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    जन्मदिन विशेष : नदी तैरकर स्कूल जाने वाला वो लड़का, जिसने राजनीति में ‘मौसम वैज्ञानिक’ बन रच दिया इतिहास

    joharlive NetworkBy joharlive NetworkJuly 5, 2026No Comments6 Mins Read
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    रामविलास
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    भारतीय राजनीति में एक ऐसा नेता भी हुआ, जिसके लिए दल मायने नहीं रखते थे, दिल मायने रखते थे. विचारधाराएं चाहे जो भी हों, दिल्ली की सत्ता की चाबी हमेशा उनके इर्द-गिर्द ही घूमती थी. बात हो रही है देश के सबसे कद्दावर दलित नेताओं में शुमार और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के संस्थापक रामविलास पासवान की. आज उनके 80वें जन्मदिन के मौके पर आइए जानते हैं बिहार के एक सुदूर गांव से निकलकर लुटियंस दिल्ली के ‘किंगमेकर’ बनने तक की अनसुनी और मुकम्मल कहानी.

    कहानी शुरू होती है 5 जुलाई 1946 से. बिहार का खगड़िया जिला और गांव ‘शहरबन्नी’. अलौली ब्लॉक का यह गांव हर साल कोसी और बूढ़ी गंडक की बाढ़ में डूब जाता था. इसी गांव के एक साधारण दलित परिवार में रामविलास का जन्म हुआ. पिता जामुन पासवान सीधे-साधे किसान थे. बचपन इतना मुफलिसी में बीता कि बाढ़ के दिनों में रामविलास को तैरकर या नाव के सहारे स्कूल जाना पड़ता था. लेकिन पढ़ने की ललक ऐसी थी कि उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी से एमए और कानून यानी एलएलबी की डिग्री हासिल की

    इसके बाद उन्होंने बीपीएससी की परीक्षा पास की और डीएसपी के पद पर चुन लिए गए. घर में खुशियां मनाई जा रही थीं कि बेटा बड़ा अफसर बन गया. लेकिन तभी उनकी मुलाकात प्रखर समाजवादी नेता राजनारायण से हुई. राजनारायण ने कड़कती आवाज में युवा रामविलास से कहा… “सरकार में रहकर हुक्म बजाओगे या हुकूमत बदलने के लिए सड़कों पर उतरोगे?” इस एक लाइन ने रामविलास के भीतर की आग को भड़का दिया। उन्होंने नौकरी को लात मारी और 1969 में मात्र 23 साल की उम्र में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक बनकर सबको चौंका दिया।

    1974 में जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) ने इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का शंखनाद किया, तो लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान इस आंदोलन की त्रिमूर्ति बनकर उभरे. 1975 में इमरजेंसी लगी, तो पासवान को जेल में डाल दिया गया। करीब दो साल वे जेल की सलाखों के पीछे रहे. 1977 में जब जेल से छूटे, तो देश में जनता पार्टी की लहर थी. पासवान को बिहार की हाजीपुर लोकसभा सीट से टिकट मिला. इस चुनाव में उन्होंने वो कर दिखाया जो इतिहास में कभी नहीं हुआ था.

    रामविलास पासवान ने अपने विरोधी को 4 लाख 24 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया. यह उस समय दुनिया में सबसे बड़ी चुनावी जीत का वर्ल्ड रिकॉर्ड था. रातों-रात 31 साल का यह नौजवान देश की राजनीति का चमकता सितारा बन गया. बाद में 1989 में उन्होंने खुद अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते हुए 5 लाख से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की.

    कथा मौसम विज्ञानी बनने की

    रामविलास पासवान के पास राजनीतिक हवा को सूंघने की गजब की शक्ति थी. बिहार के ही दिग्गज नेता लालू प्रसाद यादव ने एक बार मजाकिया लहजे में उन्हें राजनीति का ‘मौसम वैज्ञानिक’ कहा था. यह नाम उन पर ऐसा चिपका कि आज भी मिसाल के तौर पर लिया जाता है. रामबिलास पासवान जानते थे कि जनता का ऊंट किस करवट बैठने वाला है और केंद्र में किसकी सरकार बनने वाली है.

    इसी राजनीतिक समझदारी की बदौलत उन्होंने देश के 6 अलग-अलग प्रधानमंत्रियों के साथ कैबिनेट मंत्री के रूप में काम किया. 1989 में वीपी सिंह सरकार में श्रम और कल्याण मंत्री के तौर पर काम किया. 1996 में एचडी देवेगौड़ा सरकार में रेल मंत्री रहे. 1997 में आईके गुजराल सरकार में भी रेल मंत्री रहे. 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में बतौर संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री सेवा दी. 2004 में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार में रसायन, उर्वरक और इस्पात मंत्री रहे. साल 2014 और 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार में उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री के तौर पर सेवा दी.

    पासवान सिर्फ कुर्सी पर बैठने वाले नेता नहीं थे. वे जिस भी मंत्रालय में रहे, वहां उन्होंने ऐसे फैसले लिए जिसका असर आज भी देश देख रहा है. 1989 में वीपी सिंह सरकार में श्रम मंत्री रहते हुए पासवान ने ही ‘मंडल कमीशन’ को लागू करवाने के लिए सबसे ज्यादा जोर लगाया था. उन्हीं के प्रयासों से संविधान निर्माता डॉ भीमराव आंबेडकर को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ दिया गया और संसद के सेंट्रल हॉल में उनकी तस्वीर लगाई गई.

    रेल मंत्री रहते हुए उन्होंने बिहार के हाजीपुर में पूर्व मध्य रेलवे (ECR) का जोनल मुख्यालय खुलवाया. रेलवे में हजारों दलितों-पिछड़ों को नौकरियां दीं. वाजपेयी सरकार में संचार मंत्री रहते हुए उन्होंने मोबाइल फोन कॉल्स की दरें सस्ती कीं, जिससे मोबाइल फोन अमीरों की जेब से निकलकर गरीबों के हाथों तक पहुंचा. मोदी सरकार में खाद्य मंत्री रहते हुए उन्होंने ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ की शुरुआत की, जिससे आज देश के करोड़ों प्रवासी मजदूर किसी भी राज्य में अपना राशन मुफ्त ले पा रहे हैं.

    राजनीति से इतर रामविलास पासवान अपने बेहद मिलनसार और मददगार स्वभाव के लिए जाने जाते थे. लुटियंस दिल्ली का उनका सरकारी आवास ’12 जनपथ’ दशकों तक बिहार के लोगों का आश्रय स्थल रहा. बिहार से कोई गरीब इलाज कराने दिल्ली आता या कोई छात्र मदद मांगने पहुंचता, पासवान जी का दरवाजा हमेशा खुला रहता था. उनके घर पर हर वक्त सैकड़ों लोगों का खाना बनता था. विरोधियों से भी उनके रिश्ते इतने मधुर थे कि सोनिया गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक, हर कोई उनकी बात का सम्मान करता था.

    रामविलास पासवान के निजी जीवन की बात करें तो उनकी दो शादियां हुईं. उनकी पहली शादी 1960 के दशक में गांव में ही राजकुमारी देवी से हुई थी, जिनसे उनकी दो बेटियां उषा और आशा हैं. बाद में उन्होंने राजकुमारी देवी को तलाक दे दिया. 1983 में उन्होंने रीना शर्मा से दूसरी शादी की, जो अमृतसर की रहने वाली थीं और एयरहोस्टेस थीं. रीना से उनके बेटे चिराग पासवान और एक बेटी हैं. साल 2020 में कोरोना काल के दौरान उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ने लगा.

    दिल की बीमारी के कारण 8 अक्टूबर 2020 को दिल्ली के एक अस्पताल में 74 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. भारत सरकार ने मरणोपरांत उन्हें देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से नवाजा. उनके जाने के बाद उनकी बनाई पार्टी ‘लोक जनशक्ति पार्टी’ में फूट जरूर पड़ी, लेकिन उनके बेटे चिराग पासवान ने पिता की विरासत को बखूबी संभाला. आज चिराग भी अपने पिता के ही नक्शेकदम पर चलते हुए मोदी कैबिनेट में मंत्री हैं और पासवान जी के ‘हाजीपुर’ और बिहार के विकास के सपने को आगे बढ़ा रहे हैं.

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