिक, भारत ने हमेशा अलग-अलग धर्मों, विचारों और दर्शन को जगह दी है. इसलिए भारत की धार्मिक विविधता को समझने के लिए पश्चिम से आए सेक्युलर शब्द के बजाय भारत की अपनी परंपराओं और विचारों को सामने रखना ज्यादा सही होगा.

    1976 में प्रस्तावना में जोड़ा गया था सेक्युलर

    संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए जोड़ा गया था. गीतांजलि आंगमो का सवाल इसी बदलाव को लेकर है. वह पूछती हैं कि जब संविधान में पहले से ही बराबरी, धार्मिक आजादी और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात थी, तो ‘सेक्युलर’ शब्द अलग से जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी?

    आंगमो ने इसे दार्शनिक रूप से एक तरह का दोहराव बताया है. उनका मानना है कि भारत की अपनी बहुलतावादी सोच को समझने के लिए पश्चिमी सेक्युलरिज्म का सहारा लेने की जरूरत नहीं है.

    उन्होंने कहा है कि वह इस मुद्दे पर विस्तार से एक लेख भी लिखेंगी. यानी अभी उन्होंने X पर अपनी बात रखी है और आगे इस सोच को विस्तार से समझाने की तैयारी में हैं.

    secularism गीतांजलि जे. आंगमो सेक्युलरिज्म
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