रांची : झारखंड में सरकारी संस्थानों और महत्वपूर्ण स्थानों पर पत्रकारों की आवाजाही को लेकर लगातार सामने आ रही पाबंदियों ने प्रेस की स्वतंत्रता और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. आरोप है कि पहले RIMS में पत्रकारों की एंट्री पर रोक लगाई गई, इसके बाद प्रोजेक्ट भवन में भी पत्रकारों की पहुंच सीमित कर दी गई. अब जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम और सदर अस्पताल को लेकर भी पत्रकारों की एंट्री पर प्रतिबंध की बात सामने आ रही है. सिविल सर्जन डॉ. अमरेंद्र प्रसाद ने 11 बिंदुओं में नियम तय करते हुए आईसीयू-एचडीयू, एसएनसीयू, इमरजेंसी, ऑपरेशन थिएटर, लेबर रूम, प्रोसीजर रूम और नर्सिंग एरिया जैसे संवेदनशील स्थानों में मीडिया के प्रवेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है.
इन घटनाओं को लेकर पत्रकारों के बीच नाराजगी बढ़ती जा रही है. सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सरकारी संस्थानों में पत्रकारों की पहुंच लगातार क्यों सीमित की जा रही है. पत्रकारों का कहना है कि अस्पताल, सरकारी कार्यालय और सार्वजनिक संस्थान जनता से जुड़े महत्वपूर्ण स्थान हैं, जहां पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है.
मरीजों की निजता और गरिमा को बताया आधार
जारी निर्देश में कहा गया है कि मरीजों की गोपनीयता, निजता और गरिमा की रक्षा के उद्देश्य से यह व्यवस्था लागू की गई है. अस्पताल के वार्ड और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में मीडिया के प्रवेश को नियंत्रित किया जाएगा. मरीज की तस्वीर या वीडियो बनाने तथा उसकी पहचान सार्वजनिक करने से पहले निर्धारित नियमों और अनुमति का पालन करना अनिवार्य होगा. वहीं अस्पताल प्रबंधन को भी छह निर्धारित मानकों का अनुपालन करने का निर्देश दिया गया है. इससे पहले 17 अगस्त को सोशल एक्टिविस्ट ज्योति शर्मा ने अस्पताल प्रबंधन को पत्र देकर आईसीयू और एचडीयू जैसे मरीजों की सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में अनधिकृत लोगों के प्रवेश पर सवाल उठाए थे.
आलोचकों का आरोप है कि हेमंत सोरेन सरकार के कार्यकाल में पत्रकारों के लिए एक के बाद एक जगहों पर प्रवेश संबंधी पाबंदियां सामने आ रही हैं. RIMS के बाद प्रोजेक्ट भवन, फिर जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम और अब सदर अस्पताल को लेकर सामने आई खबरों ने इस बहस को और तेज कर दिया है.
पत्रकारों का काम केवल सरकारी कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग करना नहीं है, बल्कि व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाना और जनता तक सही जानकारी पहुंचाना भी है. ऐसे में यदि सार्वजनिक संस्थानों में पत्रकारों की पहुंच ही सीमित कर दी जाए तो सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर स्वतंत्र निगरानी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है.
इसी मुद्दे पर बाबूलाल मरांडी नए सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा है कि पत्रकार सरकार के मेहमान नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रहरी हैं. कैमरे और सवालों पर रोक लगाने से मुद्दे खत्म नहीं होते और न ही जनता के सवालों को दबाया जा सकता है.
झारखंड में पत्रकारों के साथ हेमंत सरकार लगातार सौतेला व्यवहार कर रही है। सबसे पहले RIMS में पत्रकारों की एंट्री पर रोक लगाई गई। उसके बाद प्रोजेक्ट भवन में पत्रकारों की एंट्री बंद कर दी गई। फिर जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम को सील कर पत्रकारों की पहुंच रोक दी गई। अब खबर है कि सदर…
— Babulal Marandi (@yourBabulal) August 26, 2026
हालांकि, पत्रकारों की एंट्री पर रोक के पीछे प्रशासन की ओर से सुरक्षा, व्यवस्था या संस्थान की कार्यप्रणाली से जुड़े कारण बताए जाते हैं या नहीं, यह स्पष्ट होना अभी बाकी है. ऐसे में सरकार और संबंधित प्रशासन से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह स्पष्ट करे कि किन कारणों से पत्रकारों की एंट्री पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है और इन पाबंदियों का दायरा क्या है.
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